किसी सिरफिरे के पागलपन का शिकार बनना है क्या

Posted by Prashant Tiwari
September 23, 2017

Self-Published

मौत अब उतनी दुर्लभ चीज़ नहीं रही, पहले आस-पड़ोस में या रिश्तेदारी में किसी की मौत हो जाती थी तो घर में और आसपास दुःख का माहौल रहता था लेकिन अब हर रोज़ ऐसी एक-दो खबरें मिल ही जाती हैं और हमें थोड़ी देर के लिए अजीब लगता है फिर सबकुछ नॉर्मल। अगर वो ज़्यादा करीबी हुआ तो दो-चार दिन आप शांत रहते हैं। 

पहले लोग ज़्यादातर बीमारी, एक्सीडेंट या प्राकृतिक आपदाओं से मरते थे लेकिन हाल के कुछ सालों में सिरफिरों की एक जमात पैदा हुई है जो कभी भी, कहीं भी किसी को भी मारने में ज़रा भी संकोच नहीं करती। 
इनमें से एक जमात ऐसी भी है जो बहुत सोची-समझी साज़िश के तहत ऐसे लोगों को ही निशाना बनती है जो कुछ सही बात, तार्किक बात लिखने कहने या किसी सही बात के लिए साथ खड़े होने की छमता रखते हैं।  
भारत सहित कई देशों में पिछले कुछ सालों में इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं। चाहे पाकिस्तान में मलाला पर आतंकवादी हमला हो, फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो पर हमला हो या पिछले दिनों भारत में खुलेआम हुई कई पत्रकारों की हत्या। 
पत्रकारों और लेखकों की हत्या इसलिए भी ज़्यादा खतरनाक है क्योंकि उनके साथ हज़ारों का हौसला भी मरता है। उन लोगों का विश्वास मरता है जो उनके लिखने, बोलने से ताकत पाते थे और उनके साथ-साथ अपने हौसले बुनते थे। 
ये वे लोग थे जिनको देख-सुनकर आम जनता गलत बात के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत कर पाती है। इसीलिए इन लोगों को निशाना बनाया जा रहा है जिससे एक साथ हज़ारों हौसले तोड़े जा सकें और कोई दूसरा जो सच के साथ खड़ा होता है उसके हौसले में कमी आ जाए.
मुझे समझ नहीं आता ये किस तरह के लोग हैं, इससे भी विडम्बना वाली बात यह है कि ये हमारे समाज में ही हमारे आसपास रहते हैं। यह हमारी भी कमी है कि ऐसे लोग हमारे साथ रहते हैं और हम उन्हें बदल नहीं पा रहे। 
अगर समय रहते इनके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई गई तो इनको और शह मिलेगी ऐसा काम करने को क्योंकि सिरफिरे मारने से पहले ये सोचते नहीं। आप बोलें या ना बोलें। तो बेहतर है कि बोला जाए और ज़ोर-ज़ोर से बोला जाय।  
अब यह हमें तय करना है कि हम सही बात के साथ खड़े होंगे या किसी सिरफिरे की गोली का शिकार बनेंगे। मुझे उम्मीद है दूसरा विकल्प आप आसानी से नहीं चुनेंगे।   

 

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