“या तो ये या तो वो” वाली विचारधारा

Posted by Gunjan Jhajharia
September 1, 2017

Self-Published

शायद हम न्यूट्रल रहना भूल गए हैं। किसी भी एक विचारधारा को अंधे होकर सपोर्ट करना जानते हैं, या फिर पगलाए हुए विरोध करना जानते हैं। हम लोजिक्स पर बात नहीं करना चाहते। पिछले साल देखा गया था कि असहिष्णु शब्द बहुत चर्चा में रहा था, लोग ब्लेम गेम को अच्छा समझने लगे हैं।
लेकिन यह असहिष्णुता कोई एक साल या एक महीने में नहीं पैदा हुई । यह हमारे बीलीफ़ सिस्टम में रच-बस गयी है, काफी सालों से चली आ रही है।
हम वहीं हैं, जो बड़ी-बड़ी बातें अपने घर के गद्दीदार सोफे पर बैठकर अपने बच्चों को सिखाना चाहते हैं, लेकिन ख़ुद छोटी-छोटी बातें भी नहीं समझना चाहते।
हमारे ज्ञान के हिसाब से या तो एक छोर है या दूसरा, उसके बीच में कुछ नहीं। या तो हिन्दू है या मुसलमान, उसके बीच कोई और धर्म-भाईचारा-विश्वास नहीं। या तो हिंदी है या अंग्रेजी, उसके बीच कोई समझ-विचार-बातचीत नहीं। या तो बीजेपी है या कांग्रेस, उसके बीच कोई विचारधारा-तथ्य-प्रक्रिया कुछ नहीं।
हम हर चीज़ के दो छोर बनाने में माहिर हैं, जिसके एक छोर पर कुछ लोग जमा हो जाते हैं और कुछ लोग दूसरे छोर पर, फिर सब अपने छोर को खींचने में लगे रहते हैं, उसके बीच में या आगे-पीछे का कोई तर्क नहीं हमारे पास।
“या तो ये या तो वो” वाली विचारधारा हमें भीतर से खोखला कर रही है। इसी की तर्ज़ पर हम, हमारा मीडिया, हमारा समाज, गुंडे-मव्वाली, हमारी पॉलिटिकल पार्टीज़, और हमारी व्यवस्था काम कर रही है।
इसलिए मैंनें कहा कि हम न्यूट्रल रहना भूल गए हैं। अगर हम किसी भी बात को कहते हैं या उसका समर्थन करते हैं, तो हमारे पास उस बात का समर्थन करने के लिए ठोस वज़ह होनी चाहिए, तथ्य हों, जवाब हो, जो हम भली-भांति जानते हों, ना कि हमने कहीं से सुना हो। इस सुनने वाली बात पर यह भी बता दूं कि हम कान के कच्चे होते जा रहे हैं, जो भी बात जैसे भी हमें मीडिया या दूसरे सोर्सेज़ से सुनने को मिले, बिना जाँचे हम उसे मानने लगते हैं।
हमने एक बीलीफ़ सिस्टम बना रखा है, कुछ लोगों के लिए ज़ी न्यूज़ की कही बात पत्थर की लकीर है, कुछ के लिए इंडिया टीवी की, कुछ के लिए एनडीटीवी की, और कुछ के लिए पत्रिका की, या कुछ के लिए आज तक ही भगवान है।
हम समर्थन या विरोध लोग देखकर, चैनल का नाम देखकर, पार्टी का चुनाव-चिन्ह देखकर करते हैं।
हम निष्पक्ष रहना भूल गए हैं। हमारा बीलीफ़ सिस्टम हमें सिखाता है कि अगर मेरे भाई ने कत्ल किया है तो भी जैसे-तैसे करके उसे जेल ना जाना पड़े, उसे छुड़वा लिया जाए।
और राम-रहीम को गाली देने वाले हम लोगों की बुद्धि तब नहीं वाइब्रेट होती जब हमारे ही परिवार के किसी लड़के की अपनी बीवी के साथ मैरिटल रेप की बात सामने आए या फिर वो बलात्कार का दोषी पाया जाए , हम पूरी कोशिश करते हैं मामला रफ़ा-दफ़ा करवाने की।
तो फिर हम कैसे उम्मीद कर लेते हैं कि हमारी सरकार दूध की धुली होगी या हमारा मीडिया या फिर हमारा समाज कुछ गलत नहीं करेगा।
हमें चाहिए कि हम किसी भी बात को या विषय को पहले समझें, सारे पहलुओं पर जानकारी जुटाएं, जानकारी भी सही हो इसकी सत्यता जांचने की हर-सम्भव कोशिश हो, और फिर किसी बात का समर्थन या विरोध करें। और अगर इतना अब नहीं करते बनता, तो फिर यह कहना सीखें कि इस बारे में मुझे कोई जानकारी है नहीं, बजाय की मोदी है तो सही ही करेगा, या मोदी कुछ सही कर ही नहीं सकता। बजाय कि सारे मंत्री करप्ट हैं, या फलानी पार्टी के सही हैं सारे मंत्री। बजाय कि जरूर लड़की ने फसाया है या लड़के ने शोषण किया ही है-क्योंकि लड़के शोषण ही करते हैं।
हम “जानकारी नहीं है” कह सकते हैं, हम “जानने की कोशिश कर रहे हैं” कह सकते हैं, हम “सब जानते हैं, लेकिन कोई पक्ष नहीं बना पाए” कह सकते हैं, हम “मैं न्यूट्रल हूँ, कोई सा भी विकल्प हो, मुझे दिक्कत नहीं” कह सकते हैं।
हमें, हमारी मीडिया और हमारे समाज को इस “या तो ये या तो वो” वाले कलचर से निकलना होगा।ये हमें कहीं नहीं ले जाएगा।

हम सब हर बात में दो गुटों में बंटे हुए अपने अपने छोर को पकड़े , लटके हुए हैं। हम “कंस्ट्रक्टिव टॉक्स” करना नहीं जानते, हमने ऐसा कोई कलचर ही नहीं बनाया है, लेकिन आगे हमें ऐसा करना होगा, नहीं तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे ।

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