देश में स्किल की कमीं नहीं । बीएड बेरोजगारों के बारे में

Posted by Rajvendra Singh
September 3, 2017

Self-Published

पिछले दिनों शिक्षा निदेशालय में B.Ed बेरोजगारों का चल रहे आमरण अनशन में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ। एक तरफ जहां भारत सरकार देश में कुशल और स्किल्ड लोगों की कमी होने के दावे के साथ कौशल विकास, स्किल इंडिया के नारे के साथ प्रोग्राम चला रही है, तो दूसरी ओर सरकार द्वारा सर्टिफाइड योग्य, कुशल और स्किल्ड नौजवान काम की मांग को लेकर यहां वहां धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन , भूख हड़ताल, आमरण अनशन कर रहे हैं। उस धरने पर बैठे नौजवानों M.A. B.ed और TET क्वालिफाइड थे और उनमें से कुछ UGC नेट भी क्वॉलिफाइड थे। वह सरकार के द्वारा निर्धारित किए गए सभी मानकों को पूरा करते हुए शिक्षक होने की संपूर्ण योग्यताएं रखते हैं, फिर भी उनको काम पर नहीं रखा जा रहा है । उनकी फौरी मांग थी कि उच्च प्राथमिक विद्यालयों में खाली पड़े पदों पर जूनियर टीईटी क्वॉलिफाइड बेरोजगार छात्रों से डायरेक्ट भर्ती किया जाए तथा साथ ही TET क्वॉलिफाइड सभी नौजवानों को शिक्षक के रूप में काम दिया जाए और रिटायर्ड टीचरों से कामचलाउ इंतेजाम न किया जाए। यहां यह कहना जरूरी है कि 2002 में हुए संविधान के संशोधन के बाद शिक्षा मौलिक अधिकार हो गई है और 6 वर्ष से लेकर 14 वर्ष के बच्चों को अर्थात कक्षा 1 से लेकर कक्षा आठ तक निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए सरकार जिम्मेदार है, और 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम आने के बाद से सरकार न केवल 6 से 14 साल के बच्चों को शिक्षा देने के लिए कर्तव्य बद्ध है , बल्कि गुणवत्तापरक शिक्षा देने के लिए बाध्य है । यहां यह कहना भी जरूरी होगा कि सरकारी नीतियों के चलते कक्षा 1 से लेकर 8 तक चलने वाले सरकारी विद्यालय अव्यवस्था का शिकार हो गए हैं तथा शिक्षकों के अभाव और शिक्षकों को शिक्षणेतर कार्यों में लगाए रखने तथा शिक्षा को मूल फोकस में ना रखने के चलते सरकारी विद्यालयों की हालत खस्ता हो गई है और सरकारी विद्यालयों में मध्यान भोजन, किताबें , यूनिफॉर्म आदि फ्री मिलने के बावजूद बच्चों की संख्या कमतर होती जा रही है, क्योंकि सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर, कुछ विद्यालयों के अपवाद को छोड़ दिया जाए तो दिनों दिन बद से बदतर होता जा रहा है । इसलिए कोई अभिभावक अपने बच्चे का भविष्य बर्बाद नहीं करना चाहता और दूसरी तरफ जगह जगह खुले निजी स्कूलों के प्रचार के चलते गरीब से गरीब अभिभावक भी अपने बच्चों को यह समझते हुए कि निजी विद्यालयों में उनके बच्चों का भविष्य सुनहरा बनेगा अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। यहां यह देखने की बात है की जो शिक्षक उन निजी विद्यालयों में शिक्षक के रूप में पढ़ा रहे हैं, उनकी योग्यता का मानक क्या है ? जहां एक ओर शिक्षा का अधिकार अधिनियम आने के बाद से टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट पास करना शिक्षक होने के लिए अनिवार्य हो गया है, वहीं निजी स्कूलों में शिक्षक के रूप में पढ़ा रहे लोग अधिकांशत टीईटी पास नहीं है। फिर सरकार ने निजी विद्यालयों को मान्यता क्यों दे रखी है? जबकि सरकार द्वारा स्थापित मानक और गुणवत्ता यह विद्यालय पूरा नहीं करते हैं। इसी तरह से निजी विद्यालयों में भवन आदि का भी हाल है। शिक्षा के मूल अधिकार हो जाने के बाद जब 6 से 14 साल के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेवारी पूर्णतया सरकार की है, तो फिर