“मन की बात”में मोदी के मन को न भा सकी उर्दू भाषा को तीन साल बाद भी स्थान न मिलने से रोष।

Posted by Mohammad Aadil
September 6, 2017

Self-Published

माननीय प्रधान मंत्री मोदी जी के सब से अजीज कार्येक्रम “मन की बात” देश के सभी हिस्सों में अलग अलग भाषाओं में प्रसारित होता है पर देश की दूसरी बड़ी बोली और सुने जनि वाली भाषा उर्दू को इस प्रोग्राम से दूर रखना अजीब लगता है हम ने कुछ लोगो से जब इस बारे में बात की तो पता चला की उर्दू भाषी पिछ्ले दो वर्षों से लगातार ड्रीम प्रोजेक्ट ‘मन की बात’ उर्दू भाषा में सुनने की उम्मीद लगाए हुए है भले ही मोदी सरकार को तीन साल पूरे हो चुके हो । जबकि ‘मन की बात ‘ हिंदी, अंग्रेजी भाषा के अलावा देश के विभन्न राज्यों के 19 भाषाओं में उपलब्ध है हैरानी की बात यह है कि देश में दूसरे नंबर पर बोली और समझी जाने वाली भाषा उर्दू में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘ मन की बत ‘ करना गवारा नहीं समझा । जबकि उर्दू भाषा देश के कई राज्यो की दूसरी सरकारी भाषा भी है ‘मन की बात ‘ में उर्दू भाषा को पी, एम, ओ द्वारा नज़र अंदाज़ करना प्रथम दृष्टया नफरत ज़ाहिर करता है इस कृत्य का विरोध और निन्दा कड़े शब्दों में होनी चाहिए क्यूंकि पी एम ओ के इस कदम से करोड़ो उर्दू भाषियों को मायूसी हुई है इस्तरहा आपने उर्दू भाषियों को अपने ड्रीम प्रोजेक्ट से महरूम किया है । कम से कम पीएम को तो देश के सभी नागरिकों का सामान रूप ध्यान रखना चाहिए।
एक तरफ हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “सब का साथ सब का विकास” का नारा देते नहीं थकते, वही उनकी सरकार उन्ही के कार्यालय से संचालित होने वाले कार्यक्रम में देश की जानी पहचानी और आम चलन में रहने वाली ज़ुबान उर्दू भाषा को उक्त प्रोग्राम में स्थान न देकर उर्दू के साथ खुला भेदभाव करने से नहीं चूकते। निसंदेह: पीएमओ का यह कृत्य अपने कामकाज पर प्रश्न चिन लगता है ? पीएमओ द्वारा जानबूझकर उर्दू भाषियों, उर्दू प्रेमियों को इस्तरहा अपमानित करने जैसा ही है। जबकि सच्चाई यह है कि उर्दू किसी मज़हब की भाषा नहीं है यह बहूत से लोगों की, तहज़ीब की भाषा है और हमारे पी एम पुरे देश को संबोधित करते हैं।
जबकि देश में विभिन भाषाओँ को विकसित करने एवं उनके कल्चर को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग विभाग संचालित हैं इसके बावजूद ” मन की बात” जैसे महत्वपूङ प्रोग्राम से उर्दू का आउट होना दुर्भाग्यपूड़ है। जो दमनकारी नीति को दर्शाता है और हमें सवाल पूछने को मजबूर करता है। इस मुद्दे पर हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी सरकार की कड़े शब्दों में निंदा एवं भर्त्सना करते है और कहना चाहते हैं कि भारत का इतिहास ऐसे भेदभाव के कार्य को कभी माफ़ नही करेगा। कम से कम लोकतांत्रिक देश के पी एम को तो ईमानदार और जवाबदेह होना ही चाहिए।

इस मुुुदे पर जब हम ने सलीम बेग आर,टी,आई, कार्यकर्ता और सोशल रिसर्चर से बात की तो वो कहते है कि इस मुद्दे को लेकर उन्होंने पीएमओ को भी पत्र लिखा है लेकिन अब तक इस को लेकर कोई प्रोग्राम उर्दू में प्रसारित नहीं हुआ है जिस से उर्दू प्रेमियो में रोष है। और उर्दू भाषा के साथ सौतेला व्यबहार दर्शाता है।सलीम बैग ने कहा कि इस से साफ स्पस्ट होता है कि पी ऍम मोदी अपने मन की बात उर्दू प्रेमियो को सुनाना ही नहीं चाहते।

लेख उर्दू भाषियो और सलीम बैग से बात चीत पर आधारित है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार है।

लेखक मुहम्मद आदिल।

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