प्रदेशिक भाषा में सच बोलना क्यों खतरनाक है ?

Self-Published

दिल्ली यूनिवरसिटी में कार्यरित प्रोफेसर श्री अपूर्वानंद, के लेख और किसी ना माध्यम से दिये गये कथन बहुत ज्यादा सहज और सटीक होते है, बहुत सहजता से धीमी गति से इनके द्वारा कही गयी बात बहुत ज्यादा समाज की मनोवैज्ञानिक या स्थित को बयान करती है, इसी लहजे में इनके द्वारा हाल ही में बंदूक की गोली से कत्ल की गयी, कन्नड़ की जानी मानी पत्रकार गोरी शंकर की हत्या के संदर्भ में दिया गया कथन बहुत ज्यादा सटीक और हक्कित के नजदीक लगता है, प्रोफेसर साहिब, लंकेश की हत्या के साथ पीछे के समय इसी तरह जिन पत्रकारों की हत्या की गयी है, उन सभी घटनाओं को जोड़कर एक सत्य बयान करते है की ये सभी अपनी अपनी प्रदेशिक भाषा या अपनी ही जुबान में पत्रकारिता करते थे और उसी समाज मसलन अपने ही समाज की कुरीतियों को किसी ना किसी रूप से आवाज के माध्यम से लोगों तक पँहुचा भी रहे थे और अपने दम पर ये समाज को जागृत करने की निरंतर कोशीश कर रहे थे, एक यही वजह थी की समाज की जटील बन गयी मानसिकता और इस से जिन चंद लोगो को निरंतर फायदा हो रहा था, वह अक्सर इस तरह की आजाद आवाज को सुनना नही चाहते.

अगर साल 2002 में सिरसा में स्थित डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा राम रहीम के खिलाफ सत्य को उजागर कर रहे वही के पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति की हत्या हो या फिर बिहार के बाहुबली मोहम्मद शहाबुदीन के गढ़ सिवान में पत्रकार राजीव रंजन की हत्या, इसी सिलसिले में अब पत्रकार गोरी लंकेश की हत्या, अगर यही संदर्भ बुद्धिमान समुदाय और आरटीआई कार्यकर्ताओ के सिलसिले में देखे तब भी ज्यादा हलात सामान्य नही है, एमके कुलबर्गी, आस्था में फैले अंधविश्वास के खिलाफ आवाज बुलंद करते थे, इसी तरह से नरेंद्र दाभोलकर जो इसी तरह अंधविश्वास और जादू टोने के खिलाफ मुहिम को आगाज दे रहे थे और इसके प्रति एक ठोस कानून की मांग सरकार से कर रहे थे, गोविंद पानेशर अंतरजातीय विवाह के पक्षधर थे और पुत्र संतान के लिये करवाये जा रहे पुत्रकामेष्टि यज्ञ का लगातार विरोध कर रहे थे, इसी श्रेणी में आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा का नाम भी शामिल है जो भरस्टाचार और गैर कानूनी माइनिंग खासकर गीर जंगल में हो रही खुदाई और शेरो के मारे जाने के खिलाफ आरटीआई और दूसरे माध्यमो से आवाज बुलंद कर रहे थे, इन सभी को चुप करवाने के लिये इनकी हत्या कर दी गयी जँहा आरोप राजनीति, भर्ष्टाचार, बाहुबली से लेकर आस्था के सरंक्षण में फल फूल रहे नामी गिरामी संगठन और व्यक्तियों पर लगे है, ये बात और है की अभी तक इन सभी मामलो में या तो जांच चल रही है या कोर्ट में अपराध विचारधीन है.

अगर इन सभी हत्याओं को देखै जो गुजरात, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और देश के बाकी राज्यो में हुई है वँहा हत्या करने का ढंग एक ही तरह का था मसलन घात लगाकर कत्ल करना और दूसरा तथ्य के ये सभी पत्रकार, बुद्धिमानी और आरटीआई कार्यकर्ता, सभी अपने प्रदेश,समाज में अपनी ही भाषा से किसी ना किसी प्रकार से समाज को जागृत कर रहे थे फिर वह चाहे समाज में जातिवाद को दूर करना हो या आस्था के नाम पर हो रहा अंधविश्वास हो या भृस्टाचार में लिपटा हमारा राजनीति तंत्र ही क्यों ना हो, इन सभी का परिणाम हत्या ही है, और इन सभी घटनाओं से एक सवाल तो जेहन में उभर कर आता है की क्या हमारे ही समाज में हमारी ही भाषा में सच बोलना ज्यादा खतरनाक हो गया है ? अगर हाँ तो इसके कारण क्या हो सकते है ?

