चतुर मीडिया

Self-Published

 आज टीवी और सबसे तेज खबरों की दौड़ में, हमारी व्यक्तिगत सोच और नीतिगत बहस को किस तरह एक सांचे में ढाल कर उसे सनसनी बनाया जा सकता है, इसी के अध्ध्यन के तहत अगर तारीख 24/अगस्त/2017 दिन गुरूवार, को मीडिया का दिन कहा जाये तो गलत नही होगा, जँहा सुबह एक आम सी ही थी लेकिन शाम का रंग, मीडिया ने बदल।दिया था, एक सुग बुगाहट शुरू हो गयी थी की तारीख 25-अगस्त-2017 के दिन, पंचकुला की अदालत में बाबा राम रहीम, जिस केस में आरोपी है उस केस का फैसला आने वाला है, ये मीडिया ही था की जिसने तारीख 25-अगस्त-2017 की सुबह तक उत्तर भारत में पंजाब और हरियाणा तक सीमित जिस बाबा की चर्चा थी उसे आज मीडिया ने इतना भुना दिया था की दक्षिण भारत का एक गैर हिंदी भारतीय भी बाबा के नाम से परीचित हो चूका था.

यँहा अगर, एक अंदाज के मुताबिक सोचे की अगर बाबा को इस केस में आरोपी ना भी घोषित किया जाता, तब भी क्या बाबा अपनी उस समाज सेवी छवी को कायम रख सकता था जिसे बनाने में बाबा को करीबन 27 साल लग गये थे. शायद नही. एक और तथ्य समझने की जरूरत है की जिस पर आज के समय काल में भारतीय टीवी, खासकर गैर सरकारी टीवी का कैमरा जिस किसी भी व्यक्ति को शक की नजर से देख ले उस व्यक्ति का जीवन सामान्य नही रहता या तो वह जमीन पर होता है या आसमान पर, 2008 का आयुषी हत्या कांड, जँहा मीडिया पर आरोप लगा की इसने अपनी।कवरेज के दौरान सबूतों को बिगाड़ने में लापरवाही बरती या फिर साल 2016 का जेएनयू में राष्ट्रद्रोह का आरोप जँहा अदालत में पेशी के दौरान जिस तरह कानून के काले कोट पहन ने वाले वकीलों ने कन्हिया कुमार की पिटाई, अदालत के परिसर में की थी वह बेहद शर्मनाक था वही साल 2016 में गुरमेहर कौर को जिस तरह सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया, खासकर जेएनयू ओर गुरमेहर कौर का पूरा।मीडिया।प्रकरण का अगर सामान्य नजर से भी अध्धयन करे तो एक तरह से यँहा हमारा मीडिया, आम जनता का ध्यान भटका कर राष्ट्रप्रेम ओर देश भक्ति की नई नींव रख रहा था जंहा व्यवस्था द्वारा लिये जा रहे सारे फैसलो को इसी चश्मे से देखे जा सके. लेकिन ये सारी घटनाये सोचने को मजबूर करती है की क्या आज भारतीय टीवी मीडिया खबर को दिखा रहा है या खबर को पैदा कर रहा है या कुछ ही खबरों तक सीमित रहकर उन्हे सनसनी बनाकर मीडिया दूसरी अहम खबरों का ना दिखाकर हमारा ध्यान भटका रहा है.

बाबा राम रहीम की खबर का तंज कसने से पहले और  टीआरपी के इस खेल के खत्म होने से पहले, दोनों जगह दो एहम घटना घटित होती है, बाबा राम रहीम की सुर्खियां बनने से पहले, कुछ चंद रोज पहले माननीय आदलत, मालेगांव ब्लास्ट में आरोपी बनाये गये कर्नल श्रीकांत पुरोहित की जमानत अर्जी मंजूर कर लेती है, मालेगाव ब्लास्ट, यूपीए के कार्यकाल में हुआ था और इस केस की चार्जशीट भी इसी सरकार के कार्यकाल में, आदलत को सोपी गयी थी लेकिन इतने सालों के बाद, कर्नल पुरोहित को जमानत देना और इस से पहले इसी केस में सह आरोपी के प्रति सरकारी और गैर सरकारी दोनों के व्यवहार में आयी नरमी को महसूस किया जा सकता है, मेरा व्यक्तिगत यँहा कोई द्रष्टिकोण नही है लेकिन एक सवाल है की अगर कर्नल पुरोहीत, वाकई में जमानत के हकदार थे तो उन्हे इतना समय जेल में क्यों रखा गया ? वही दूसरी तरफ क्या सरकार या जांच एजेंसियां, मलैगावँ ब्लास्ट को किसी दूसरे द्रष्टिकोण से जांच करने का मन बना रही है (http://www.thehindu.com/news/national/sc-grants-bail-to-lt-col-shrikant-purohit-in-2008-malegaon-case/article19533145.ece/amp/)

यँहा बाबा राम रहीम, की खबर जब ढलान की और लुढ़क रही थी तब एक और जानकारी सार्वजनिक की जाती है की नोटबंदी के दौरान, अमूमन 99% तक सभी पुराने 500 और 1000 के नोट, आरबीआई को वापस मिल गये है, मतलब नोटबंदी के तय वक़्त के दौरान ये सारी धन राशि बैंकों में जमा करवा दी गयी, लेकिन इस खबर को इतना जोर नही दिया गया जीतना नोटबंदी की घोषणा के समय, विशेषकर इसके पक्ष में हो हल्ला किया गया था,  लेकिन जब हमारा मीडिया बाबा राम रहीम की सुर्खियां बटोरकर फुला नही समा रहा था लेकिन वास्तव में ये खबर कई और महत्व पूर्ण खबरों को ढक रही थी.

