धर्म के नाम पर, समाज में वैमनस्य फैलाती सरकारे

Posted by Navendu Mishra
September 21, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

भारत हमेशा से गंगा जमुनी तहजीब का राष्ट्र रहा है. गाहे बगाहे कुछ कुछ घटनाये होती रहती है, परन्तु ये सब कुछ दिनों की मेहमान होती है और समाज वापस अपनी साम्यावस्था में आ जाता रहा है. भारत के समाज ने अपने इतिहास में अनेकों दंगे देखे और उसके बाद और मजबूत होकर सामने आया. हर दंगे में सरकारों की भूमिका हमेशा से ही संदिग्ध रही है. पर अब तो हद हो रही है, जब सरकारे खुले आम भारतीय संविधान के धर्म निरपेक्षता के मूल अर्थ को दरकिनार करते हुए ऐसे फैसले ले रही है जो सामाजिक एकता के लिए खतरा नज़र आ रहे है.

चाहे वो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का जेलों में धूम धाम से जन्माष्टमी मनाने का मसला हो या फिर ममता सरकार का दुर्गा पूजा के बाद विसर्जन का. ये जिस प्रकार अपने राजनैतिक धेयों को साधने का प्रयास कर रहे है वो हमारे समाज के आने वाले भविष्य के लिए खतरनाक है. यूँ तो लोकतान्त्रिक देश के सभी नागरिक सामान है पर राजनैतिक दलों के लिए ये धर्म, जाति, संप्रदाय और रंगों में बटे हुए है. यदि हमें पिछले दशकों की राजनीती देखे तो संवैधानिक मूल्यों को जैसे राजनैतिक दलों ने तर्पण कर नई नवेली राजनीती तैयार कर ली वो है तुष्टिकरण की.

कोई भी सरकार अब जन संवाद पर यकीन नहीं रखती, बस सत्ता में आते ही साथ अपने को राजा और जनता को प्रजा मानने लगती है. और उन नीतियों को बनती है जो उसके वोट बैंक के लिए लोक लुभावन हो और नागरिकों के मौलिक जरूरतों की जगह उनके सबसे कमजोर हिस्से धर्म को ध्यान में रखती है. बिन जन संवाद के फैसले समाज में एक तरह की गलतफहमी फैलाते है ये सब सरकारे जानती है, पर अंग्रेजों से सीख लेते हुए अब वे भी दो धडों में समाज को बांटने में लगी हुई है. जैसे आज़ादी की लड़ाई को कमजोर करने के लिए अंग्रेजों ने आरएसएस और मुस्लिम लीग को बनाया था वैसे ही उस रस्ते पर कुछ पार्टियाँ चल पड़ी है.

धर्म में  बटे समाज को साधने के प्रयास में जाने अनजाने तरीके से वे सरकारे भी हिस्सा बन रही है जो असल में देश में धर्मनिरपेक्षता की पक्षधर है. और इस खेल का हिस्सा बनी हुई है. बिन जन संवाद के लिए हुए फैसले जनता की मनोस्थिति में जो प्रभाव डालते है वो बहुत ही घातक है. जरूरत है व्यापक जन संवाद की जहाँ सांप्रदायिक ताकतों से लड़ा जा सके और व्यापक रूप से समाज के समस्त समूहों को साथ लाकर आपसी संवाद को बढाया जाए. ये नागरिक के तौर पर हमारा कर्त्तव्य बनता है की हम देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बचाए और सरकारों द्वारा फैलाये जा रहे इस भ्रम जाल से बाहर आकर नागिरको की मौलिक सुविधाओं शिक्षा, स्वस्थ्य, न्याय की बातों की ओर ध्यानाकर्षित करे.

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.