गुरू वंदना और लोक शिक्षा ने बदला जीवन

Posted by Ramkumar Vidyarthi
September 5, 2017

Self-Published

  • शिक्षक दिवस विशेष

उस दिन  वरिष्ठ  जन और बच्चों से मिले सम्मान ने एक झटके में उनका  पूरा नशा तोड़ कर रख दिया था।  गुरूजी के कांपते हांथ पांव , झुकी नजरें और आंसुओं की बहती धारा पश्चाताप से प्राप्त आत्मज्ञान को प्रकट कर रही थी। इस घटना के बाद ग्रामीणों ने डॉ. गुरूदास अग्रवाल का सामूहिक अभिनंदन किया और स्वयं भी नशा मुक्त होने का संकल्प लिया।

बात एक दशक पुरानी है जब मैं म.प्र के अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ ब्लॉक में  जलग्रहण परियोजना में सामुदायिक कार्यकर्ता के तौर पे कार्यरत था। उन दिनों सरई पंचायत के तरंग गांव में ग्रामीण और बच्चे प्राइमरी स्कूल के गुरूजी के शराब पीने की लत से बहुत परेशान थे। गुरूजी अक्सर शराब के नशे में स्कूल आते थे। ग्रामीणों ने उन्हें समझाने की कोशिश भी की लेकिन आदत में कोई सुधार नहीं हुआ। इसी बीच शिक्षक दिवस के ठीक मौके पर प्रख्यात पर्यावरणविद् व प्रोफेसर डॉ.गुरूदास अग्रवाल का गांव में आना हुआ। वे यहां ग्रामीणों द्वारा किये जा रहे जल संरक्षण के कार्य को देखने पहुंचे थे। पहुँचते ही उन्होंने शिक्षक दिवस के अवसर पर गुरू वंदना कार्यक्रम आयोजित करने की मंशा जतायी । इससे हम सभी बड़े असमंजस में पड़ गये कि यदि आज भी मास्टर साहब ने पी रखी हो तो ? खैर आनन फानन में स्कूल तक सूचना भेजकर शिक्षक सम्मान की तैयारी पूरी करायी गई।

तय समय पर डॉ.जीडी अग्रवाल जल संरक्षण समिति सदस्यों के साथ हांथ में फूल और गीता की पुस्तक लिये स्कूल में दाखिल हुए। आते ही डॉ. अग्रवाल ने फूल और गीता गुरूजी के हांथ में देते हुए उनके चरण स्पर्ष कर लिये। यह एकदम ही अप्रत्याशित हुआ और ग्रामीणों और गुरूजी को एैसे सम्मान का अंदाजा भी नहीं था। डॉ. अग्रवाल ने कुछ फूल टेबल पर रखे सरस्वती मां की तश्वीर पर चढ़ाये और बेहद सामान्य तरीके से बच्चों को भी गुरूजी की वंदना करने की बात समझाने लगे। फिर इसके बाद एक एक कर सभी बच्चों ने अपने गुरूजी के पैर छुए और गेंदा व कनेर फूलों से बनी माला पहनायीं। गुरूजी के हावभाव से ही लग रहा था कि आज भी उनका महुआ उतरा नहीं था । किंतु वरिष्ठ  जन और बच्चों से मिले सम्मान ने एक झटके में मानों पूरा नशा तोड़ कर रख दिया था। उस दिन गुरूजी के कांपते हांथ पांव , झुकी नजरें और आंसुओं की बहती धारा और पश्चाताप व आत्मज्ञान को प्रकट कर रही थी।

इस घटना के बाद ग्रामीणों ने डॉ. गुरूदास अग्रवाल का सामूहिक अभिनंदन किया और स्वयं भी नशा मुक्त होने का संकल्प लिया। इस अवसर पर बच्चों ने कविताएं सुनायी तो तरंग के निवासियों ने कबीर भजन गाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। डा. साहब ने सभी बच्चों से रोजाना माता पिता और अपने गुरूजी के चरण स्पर्श करने और नित्य ध्यान से पढ़ाई करने की सीख दी। इस छोटे से गुरूवंदना का ग्रामीणों पर असर ये हुआ कि उन्होंने जनभागेदारी से स्कूल की छतिग्रस्त छत को अगले कुछ दिनों में ही ठीक करा दिया। इधर सरई, तरंग, पयारी गांव में ग्रामीणों द्वारा किये जा रहे जलसंरक्षण कार्य को देखते हुए डॉ. साहब ने इस काम को लोक शिक्षा को सहेजने और फैलाने के कार्य के रूप में रेखांकित करते हुए ग्रामीणों की खूब सराहना की। आज की शिक्षा  व्यवस्था में जहां गुरू की यह सहज सीख और लोक शिक्षा कम हुई है वहीं एक दशक  पूर्व सच्चे गुरू की सहज हृदयता ने हमारे मन में सेवा व सम्मान से भरे संस्कारों को जीवंत कर दिया।

उस दिन के बाद से तरंग गांव और वहां के प्राइमरी स्कूल और उन गुरूजी के अंदर बहुत कुछ सुधार और बदल हुआ है। प्रख्यात क्षेत्र अमरकंटक के कुछ ही दूर पर बसे सरई पयारी और तरंग गांव में जलसंरक्षण से जुड़ी लोक शिक्षा की यह पहचान आज भी बरकरार है।

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