खून में है हिंदी!!

Posted by vijaya jain
September 14, 2017

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बधाई हो आज हिंदी दिवस है!!

आज हम सभी को हिंदी दिवस पर बधाईयाँ दे रहे है। हिंदी और हिंदी प्रेमियो की प्रशंसा करते नहीं थक रहे है। लेकिन क्या हिंदी सिर्फ एक दिन के लिए सराही , बोली और लिखी जानी चाहिए?? अन्य भाषाओं की तरह क्यों हम साल भर हिंदी को नही बोला करते है या कहे की बोलने से कतराते है। आज दूसरी भाषाए क्यों हमारी खुद की अपनी हिंदी पर भारी पड़ रही है ।

स्कूल , कॉलेज ,ऑफिस और सामाजिक हर मिलन समारोह में क्यों हम हिंदी को बोलना हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा को धूमिल होना मानते है? आखिर क्यों हमे हमारी हिंदी की वर्ण माला तक याद नही है और हमारे बच्चों और हमको हिंदी लिखने तक में आलसी आती है और हम हिंदी भी दूसरी भाषा में लिखते है!(sms language)। हमारे बड़े बुजुर्ग अगर हिंदी बोले तो क्यों हमे ग्लानि होती है ,वो हमारे वजूद है और हिंदी हमारी भाषा है ।

विचारो को व्यक्त करने की वैसे तो कोई भाषा नही होती है फिर भी अपनी भाषा को बोलने का आनंद अलग ही होता है। जब कोई दो सम भाषी मिलते है तो अपनापन और आंतरिक आनंद स्वतः ही महसूस हो जाता है। खुद को और अपने बच्चों को अपनी भाषा से महरूम ना करके उसे गर्व से अपनाये ,जैसे अन्य भाषा बोलने वालो को अपनी भाषा पर गर्व है वैसे ही अगर हिंदी से सच्चा प्रेम है तो हिंदी को किसी एक दिन के लिए नहीं अपितु हमेशा के लिए अपनाये और अपनी जिंदगी का हिस्सा वापस से बनाये।

हिंदी का हमारे दिल से नाता है , उसे बोलने लिखने में जो आनंद आता है वो शायद ही कभी किसी और भाषा में आये। हिंदी लिखने और बोलने पर लगता है जैसे खुद की बात खुद से हो रही है और शब्द खुद ब खुद ही कब वाक्य बन जाते है पता ही नही चलता है। शुक्रिया की मुझे अपने विचार एक अद्भुत भाषा में बोलने और लिखने का मौका मिला। हिंदी दिल में नहीं खून में है शरीर से निकालना थोडा मुश्किल है।

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