इन निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की महंगी फीस अभिभावक क्यों भरे। सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता में गिरावट के चलते ही अभिभावक निजी विद्यालयों में बच्चों को भेजने के लिए विवस है । अतः 6 से 14 वर्ष के बीच के बच्चे चाहे वह निजी विद्यालय में पढ़ रहे हो या सरकारी, उनकी जिम्मेदारी पूर्णतः सरकार की है। इसलिए उन पर होने वाले सभी खर्चे फीस आदि सरकार को वहन करना चाहिए। दूसरी बात यह की निजी विद्यालयों में भी गुणवत्तापरक शिक्षा को सुनिश्चित करने के लिए विद्यालय भवन का निर्धारित मानक तथा उस विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता का निर्धारित मानक भी निजी विद्यालय को मान्यता देते समय सरकार को देखना चाहिए, अर्थात जो विद्यालय सरकार द्वारा निर्धारित क्षमता का भवन और सरकार द्वारा निर्धारित योग्यता रखने वाले शिक्षकों की निर्धारित संख्या नहीं रखते उन्हें सरकार द्वारा मान्यता नहीं दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही यह बात भी जरूरी है, कि जो नौजवान सरकार द्वारा निर्धारित योग्यता रखते हैं , सिर्फ उनसे ही शिक्षक का काम लिया जाय। यहां यह भी कहना जरूरी है, कि निजी विद्यालयों के प्रबंधक मुनाफा लूटने की होड़ में योग्य शिक्षक नहीं रखते और निर्धारित न्यूनतम वेतन भी शिक्षकों को नहीं दिया जाता और हर साल शिक्षक बदल दिए जाते हैं ताकि शिक्षकों को पूरे साल का वेतन देना ना पड़े, जबकि बच्चों से पूरे साल की फीस वसूल की जाती है, जिसके परिणाम स्वरुप शिक्षा के कार्य में लगा व्यक्ति हमेशा अनिश्चितता में रहता है और उसके सामने मैनेजमेंट की मनमानी को बर्दाश्त करने के सिवा कोई विकल्प नहीं रहता। अतः वह पूरे समर्पण के साथ शिक्षक का काम नहीं कर पाता और अपने भावी जीवन को सुरक्षित करने के लिए वह निरंतर अन्य विकल्पों की ओर प्रयासरत रहता है, जिससे निश्चय ही शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है और शिक्षा एक लूट का साधन बन जाती है। यहां यह भी कहना जरूरी है कि जहां एक ओर निजी उद्योगों, कारखानों में भी श्रमिक सुरक्षा के कानून लागू हैं, शिक्षक जैसे नोबेल प्रोफेशन में सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन, आदि का कोई कानून लागू नहीं है, अर्थात शिक्षक को फैक्ट्री मजदूर के बराबर भी अधिकार नहीं दिया गया है। हम कहना चाहते हैं की सरकार 6 से 14 वर्ष के बच्चों को पढ़ाने वाले सभी सरकारी निजी स्कूलों की आर्थिक जिम्मेदारी अपने ऊपर ले, तभी सही मायने में शिक्षा के मूल अधिकार की अवधारणा को व्यवहार में लागू किया जा सकता है। दूसरी ओर निजी विद्यालयों में भी शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया, योग्यता,उनके वेतन भत्ते , उनके निष्कासन आदि की प्रक्रिया निर्धारित की जाए, जिससे निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम किसी शिक्षक को न दिया जाए और शिक्षक सुरक्षापूर्वक अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करें और उसके निष्कासन के पूर्व उस को कारण बताओ नोटिस अवसर और विधि द्वारा निर्धारित पूरी प्रक्रिया का पालन किया जाए जिससे सम्मान पूर्वक स्थायित्व के साथ शिक्षक अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर सकें अन्यथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम और शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाना अधूरा है।
राजवेन्द्र सिंह अधिवक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद ।

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