कैसे-कैसे देशभक्त हैं

Posted by Siddharth Ratnam
September 5, 2017

Self-Published

दिसंबर का महीना तारीख़ १९ आज से करीब दो साल पहले । मै हिन्दू छात्रावास से बालसन की तरफ जा रहा था । मैने देखा कम्पनी गार्डन (आजाद पार्क ) में शहीद स्थल पर कोई कार्यक्रम चल रहा है, तो मन में आया कि देखूं क्या है । तब इस पार्क में घूमने-फिरने का कोई शुल्क नहीं लगता था ।  ‘देश रंगीला रंगीला’ बज रहा था, जिसकी ध्वनि दूर तक आ रही थी । पास गया तो देखा स्टेज पर एक छोटीसी बच्ची इस गाने पर नृत्य कर रही है । उसके अलावा और भी म्यूज़िक कोर के लोग स्ट्रूमेंट के साथ अपना स्थान संभाले हुए थे । यह अच्छा सा पंडाल था जिसमें आगे कुछ विशिष्ट गणमान्य व्यक्तियों की कुर्सीयां लगीं थी, जिसपर वे मंचासीन थे । पीछे की कतारें लगभग एक-चौथाई छोड़कर खाली थीं । आयोजक जी बुला-बुला कर सबको बैठा रहे थे । तभीं एक परचा मेरे हाथ में आया । इसमें कार्यक्रम के बारे में और इसके उद्येश्य पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया था । मगर जो चीज़ मै ढूंढ रहा था वह परचे से ग़ायब थी । हां ” कुछ आरज़ू नहीं है, है आरज़ू यही कि रख दे कोई ज़रा-सी ख़ाक-ए-वतन क़फन में.. ” यह लाइन जरूर थी, लेकिन बाकी हाईलाइट चीजों में यह संघर्ष करती नज़र आ रही थी । अब एक देशभक्ति से सराबोर माहौल की तरफ कार्यक्रम रूख कर चुका था ; गायक जी के साथ सभीं सुर से सुर मिला कर गा रहे थे- “दिल दिया है जां भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए ” ! क्या जूनून था । दिखाये देखे न बन रहा था । देशभक्ति से लबालब भरे एक नेता जी नें अशफ़ाक़ के जीवन और व्यक्तित्व पर गरमजोशी के साथ एक स्पीच दी । तालियों की गड़गड़ाहट से कम्पनी बाग गूंज उठा । अब बारी थी अध्यक्ष महोदय के संबोधन की । किंतु इससे पहले अध्यक्ष जी के योगदान, उनके कृतित्वों व संघर्षों की विस्तार से चर्चा जरूरी थी अत: कुर्सी से उठकर मंच पर चढ़ कर माइक संभालने तक की जो समयावधि थी, वह करीब पंद्रह मिनट तक खिंचती गयी । भले चंगे प्रफुल्लित अध्यक्ष जी को दो लोग कंधों से उठाये मंथर गति से मंच की तरफ ऐसे ले जा रहे थे, जैसे अभीं हास्पिटल से डिस्चार्ज हुए हों । जैसे-जैसे उनके पांव सीढ़ियां ढूंढ रहे थे, उसी लय में संचालक महोदय उनकी तारीफ़ में शब्द ढूंढते जा रहे थे । हम लोग भी वहीं प्रसन्न भाव से उनके इस अद्भुत संघर्ष को आत्मसात् कर रहे थे । “शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यहीं बाक़ी निशां होगा ” तालियों की गड़गड़ाहट एकबार फिर गूंज उठी, और फिर उन्होंने बोलना शुरु किया-  “…शहीदों की शहादत भूलाये नहीं भूलती, और भूलनी भी नहीं चाहिए .. हिन्दू- मुस्लिम एकता व भाईचारे की मिसाल थे अशफ़ाक़ .. हम नहीं भूले रामप्रसाद बिस्मिल को, नही भूले रोशन सिंह को , इसलिए तो मनाते हैं हर साल उनकी शहादत को ..