कहीं भारतीय संस्क्रति तो नही बदल गयी.

Posted by Arvind Bauddha
September 26, 2017

Self-Published

मुझे दुःख इस बात का है कि छेड़खानी जैसी सामाजिक और मानवीय स्तर की समस्या को भी आप वामपंथ और दक्षिणपंथ के चश्में से देख रहें हैं..और इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने से चूक नहीं रहें हैं..?
आप ही बताइये न लोग कहाँ सुरक्षित हैं.केरला में आरएसएस के संदीप सुरक्षित हैं कि कर्नाटका में कलबुर्गी और गौरी लंकेश..? की बिहार में राजदेव रंजन सुरक्षित हैं कि त्रिपुरा में वो युवा पत्रकार, जिसकी परसो हत्या हो गयी..
लड़कियां कहाँ असुरक्षित नहीं हैं ? क्या अपने घर में सुरक्षित हैं ? क्या उस जेएनयू में सुरक्षित हैं जहां की आजादी और प्रगतिशीलता की बार-बार दुहाई दी जाती है ? जहाँ कब कामरेड अनमोल किसी लड़की को फिल्म दिखाने के बहाने रेप कर डालतें हैं पता ही नहीं चलता….या फिर एंटी रोमियो स्क्वायड वाले यूपी के बलिया जिला में सुरक्षित हैं ?..जहाँ पता न कब राह चलता एक मनचला एक रागिनी की सरेआम हत्या कर देता है।
गौर से देखिये- देश-परदेश, गांव-नगर,शहर के स्कूल कालेज,विश्वविद्यालय,बस-ट्रेन, घर-दुआर आज सब इस तरह की समस्याओं से रोज जूझ रहें हैं..लेकिन दुख की बात है कि कोई समस्या के मूल की तरफ ध्यान नहीं देना चाहता..क्योंकि बहुतों को समस्या के खत्म होने में रुचि नहीं है..समस्या के बने रहने में रुचि है..
यही समस्या तब और बड़ी समस्या हो जाती है जब आप औऱ हम इनमें से अपने मन-मिजाज के अनुसार समस्याएं चुनकर उस पर हल्ला करना शुरू कर देतें हैं।
अरे आन्दोलन और बहस इस पर होना चाहिए कि लड़के किसी लड़की को सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में देखना कब बन्द करेंगे..कब सोचना शुरू करेंगे कि रास्ते में जो लड़की जा रही है..उसका चेहरा कहीं न कहीं हमारी मां-बहन से भी मिलता है।
डिबेट कब होगी कि समाज में बढ़ती हुई अंधी कामुकता पर रोकथाम कैसे किया जाए ? हम कहाँ चूक रहें हैं,क्या घर के संस्कार में दोष है कि हमारे एजूकेशन सिस्टम में दोष है जो हमें ज्ञान तो दे रहा है लेकिन वो विवेक नहीं दे रहा है,जहाँ पता चले कि स्त्री प्रेम की प्रतीक है,काम की नहीं.
देश के भर आईआईटी और आईआईएम में बड़े-बड़े शोध हुए, अब इस पर कब शोध कब होगा कि किसी कालेज के कैम्पस को टेक्नोलॉजी से इतना विकसित कैसे बनाया जाए की वहाँ छात्र-छात्रा आजादी और अनुशासन में एक समन्वय बनाकर पढ़ाई कर सकें..ताकि लड़कियां इस तरह रोज अपनी इज्जत बचाने के लिए पढ़ाई छोड़कर धरना प्रदर्शन न करे .

बहुत बातें है लेकिन सबसे मुख्य बात ये है की हमारे समूचे समाज की संरचना ही विक्षिप्त कर दी जा चुकी है हर आदमी सोच रहा है की बस मेरी बहन -बेटी सुरक्षित रहे बाकि के साथ कुछ भी हो जाये कोई बात नहीं ? विरोध और समर्थन तो हम जाति ,धरम और पार्टी देख कर करेंगे
इस सोच को बदलना होगा और इन विक्षिप्तताओं की जड़ो पर प्रहार करना होगा ताकि लोग जरा सा भी संवेदनशील बन सके ,एक इंसान बन सके .तभी कुछ होगा ?
वर्ना धरना प्रदर्शन में हल्ला करके कैंडिल तो दामिनी के समय भी खूब जलाये थे . दुर्भाग्य से आज भी जला रहे है . रेप और छेड़खानी की घटनाये न तब रुकी थी और न ही आज ….और समाज का यही हाल रहा तो कल भी नहीं रुकेंगी .

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