युवा संवाद की कुंद होती धार

Posted by Prashant Rawat
September 26, 2017

Self-Published

यूथ शब्द आने पर बरबस ही मन आनंदित, प्रफुल्लित, रोमांचित होने लगता है।

आशंकाओं के बादल छंटकर नई अभिलाषाओं और उमंगों को रास्ता देने लगते हैं।

और जब ये अभिलाषाऐं, उमंगें,आकांक्षाएं मन के संकरे और अस्पष्ट रास्तों से होकर धरातल पर अंकित होना चाहती हैं तब कोई सत्ता, संस्थान, समाज या फतबा उन नवजात विचारों को सदा के लिए कुचलकर रख देने के लिए तत्पर हो जाता है।

विश्व में सर्वाधिक लगभग  60 प्रतिशत युवाओं की आवादी वाला देश हमारा भारत भी यही तस्वीर पेश करता है। चाहे प्रकरण JNU का हो या BHU का या कश्मीर में पॉप संगीत गाती युवा बालाएं, आन्तरिक आवाज  एक ही है – आजादी।                        समझना सिर्फ ये है कि ये आजादी ‘आप से’  नहीं ‘आप में’  निहित है। हर समय युवाओं पर दम भरती सरकारें और संस्थान उनकी आवाज को दबाकर अपने श्रेष्ठ होने का संदेश तो पेश कर सकते हैं परन्तु लोकतंत्र में संवाद की धार को कुंद भी करते हैं।

शुरुआत JNU से, भारत के नम्बर 1 संस्थान में पढ़ने की चाह रखे युवा इस उम्मीद में यहां आते हैं कि यहां से निकल कर जिंदगी की गाड़ी सफलता के पहियों पर घूमेगी और ऐसा अधिकतम तौर पर ये संस्थान साकार करने का साधन भी बनता है.. लेकिन इस सब के बीच जो कारक इन छात्रों / छात्राओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है वह है – संवाद

जनवरी 2016 के प्रकरण ने इस धार को कुंद करने का प्रयास किया जिससे न सिर्फ JNU की प्रतिष्ठा धूमिल हुई बल्कि खौफ या भय ने भी संवाद पर पहरा बिठा दिया।

कश्मीर में तीन लड़कियों द्वारा  राॅक बैंड बनाने पर जिस तरह फतबे जारी किये गए वे न सिर्फ जम्हूरियत पर हमला था बल्कि हमारे संवैधानिक अधिकार पर भी।

आबिदा परवीन, मोहम्मद रफी., बिस्मिल्ला खां या ए. आर. रहमान जैसे दिग्गजों को सुनकर उन्हें खुद के साथ जोड़ने की चाह रखने वालों ने जब धर्म में संगीत के इस्तेमाल पर ही सवाल खड़ा कर दिया तो कहीं न कहीं मौला की मजार पर मन को शांति देती कब्बाली  पर भी सवाल था और साथ ही उनकी मोबाइल की रिंग टोन पर भी।

संगीत धर्म पर खतरा नहीं, खतरा हमारी और आपकी सोच को है हमी से।

ताजा प्रकरण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का जहाँ आए दिन छेड़खानी का शिकार होती छात्राओं ने 3-4 दिन पहले की घटना की शिकायत और अपनी कुछ बेहद जरूरी, जायज और धरातलीय माँगों को वी सी साहब के सम्मुख रखकर निस्तारण करवाना चाहा तब छात्राओं के हाथ लगी उल्टी फटकार और लाठियाँ।

जरा ठहरिये और सोचिए कि क्या दूसरा पक्ष अति दमनकारी,  पक्षपातपूर्ण  और  विचार थोपक नहीं हो गया है??

चाहे JNU हो, कश्मीर हो या BHU युवा नारों, संगीत या विरोध प्रदर्शन से अपने उद्गारों को बाहर निकाल रहा है, उन्हें बात करने वाले चाहिए उनकी आवाज दबाने वाले नहीं वे प्रोत्साहन चाहते हैं,  दमन नहीं।

सही गलत के फैसले भी संवाद से ही तय हो सकते हैँ दमन चक्र और नाटकीय घटनाक्रमों से नहीं इनसे दोनों ही पक्ष लोकप्रियता तो पा सकते हैं परन्तु मुकाम नहीं।

हमारी संस्कृति विभिन्न उद्गमों से निकली धाराओं के संगम की परिचायक है उनके विघटन की नहीं।            हम एक और सशक्त तभी हो सकते हैं जब युवा संवाद की धार कुंद नहीं बल्कि और विस्तृत होगी।

क्योंकि ‘शिक्षा व संवाद ही राष्ट्र की सबसे सस्ती सुरक्षा हैं ‘

ये तभी संभव है जबकि उनका लाठियों और जोर जबरदस्ती से दमन नहीं बल्कि  उनसे प्रेम पूर्ण संवाद स्थापित किया जायेगा।

आदमी को आदमी बनाने के लिए जिन्दगी में प्यार की कहानी चाहिए।                                           और कहने के लिए कहानी प्यार की स्याही नहीं आँखों वाला पानी चाहिए।। 

 

 

 

 

(नोटः लेखक राष्ट्र के विरूद्ध किसी क्रियाकलाप का समर्थन नहीं करता ना ही सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप की इच्छा रखता है वह देश का एक स्वतन्त्र नागरिक है जो अपने विचारों को बिना किसी को भावनात्मक ठेस पहुँचाए अभिव्यक्ति दे रहा है।   )

 

 

 

 

 

 

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