कुछ बदलाव तो जरुरी है!!

Posted by vijaya jain
September 12, 2017

Self-Published

अभी करीब 15 दिन की ही बात है – शाह परिवार के सभी लोग 9 माह से जिस लम्हे का इंतज़ार कर रहे थे ,वो आ ही गया था। सभी नए मेहमान के इंतज़ार में अपनी आँखे थामे बेठे थे । नानी- दादी कपड़े , डायपर , बेबी सोप और ना जाने कितनी तैयारी में लगे हुए थे। बेबी के पापा भी ऑफिस से 15-20 दिन की छुट्टी लेकर आ चुके थे ,यही आशा से की उनके घर आँगन में किलकारी गूंजने वाली है। अपने अंश को देखने की जिज्ञासा पिता से अच्छा कौन समझ सकता है।

डॉक्टर की सलाह से ,दर्द न आने पर भी दोपहर में हॉस्पिटल जाने का संयोग बना। गर्भ में बच्चे को लिए माँ (शारदा) के दिमाग में अलग अलग विचार आने लगे थे। थोड़ी सी सहमी हुई थोड़ी ख़ुशी थोड़ा सब ठीक हो जाए की फिक्र थी। जेहन में अजीब अजीब से ख्याल हिचकोले खा रहे थे, फिर भी अपने आप को संभाले हुए वो हॉस्पिटल जाने को तैयार हो गयी थी इसी विश्वास से की भगवान , परिवार और भगवान समान डॉक्टर सब ठीक कर देंगे।

हॉस्पिटल जाते से जेब ढीली होते ही , उसे दर्द का इंजेक्शन दे दिया गया ,बोतल चढाई गयी ताकि आर्टिफीसियल दर्द आ सके । नर्स थोड़ी थोड़ी देर में आ कर इंटरनल चेकअप करने लग गयी। करीब 2-3 घंटे दर्द सहन करने के बाद भी जब कुछ सफलता नहीं लगी तो डॉक्टर ने तपाक से ऑपरेशन करने को बोल दिया। 9 माह सब सही रहने पर भी, नार्मल डिलीवरी से सीधे ऑपरेशन सुन कर परिवार वाले परेशान से हो गए। और डॉक्टर को थोडा समय और इंतज़ार करने को बोलने लगे। डॉक्टर 1-2 घंटे रुक कर फिर ऑपरेशन का बोली और अब की बार बच्चे और माँ की हालात बिगड़ रही है का वाक्य साथ लेकर बोली। परिवार वाले भी अचंभित से और असमंजस में थे की एक दम से हालात और हालत कैसे बिगड़ गए ।

बच्चे और माँ दोनों की सलामती के लिए उन्होंने भी ऑपरेशन के लिए हामी भर दी । हां होते से ही हॉस्पिटल का स्टाफ एक दम सक्रीय हो गया और 10 मिनट के अंदर ही ऑपरेशन की सारी तैयारी हो गयी । दिन भर दर्द के इंजेक्शन से आये दर्द को सेहन करती हुई गर्भवती महिला (शारदा) थक सी गयी थी लेकिन अपने बच्चे को देखने की लालसा ने उसके मनोबल को बढ़ाये रखा था।

उसे अब ऑपरेशन थिएटर (OT) में ले जाया गया ,लेकिन मुख्य डॉक्टर ने अपने असिस्टेंट को ऑपरेशन आगे बढाने को कहा क्योंकि वो अपने क्लिनिक में पेशेंट देख रही थी उसे आने में टाइम लग सकता था। करीब 20 मिनट बाद डॉक्टर आई ,लेकिन तब तक देर हो चुकी थी शाह परिवार में किलकारियां तो गूंजी थी, लेकिन मातम के साथ बच्चे को देखने की आरज़ू लिए माँ इस दुनिया से ही चली गयी थी। गलती से उसकी कोई आंतरिक नस कट गयी थी, जिससे खून बहता जा रहा था।

परिवार वाले ख़ुशी मनाये या गम या फिर डॉक्टर से झड़प करे कुछ समझ नही आ रहा था । ख़ुशी का माहौल चंद लम्हों में ही मातम में बदल गया एक डॉक्टर की थोड़ी सी लापरवाही और कमाई के लिए ।

आज नार्मल की जगह ऑपरेशन वाली डिलीवरी का कारोबार जो चल रहा है वो डॉक्टर और हॉस्पिटल के लिए जरूर कमाने का जरिया है। लेकिन ये एक नारी की जिंदगी को बहुत तरीको से छतिग्रस्त कर जाती है, उसका शरीर , उसकी सुंदरता , उसकी कर्मशक्ति को छिन्न कर देती है और भविष्य में अनेको बीमारी का मरीज बना देती है – मोटापा, थाइरोइड, शुगर आदि।

आज डॉक्टर एक एक दिन में 10-15 डिलीवरी और करीब क्लिनिक में 100 से भी ज्यादा पेशेंट देखते है। कई असहाय , अर्ध ज्ञान लिए पढे लिखे लोगो को मुर्ख बना कर नार्मल डिलीवरी , ऑपरेशन में सफलता और ना जाने कितने ढकोसले के साथ डॉक्टर पैसो के पीछे बड़ी बड़ी कार में भागते नज़र आते है। केस बिगड़ जाने पर भी सारा इल्जाम परिवार वालो, समय और भाग्य को दे देते है। पढे लिखे सभ्य घर के लोग सब चीजे चुप चाप सुनते है देखते है समझते भी है लेकिन कुछ कर नही पाते है और ऐसे में डॉक्टर को और भी मौका मिल जाता है -मुर्ख बना कर पैसे लूटने का ।

क्या ये मानवीय क्षेत्र और भगवान माने जाने वाले डॉक्टर जो जीवन देने वाले है वही चंद रुपयो के लिए अपने ईमान को बेच देगा, किसी मासूम ,किसी लाचार की जिंदगी से खेल लेगा। कभी किसी माँ को बच्चे से , कभी किसी पिता को अपने बेटे से ,कभी किसी पति को पत्नी से , कभी इंसानियत को इंसान से अलग करता रहेगा??

क्या समाज के इन भगवान् को कोई समझा पाएगा , कोई इनके अंदर बेठे भगवान् को जगा पाएगा? अगर हां तो कब आखिर कब ?? क्यों सरकार इसके लिए नियम नही बनाती क्यों लोगो को आज भी लाखो रूपये लूटा कर इलाज कराना पड़ता है ,उसमे भी अपनों को खोने का डर हमेशा बना रहता है।

मेरी सभी लोगो से, सरकार से गुजारिश है की जो डॉक्टर अच्छे से फ़र्ज़ निभाते है उनको प्रोत्सहन मिले ताकि वो मानवता को बचाते रहे और जो अपने काम को गंभीरता से नहीं ले रहे उनके बारे में सोच कर उनके लिए कड़े से कड़े कदम उठाये जाए ताकि हॉस्पिटल एक मंदिर बन जाये और डॉक्टर भगवान जहाँ से कोई मरीज(भक्त) चंद पैसो और चढ़ावे के लिए खाली हाथ ना जाए।

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