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BHU कैंपस में लोकतंत्र तोड़ देती है अपना दम।

Posted by Anupam Kumar
September 4, 2017

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देश भर के बड़े से बड़े और छोटे से छोटे विश्वविद्यालय में छात्र संघ के चुनाव हो रहे है।
हर जगह से छात्र संघ चुनाव की खबर सुनकर अच्छा लग रहा है की देश के नौजवान इसमें भाग ले रहे है।

सभी जगह पर लोकतंत्र से मिले अधिकार का प्रयोग छात्र-छात्राएं कर रहे है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है ऐसा हम सुनते है।
लेकिन जब बात अपने यूनिवर्सिटी बी.एच.यू की आती है तो ऐसा लागता है की यहाँ पहुचने से पहले ही ये लोकतंत्र बीच रस्ते में कही दम तोड़ देता है।

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योकिं यहाँ किसी भी तरह कोई लोकतंत्र नहीं है।
यहाँ अपनी बात कहने के लिए न विद्यार्थियों के लिए कोई मंच है
न कर्मचारियों के लिए कोई संघ।
सीधे शब्दों में छात्र-संघ नहीं है।

यहाँ सब कुछ मन मानी ढंग से होता है।
यहाँ वी.सी. ही सर्वे सर्वा होते है। उनका हर आदेश फरमान होता है।
उसको न मानने वाला यूनिवर्सिटी से बाहर कर दिया जाता है।

यहाँ लाखो रूपये देकर नौसिखिया को प्रोफेसर का पद दिया जाता है वही कर्मचारियों के पद के बहाली के लिए भी एक निश्चित रकम फिक्स है।

यहाँ छात्रों को पढने के लिए लाइब्रेरी मांगने पर 2 साल का निलंबन मिलता है और साथ 307, हत्या का प्रयास का मुक़दमा।
ऐसा कहा जाता है की छात्र राजनीती करते है।
अरे भाई लाइब्रेरी मांगने में राजनीती कैसी?
वैसे अगर अपने मुलभुत अधिकारों की लड़ाई राजनीती है तो क्यों न करे हम राजनीती।

देश के नायक भगत सिंह अपने लेख के माध्यम से कहते है की छात्रों को राजनीती करनी चाहिए।

वैसे अगर एक मांग राजनीति लगती है यहाँ के vc शाहब को तो वो ये बताये की,देश के राजनेताओं और मंत्रियों को बी.एच.यू कैंपस में क्यों जगह देते है।

और तो और
कर्मचारियों को अपने हक के पैसा और सुविधा मांगने पर धक्के मारकर विस्वविद्यालय से बाहर निकाल फेंका जाता है।

छात्रों को होस्टल में हर तरह की आज़ादी मिलती है लेकीन
जब बात छात्राओं की आती तो आज़ादी शब्द अपना नकारात्मक अर्थ ले लेती है
और आड़े आजाती है आदर्श,मूल्य और परंपरा। छात्राओं को नॉन वेज नही दिया जाता है,न ही इन्टरनेट के सुविधा। क्योकि वो लड़कियां है।
ऊपर से आरक्षण रूपी सवैधानिक अधिकार को भी ताक पर रख दिया जाता है।
यहाँ SC/ST और OBC के लगभग 90% पद खाली है।
यहाँ जाति,पैसा और सोर्स की जुगलबंदी पर आपको नौकरी और पीएचडी में एडमिशन मिलती है।
यहाँ आपको हर विभाग में एक खास जाति की बहुलता मिल जाएगी।
बी.एच.यू कैंपस जितना खुबसुरत है और जितनी अच्छी इसकी इमारते और हॉस्टल है।देश शायद ही कोई ऐसा कैंपस हो।
लेकिन इस कैंपस को कुरूप बनाने में यहाँ के लम्पट छात्रों बड़ा योगदान रहता है।
यहाँ सर सुंदर लाल अस्पताल है जिसे पूर्वांचल का एम्स कहा जाता है।जहाँ बिहार,यू पी,झारखण्ड,मध्य प्रदेश से लोग आते है अपना इलाज़ करवाने।
लेकिन जिस हिसाब से यहाँ सुविधाओ में बढ़ोतरी होनी चाहिये,वो न के बराबर हुई है।
ऊपर से विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही के कारण,ऑक्सीजन सिलिंडर में मिलावटी गैस के कारण कई बच्चो की जान जा चुकी है।
पर इस अमानवीय घटना के दोषियों पर कोई करवाई नहीं हुई क्योकिं यहाँ कोई बोलने वाला नहीं है या यहाँ कोई मंच नहीं है जिसे जरिये इसके खिलाफ आवाज़ उठाई जाय ताकि भविष्य में इस तरह की कोई लापरवाही न हो।

कुल मिलकर बात यही समझ में आती है की भारत तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है पर बी.एच.यू कैंपस में लोकतंत्र क्यों नहीं है।
ऐसा क्यों है?
क्यों छात्र-संघ की कई लंबी लड़ाई लड़ने के वाबजूद यहाँ का प्रशासन छात्र-संघ से डरता है?
आखिर लोकतंत्र से डर कैसा?
इस सवाल पर हम सभी छात्र-छात्राओं को सोचना चाहिए।
क्यों हमारे कैंपस को लोकतन्त्र से महरूम रखा गया है?
और कैसे हम इस लोकतंत्र को वापस पा सकते है?
शुक्रिया।

इन्कलाब जिंदाबाद!

अनुपम

एम.ए दर्शनशास्त्र

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