क्रांति के मायने क्या है? क्यूँ “जनता” साथ देगी?

Posted by Krishna Singh
September 13, 2017

Self-Published

Himanshu Kumar (फेस बुक पर)

क्या देश में दलितों की हालत बदल जायेगी ?

क्या आदिवासियों की ज़मीनें छीनने का सरकारी काम रुक जाएगा ?

क्या भारत के अल्पसंख्यकों की हालत बदल जायेगी ?

जब तक आपके विकास का जीवन का और सोचने का ढांचा यही रहेगा कुछ नहीं बदलेगा,

आप मानते हैं कि जाति सच है, तो भारत में जाति रहेगी,

आप मानते हैं कि ज़मीन पर उसका कब्ज़ा होना चाहिए जो उससे मुनाफा कमा सकता है,

तो बड़े कारपोरेट, देश में आदिवासियों और किसानों की ज़मीनें सरकारी बन्दूकों के दम पर छीनते रहेंगे,

आप मानते हैं आपका धर्म सबसे महान है और दुसरे धर्म वाले मूर्ख और आतंकवादी हैं,

तो मुसलमानों और ईसाईयों की हालत ऐसी ही रहेगी,

याद रखिये राजनीति धारणाओं का खेल है,

अगर आप जनता की धारणाएं बदलने का काम नहीं करेंगे तो आप राजनीति भी नहीं बदल पायेंगे,

आप नेता बदल लेंगे, पार्टी बदल लेंगे लेकिन हालत नहीं बदल पायेंगे.”

बहुत सही विश्लेषण!