अगर, ज्यादा गहराई में भी जाकर इसका अध्ध्यन करे तो मुख्यतः तीन कारण उभर कर आते है, जिसमे सबसे पहला कारण, समाज और इसकी मानसिकता है जँहा आस्था और जातिवाद का बहुत बड़ा स्थान है समय समय पर इसके खिलाफ आवाज तो जरूर उठाई गयी है लेकिन इसे अक्सर बुरी तरह से कुचल दिया गया है, कहने को हम आज 21वी सदी में है लेकिन आज भी मेट्रो सिटी को छोड़ दे तो दूर दराज कस्बो और गावँ में आस्था और जातिवाद बहुत बड़ा मुद्दा है और इसी के आधार पर समाज बट जाता है एक वह समाज है जो सदियों से आस्था के नाम पर अपनी मोहर भगवान के भक्तगण में सबसे अग्रिम पंक्ति पर लगाता आया है वही जातिवाद के नाम पर भी ये समुदाय समाज में अग्रिम होने का मान रखता है, यँहा आस्था और जातिवाद तो एक पहचान मात्र है लेकिन इसकी आढ़ में शिक्षा, रोजगार, समाज के उस हर क्षेत्र पर ये समुदाय अपनी पैठ जमा लेता है जँहा से समाज में एक ताकतवर और बाहुबली की छाप उभर कर आती है, आज यँहा, जब हमारा दिल्ली का मीडिया कोसो दूर है और कानून भी आस्था और जातिवाद का पहनावा पहन कर खड़ा है, वँहा किसी भी प्रकार से आस्था के नाम पर किया जा रहा या प्रोत्साहित किया जा रहा अंधविस्वास या जातिवाद, जिससे समाज में एक ही तबकके को ताकतवर होने का मान प्राप्त है वहाँ इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना मतलब उन ताकतवर लोगो के खिलाफ आवाज उठाना है जो इसी आस्था और जातिवाद के सरक्षण में सदियों से पनप रहे है और आज भी बहुत ज्यादा ताकतवर है, मतलब समाज में ताकत की मानसिकता को चुनोती देना बहुत ज्यादा खतरनाक हो सकता है और अगर जरूरत पढ़ जाये तो आवाज को चुप करवाने के लिये जान भी ली जा सकती है.

1947, की आजादी के बाद, राजे रजवाड़ो का दौर एक तरह से खत्म करके, भारत को लोकतंत्र देश बनाया गया जँहा देश का सविधान सबसे ऊपर था और चुनाव के जरिये देश का नागरिक सरकार को चुनने का अहम पाल रहा था, लेकिन यँहा भी समाज का वही तबक्का हावी रहा जो सदियों से समाज पर अपनी पैठ बनाकर बैठा है, हाँ राज करने का तरीका नया हो गया, अगर आज के संदर्भ में भी चुनाव प्रक्रिया को देखै तो लोकसभा, विधानसभा और यँहा तक गावँ के सरपंच के चुनाव लड़ने के लिये भी एक तय राशी चुनाव आयोग के पास जमा करवानी होती है, मसलन देश की अधिकाँश आबादी जो दो वक़्त का आहार मुश्किल से जुटा पाती है, वह कभी भी इस चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा नही ले सकती या अगर दूसरे शब्दों में कहा जाये की गरीब वर्ग को चुनाव में खड़ा होने से रोक दिया जाता है तब भी गलत नही होगा. समय समय पर चुनाव प्रक्रिया को ज्यादा सामाजिक लाभ और सुधार के लिये नये नये प्रयास किये जाते है मसलन सरपंच चुनाव में कई गावो में पिछड़ी जाती और महिलाओं के लिये सुरक्षित रखी जाती है लेकिन यँहा भी वही व्यक्ति चुनाव में खड़ा हो सकता है और जीत सकता है जिस के सर पर गावँ के ताकतवर, उच्च जाती समाज का हाथ हो. हमारे समाज की रचना और मानसिकता को इस तरह आस्था और जातिवाद के नाम पर ढाला गया है की यँहा समाज का एक वर्ग, मुख्यतः उच्च जाती का समुदाय परोक्ष या अपरोक्ष रूप से व्यवस्था में अपनी ताकत बना कर रखता है और समय समय पर इसका एहसास भी करवाता है.