आज मीडिया फिर वह चाहे गोरखपुर में बच्चो की अस्पताल में इलाज अधीन मोत हो या बीएचयु में छात्राओं , सुरक्षा के संदर्भ में किया जा रहा आंदोलन ही क्यों ना हो इस तरह की खबरों पर विशेष ध्यान दे रहा है, ये सरहानीय भी है इसी का नतीजा है की एक आम दर्शक को यही लगता है की मीडिया सरकारी व्यवस्था के प्रति कठोर रवैया अपना रहा है लेकिन सवाल यही है की इन खबरों को भुना कर मीडिया खबरों के किसी ओर घोसले में जाकर बैठ जायेगा जबकि गोरखपुर में आज भी बच्चो के इलाज में कोई सुधार आया है या नही ओर इस से पहले बच्चो की मौत नही हुई थी यँहा सभी जगह मीडिया की गैर मौजूदगी, स्तय की खबरों पर सवालिया निशान जरूर लगाती है. इसी तरह बीएचयु में भी छात्राये पहले भी सुरक्षा के लिये आवाज उठाती रही है इसी के तहत आज बीएचयु खबरों में बना हुआ है और ये अध्धयन का विषय होगा की इन सभी खबरों के बाद क्या छात्राओ को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध करवाई जायेगी ? आगर नही, तो क्या उस समय भी मीडिया यँहा मौजूद रहेगा ? अगर पंचकूला, गोरखपुर ओर आज वाराणसी इन सभी खबरों के स्थान पर नजर डाले तो हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अभी तकरीबन 3 साल तक विधानसभा चुनाव होने संभव नही लग रहे, मसलन चुनाव दूर है एक आम इंसान की भावना अगर आहत भी होती है तो इसका असर अभी चुनाव पर नही पड़ेगा, लेकिन अगर वास्तव में इन खबरों का असर होता तो, राजनीतिक और अफसर साही के उच्च अधिकारों की जवाबदेही में बहुत बड़ा परिवर्तन होना चाहिये था परंतु ऐसा होता हुआ दिखाई नही दे रहा.

अगर, मीडिया के उन प्लेटफार्म को छोड़ दिया जाये जो सच पर पहरा दे रहे है और आर्थिक तंगी से गुजर रहे है ओर यही एक खबर को खबर को दिखा रहे है, इनके सिवा आज सबसे तेज, हर खबर तक नजर रखने का दावा करने वाले बड़े बड़े मीडिया हाउस अपनी खबरों की विश्वनीयता को आम जनता में खो रहे है और आज आम जनता मीडिया की खबरों पर शंका की नजर से देख रही हैं, बाबा राम रहीम से लेकर बीएचयु के छात्राओ के आंदोलन तक, बेरोजगारी, जीएसटी के कारण व्यपार ओर जीडीपी में आ रही कमी, सीकर का किसान आंदोलन, मेघा पाटकर ओर बाकी लोगो का नर्मदा बांध के शिलान्यास के बाद पुर्नवास पर चल रहा आंदोलन वंही गुजरात में नर्मदा बांध के शिलान्यास के कारण जगह जगह तस्वीर के माध्यम से श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी का आभार व्यक्त किया जा रहा है , गुजरात में प्राइवेट केबल जो घर घर तक जाता है आज NDTV हिंदी को नही दिखा रहा (GTPL ch नो. 238) ,ओर इसी दौरान चावल के फसल की कटाई ओर गेहू की बिजाई, यही समय है जब किसान के पास पैसा होता है और व्यपार में बढ़ोतरी देखने को मिलती है लेकिन त्योहारो के इस समय बाजारों की रौनक ही गायब है, इत्यादि ये सारी खबरे आज मीडिया से गायब है, इसी बीच मलेगावँ के एक ओर आरोपी श्री रमेश उपाध्याय को भी माननीय अदालत ने जमानत दे दी है, एक दर्शक के रूप में आप समझ सकते है की किस तरह आज मीडिया कुछ खबरों को सनसनी बनाकर बाकी महत्वपूर्ण खबरों से अंजान बन जाता है लेकिन क्या इस तरह का मीडिया का बर्ताव, एक उजागर समाज के हीत में है, क्या अगर आज किसान आर्थिक मदहाली के कारण आत्म दाह करने का दुखद फैसला करता है तो इसका जवाब दार, सरकार, समाज के साथ साथ हमारा मीडिया भी नही होगा.

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