“अगर आप जनता की धारणाएं बदलने का काम नहीं करेंगे तो आप राजनीति भी नहीं बदल पायेंगे”
सही है दोस्तों, आज की व्यवस्था भाजपा के हराने से नहीं बदलेगी, क्यूंकि सारे राजनितिक दल इसी व्यवस्था के चट्टे बट्टे हैं. यह व्यवस्था क्या है? वह आर्थिक तौर तरीका है, जहाँ बड़े “मुनाफा कमाने वालों” का ही राज चलता है, यहाँ तक की इसके ऊपर आधारित राजनीती, धर्म, शिक्षा, सामाजिक रीती रिवाज, मिडिया, प्रशाषण, पुलिस, न्यायलय भी उन्ही के अनुसार चलता है. तब भला जनता को इसके विपरीत शिक्षा कैसे दी जाय?
यानी जबतक आधार नहीं बदलेंगे, जड़ नहीं बदलेंगे, फल कैसे बदलेंगे? बोये पेड़ बाबुल का आम कहाँ से होए? यानी जबतक पूंजीवाद रहेगा, पूंजीवादी उत्पादन बना रहेगा, जनता की शिक्षा को बदलना संभव नहीं होगा.
सवाल तो यह भी होगा की क्या हम बिना जनता की धारणाएं बदले क्रांति कर पाएंगे और हर समस्या की अम्मा पूंजीवाद को दफ़न कर सकेंगे? और आखिर हमलोग कौन हैं, जो अपने आप को आज के प्रचलित “पूंजीवादी विचारधारा” से जनता को मुक्त करना चाहते हैं? यदि हम सच्चाई समझ सकते हैं तो जनता क्यूँ नहीं? मेरा यहाँ जनता से मतलब मजदूर वर्ग और किसान है!
दोस्तों, शिक्षित वर्ग का एक छोटा हिस्सा जो इमानदार है, सच्चाई के लिए लड़ने के लिए तैयार है, वह खोज करता है प्रकृति और समाज के नियमों का. मार्क्स और एंगेल्स ने भी यह काम किया. उस वक्त तक के खोजों के आधार पर उन्होंने द्वंदात्मक भौतिकवाद की खोज की, और उसका प्रयोग मनुष्यों के इतिहास पर किया और उसका नाम ऐतिहासिक भौतिकवाद दिया. इस क्रन्तिकारी खोज के बाद हमने पाया कि मानव समाज का विकास एक खास ढर्रे पर होता है नाकि किसी ईश्वरीय हस्तक्षेप के द्वारा, नाही कुछ व्यक्तियों के महान कार्यों के द्वारा. बल्कि उन बहुमत के द्वारा, जो उत्पादन में शामिल हैं और वह किस तरह के मशीन द्वारा उत्पादन करते हैं. व्यक्ति के योगदान को नाकारा नहीं जा रहा है, पर उसकी चर्चा फिर कभी.
और जहाँ तक जनता या उत्पादक शक्तियों के चेतना की बाद है, जिसकी चर्चा लेखक करते हैं, इसी आधार के इर्द गिर्द घुमता है. अभी की स्थिति यह है कि पूंजीवाद (जिसकी स्थापना 500 वर्षों पहले, राजतन्त्र को ख़त्म कर हुयी थी), की ऐतिहासिक रोल ख़त्म हो चूका है. अब यह उत्पादक शक्तियों के लिए खुनी बेड़ी बन चुकी है, और इसका जीवन “जनता” को मूढ़ बनाकर और प्रताडन कर ही संभव है!
यदि हम इस जनता के संघर्ष में शामिल हों, इनको एकताबद्ध करें, तो यह भी वही बात करेंगे जो हम करते हैं, धर्म, जाति से ऊपर उठेंगे, इसके उदहारण सैकड़ों हैं. तेलंगाना आन्दोलन उदहारण है! दूसरी तरफ जन लोकपाल बिल का आन्दोलन भी है, जहाँ जनता भी पूंजीवाद के ही सुधार में लग गयी!
तो इसके लिए हमारी विचारधारा को वैज्ञानिक और क्रातिकारी होना पड़ेगा, क्रन्तिकारी पार्टी की स्थापना करनी होगी, पार्टी को सही रास्ता लेना होगा, लक्ष्य पूंजीवाद को हटाकर समाजवाद का ही होगा. अन्यथा कोल्हू के बैल की तरह हम वही के वही रहेंगे! क्रांतिकारी विचारधारा जनता में स्वाभाविक रूप से नहीं आता है बल्कि हमारे जैसे क्रांतिकारियों के द्वारा ही आता है और यदि हम खुद सुविधाभोगी हो जाएँ, संधोशंवाद के रस्ते चल पड़ें तो फिर सीपीआई, सीपीएम के जैसे ही भविष्य होगा. क्रांति का रास्ता आसन नहीं पर यह अवश्यम्भावी है! सफलता तो मिलनी ही है, क्यूंकि इसकी जरुरत 90-95% मेहनतकश जनता को है!
जिस दिन यह क्रन्तिकारी विचारधारा जनता को पकड़ ले, इसकी ताकत भौतिक हो जाता है, और उस सुनामी को रोकने की क्षमता पूंजीवाद और उसके चाटुकारों में नहीं बचेगा!
याद करें भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद और उनके साथियों के संघर्ष की, उनकी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिअशन (HSRA) पार्टी की, जिसके मैनिफेस्टो में अंग्रेजों को हराकर एक समाजवादी भारत की प्रस्थापना की गयी थी. सोविअत रूस में भी क्रांति हुयी, समाजवादी समाज की व्यवस्था की गयी, हर तरह के शोषण का अंत किया गया, विश्व के सबसे बड़े दुश्मन आर्मी, नाजी को मजदूर, किसान और सैनिकों ने हराया गया, एक कृषि प्रधान देश को जो जारशाही से पीड़ित था, को औद्योगिक राष्ट्र बनाया गया, विश्व के सारे शोषितों में आशाएं बनायीं, गुलाम देशों को मुक्ति मिली! पर अन्दुरुनी गद्दारी के कारन, जिसके अगुआ त्रोत्स्की के समर्थक, ख्रुश्चेव, टीटो आदि ने की, पूंजीवाद फिर से काबिज हुआ!
बदलते वक्त के साथ परिस्थियाँ बदली है और अब समाजवादी क्रांति की जरुरत पहले से कई गुना ज्यादा है. जनता या मजदूर वर्ग और किसान बेहाल हैं और क्जरुरत अहि, हम क्रांतिकारियों की कि इन्हें नेत्रित्व दें, पुराने सड़े गले व्यवस्था को नेस्तनाबूद करे.
क्रांति जिंदाबाद!

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