1947 से आज तक, समाज के द्वारा पैदा किये जा रहे व्यवसाय और रोजगार के अवसर मसलन शिक्षा, स्वास्थ, इत्यादि और इसी के साथ देश और राज्य की जमीन से लेकर हर तरह की मिल्कीत पर सरकार का ही सवैधानिक हक है, और सरकार से मतलब सरकार में मौजूद लोग, ये वही है जो सदियों से ताकतवर है और अक्सर शाशक कोई भी रहा हो ये हर शाशन में भागिदार रहे है, इसी के चलते अगर हम हर राज्य पर एक नजर करे तो यँहा मेडिकल कॉलेज से लेकर हर तरह के शिक्षा संस्थान पर अक्सर राजनीति से जुड़े लोगों का ही वर्चस्व है और रहेगा, वही सरकार द्वारा हर तरह के समाज सुधार और विकास के प्रति किये जा रहे कार्य और कॉन्ट्रैक्ट, पर इन्ही लोगो का दबदबा होता है जो आज सरकार और राजनीति में एक बड़ा कद रखते है, इस से विशेष कानून व्यवस्था यँहा भी सरकारी पुलिस इन्ही राजनीतिक व्यवस्था के अधीन है, इस तथ्य को समझने के लिये की आज भी राजनीतिक व्यवस्था पर उच्च जाती और आस्था से जुड़े लोगो का पहरा है इस के लिये अगर हम अमूमन हर राज्य के मुख्यमंत्री या मंत्रिमंडल पर ध्यान दे तो यँहा वही लोग है जो उच्च जाती से है और सामाजिक जिंदगी में एक उच्चा और आर्थिक रूप से अमीर तबक्का रखते है. क्रिकेट टीम से लेकर व्यपारिक घरानों पर अगर नजर रखे तो यही उच्च जाती का एहसास होता है. लोकतंत्र के चार कहे जाने वाले सतंभ में इसी उच्च जाती के लोगों का वर्चस्व है फिर वह मीडिया का एडिटर हो या कानून का कोट पहनने वाला कोई बड़ा वकील.

अब, उच्च जाती, राजनीति, व्यवसाय, इन सभी पर अपना दबदबा बना कर रखने के लिये आस्था का सरक्षण बहुत जरूरी है, क्योकि आज भी किसी तरह से आस्था पर सवाल उठाने पर, समाज में पनप रही आस्था के प्रति कटरता का एहसास होता है मसलन आप किसी भी रूप से आस्था पर सवाल नही उठा सकते, और सिरसा के छत्रपति से लेकर कन्नड़ की पत्रकार गोरी लंकेश अक्सर राजनीति, भृस्टाचार, अंध्विश्वास पर सवाल पूछते रहे है और नतीजन इन्हे चुप करवाने की।कवायद भी होती रही है. अगर थोड़ा सा पीछै के वक़्त में नजर डाले तो फूलन देवी को डाकू फूलन देवी बनाने में और उनकी हत्या करने के पीछे कारण कुछ भी हो सकते है लेकिन विचारधारा यही जातिवाद और आस्था के प्रति कट्टरता की ही थी, इसके पीछे 14वी और 15वी सदी में संत कबीर जैसे कई प्रबल विचारधारा के मालीक हुये है जिन्होंने आस्था में फैले अंध्विश्वास के खिलाफ समाज को जागृत करने की निरंतर कोशिश की है. संत कबीर के कई ऐसे दोहे है जँहा उन्होंने मूर्तिपूजा या किसी भी प्रकार से पत्थर को पूजने को नकारा है लेकिन आज उन्हे कीस रूप में पूजा जाता है ये सोचने।और समझने की बात है, लेकिन कबीर जब तक जिंदा थे उनका विरोध अक्सर हमारे।समाज में होता रहा है और उनकी जिंदगी भी ज्यादा।सुखद नही रही लेकिन आज उनको समाज में बहुत बड़ा और उच्चा मुकाम है, इसी तरह तफ्तीश से पता।चलेगा।की गोरी शंकर की हत्या के पीछे कौन थे, समय पर उन्हे कानून सजा भी जरूर सुनायेगा, यँहा कातिलों के नाम कुछ भी हो सकते है लेकिन उनकी मानसिकता और विचारधारा क्या थी उसे समझने की जरूरत है, हो सकता है की समय रहते गोरी शंकर के नाम किसी ना किसी तरह से कोई संस्थान की नींव रख दी जाये जो उनके प्रति श्रधांजलि हो और उन्हे अमर रखने की एक कोशिश भी हो लेकिन सवाल यही है की जो समाज लंकेश की जिंदा आवाज को सुनने और समझने में असमर्थ रहा क्या ये समाज गोरी के जाने के बाद उन्हे समझ पाएगा ?

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