हमने इसके लिए ये किया , वो किया, इनसे लड़े, उनसे भिड़े और फला-फला जगह प्रतिमा का लोकार्पण किया.. आदि -आदि ” अध्यक्ष जी की बात ने लोगों को झकझोर दिया था । लोग क्रांतिकारी हुए जारहे थे, कार्यक्रम अब आखिरी पड़ाव पर था । राष्ट्रगान के लिए संचालक जी ने अनुरोध किया । सिंगर जी के साथ आर्गन, नाल, गिटार एवं पैड प्लेयर मंच पर विशेष मुद्रा में रेडी थे । राष्ट्रगान शुरु हुआ सब लोग एक साथ एक आवाज में राष्ट्रगान किये । “जन गन मन अधिनायक…  जयहे जयहे जय जय जय जय हे !! ” सम भी नहीं आया था कि सिंगर मंच से नीचे कूदकर तेजी से दौड़े । हम सब ही आवाक थे हुआ क्या ? सबकी नजर आर्केस्ट्रा वाले सिंगर पर थी । पास में ही जो सीढ़ीनुमा बैठने की नयी जगह बनी है उस पर बैठे एक बुजुर्ग को कालर पकड़े घसीटते हुए चले आरहे थे । लोग दौड़े भीड़ इकट्ठा होती गयी । क्या हुआ ..क्या हुआ ? सिंगर का गुस्सा आसमान पर था । उस बुजुर्ग की नाक पर घूंसा जड़ते हुए ताबड़-तोड़ प्रश्न करने लगे-  “बोल क्यूं खड़ा नहीं हुआ.. बहरा है ? तुझे मालूम नहीं राष्ट्रगान का सम्मान किया जाता है.. साले देशद्रोही ..मुस्लिम है न ? बोलता नहीं है ।” गणमान्य व्यक्ति भी आ गये । अध्यक्ष जी नें उसका टेटवा पकड़ा और दांत पीसते हुए चिल्ला कर पूछा- “जानता है किसके बारे में कार्यक्रम चल रहा है ?” भीड़ का एक पक्ष उग्र हो चुका था बाकी कुछ छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे । वह बेचारा कुछ समझ पाने कि स्थिति में न था । खींचातानी में उसकी कमीज़ फट चुकी थी । “जाने दीजिये सर पता नहीं था उसे ..छोड़िये ! संचालक जी बचाव ही कर रहे थे लेकिन ऊपरी तौर पर, नेता जी ने भद्दी सी गाली दी और चलते बने । दो लोग सिंगर को पकड़ कर अलग-थलग किये और बुजुर्ग को वहीं बिठा दिया । उसकी कनपटी से थोड़ा खून बह रहा था । शायद माइक से ही सिंगर ने उसपर प्रहार किया था । काफी देर तक तो वह व्यक्ति सामान्य ही नहीं हो पाया था । अब वहां उसके आसपास आठ -दस लोग ही बचे । जिनमें ज्यादातर छात्र थे, उन्होंने ही उसे उग्र भीड़ से अलग-थलग किया था । मै वहां केवल मूक दर्शक था ।  एक महिला जिन्हें यह सब देख कर बड़ी ग्लानि हुयी वे एकदम से विद्रोही स्वर में मुखर होकर बोल उठीं- “ये भाईचारे कि बात करने वाले हैं ..मुझे खिन्न आ रही है ऐसे कार्यक्रम में आकर.. इस घटना की भी प्रेस रिपोर्टिंग होनी चाहिए ।”  मिठाइयों के पैकेट बांटे जा चुके थे, ज्यादातर लोग वहां से जा चुके थे । टेंट वाले टेंट व कुर्सियां ले जा रहे थे, वह बुजुर्ग कोई भी बात ठीक से नहीं समझ पा रहा था , एक तरह से विक्षिप्त ही था । बाद में उसने बताया कि यहीं पास में रोड पर ही रहता है । उसका अपना कोई घर नहीं है ।

-सिद्धार्थ रत्नम

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