ये आंखे बच्चों बचपन छीन रही

Posted by पर शांत
September 3, 2017

Self-Published

सचमुच! मन करता है ये आँखे नोच लू. जो हर वक़्त यूं घूरती है. ये ऑंखें मांस की मुलायम नसों से नहीं एल्युमीनियम के महीन तारों से जुड़ी होती हैं. इनमें खून में बारीक़ लोथड़े नहीं प्लस और माइनस के चार्ज दौड़ते है. तो क्यूँ घूरने दूं. मैं इन नंगी आँखों को. जो खुद शीशे की है. जिनमे खुद कोई संवेदना नहीं, वो दर्द क्या समझेंगी.

बीते दिनों एक विडियो वायरल हुआ. बच्ची का, मार खा रही थी वो. उड़ के चला, सोशल मीडिया पर चला तो चला. व्हाट्सऐप के जरिए भी जगह बनाकर फोन की गैलरी में आकर धंस गया. कितना भी जी बचा लो, देखना ही पड़ेगा. देख लिया, क्या था कुछ नहीं. एक माँ, बच्ची को पढ़ा रही थी. शायद कई घंटों से, और बच्चा बस इरिटेट हो रहा था. होना ही था, वाजिब है. इतनी देर तक किसी को झलोगे के तो ऐसा ही होगा. ये बिलकुल नेचुरल रिएक्शन है, जो किसी के भी साथ हो सकता है, चाहे वो बड़ा हो या कोई छोटा बच्चा.


इसे देख के मुझे अपने बचपन का एक किस्सा याद आ गया. मैं छोटा था, शायद फर्स्ट या सेकंड क्लास की बात है, ठीक से याद नहीं. बड़ी वाली दीदी पढ़ाने बैठी. Sister, Mother, Father, Mother सबकी स्पेलिंग एक बार में पूछ रही थी. कई बार पूछी mother की बताऊ तो father की में लटक जाऊं mother और father दोनों बता दूं. तो ‘sister’ में लटक जाऊ. भरा बैठा इरिटेट हो रहा था, लेकिन दीदी है कि, जाने न दे. बोली सब सुनों तभी जाने दूंगी.

आज से लगभग 15 साल पहले जो खिसिहट उस समय मुझे हुई थी, ठीक हुबहू वही खिसियाहट इस बच्चे के चेहरे से इस समय टपक रही है. ये भागना चाहता है, मन नहीं होगा पढने का या इच्छा नहीं होगी, कारण कोई भी हो लेकिन जबरदस्ती इसे बैठाया… रुलाया… और आखिर में एक शीशे की आँखों के जरिए सैकड़ों आँखों में इस बच्चे का दर्द उतार दिया गया. जो शायद उसका था, सिर्फ उसका. लेकिन दूसरों के आँखों में उतरते ही वो मनोरंजन में तब्दील हो गया. तब वो, बिका… उड़कर बिका… लाखों नज़रों से होकर गुजरा लेकिन किसी के दिमाग में नहीं. फोन की गैलरी में कुछ MB की थोड़ी सी जगह जरूर बना पाया है. किसी ने संवेदना व्यक्त की किसी को कष्ट हुआ, 23 सेकंड के उस वीडियो में लोगो ने दुःख, प्यार, संवेदनाएं, क्रूरता सब दिख गई, लेकिन किसी ने उसमे बच्चे के रोने में खुद का बचपन नहीं टटोल के देख, अफ़सोस!

शीशे के इन आँखों, हमारी असली आंखे छीन ली है. CCTV हमारी सुरक्षा के लिए है, जरूरी है. लेकिन साथ ही कई बार ये एक डिबेट का टॉपिक भी रहा है कि बच्चो के शारीरक और मानसिक विकास को किसी भी कैंपस में लगे कैमरे कैसे प्रभावित करते है. इसके कई गंभीर प्रभाव भी है. सुरक्षा के तर्ज़ पर क्या उनके भविष्य के साथ समझौता किया जा रहा? बहुत सी चीज़े नेचुरल बिलकुल Genuine होती है. हमारी जोर की हंसी एकदम खिलखिलाहट वाली, जो शायद किसी भी कारण से आ सकती, दरवाजे के पीछे से खड़े होकर किसी को डराना, कभी किसी पर पानी फेंकने की तो कभी किसी लंच चुरा कर खाने…  किसी का भी बचपन इन ढेरों खट्टी-मीठी यादों के बीच जगह बनाते हुए ही गुजरता है लेकिन शीशे की आँखों की पहरेदारी के बीच या सब कुछ खत्म होता जा रहा है.

एक चीज़ और, सजा देने का तरीका आज से यही कोई 15 साल पहले और आज में ज्यादा कुछ नहीं बदला. बदला हैं तो सिर्फ किताबों के कुछ पन्ने, कोर्स के कुछ टॉपिक, ब्लैक बोर्ड शायद वाइट बोर्ड में तब्दील हो गया है, वो भी शायद कुछ स्कूलों में. इन मामूली चीजों को अगर छोड़ दिया जाए तो, शायद कुछ नहीं बदला है.

आज भी अगर कभी सुबह जल्दी उठकर सड़क पर निकल जाओ, रिक्शे पर बड़े से बस्ते ढेरों को किताबों, पानी की वाली लाल बोतल, बैग में ढक्कन पर गोल-गोल छर्रे वाले गेम वाला टिफ़िन, रिक्शे पर उछलते कूदते बच्चे और बच्चों की हँसे खिलखिलाते चेहरे सब कुछ वैसे ही नज़र आता है, जैसे पन्द्रह साल पहले था, कुछ नहीं बदला.

नंगी आँखों से ये सब देखो तो ये चीज़ दिमाग से जुड़ते हुए, हमें बचपन में उतार देती है. लेकिन शीशे की आँखों के जरिए ये नज़ारा बदल जाता है. हम बदल जाते है, हमारा नज़रिए बदल जाता है. CCTV का नजरे हमे शक की निगाहों से देखने को मजबूर करती है, ये हमें अपराधबोध कराती है. हमें पता है, इसके जरिए अपराध में कमी लायी जाएगी इसलिए इसके उस तरफ, जो दिख रहा वो गलत लगता है, वो अपराध है, और बिलकुल भी तर्कसंगत नहीं. ऐसा ही नजर आता है.

एक समय था जब ‘टीचरों का डर’ होता था, लेकिन अब ‘टीचरों को डर’ है. स्कूल छोड़े कई साल हो गए, अब स्कूल के टीचरों से कोई खास जुड़ाव भी नहीं है लेकिन वक्त बेवक्त स्कूल के मास्टर जी के अत्यचार के विडियो जरूर दिख जाते है., ‘टीचर की तमाचों से तिलमिलाया बच्चा’ टाइप हैडिंग के साथ. जिसमें मार खाने वाले बच्चे से ज्यादा दर्द तो वो लाखो व्यूअर फील कर लेते है. लड़का तो चार डंडा खाकर, मुस्कुरा के बस्ता लाद के, बस में लद कर घर निकल जाता है,  लेकिन यहाँ वहां उसके उड़ते विडियो मास्टर के गले हड्डी बन जाते है. ‘बच्चे कोमल होते है, उन्हें मरना गलत है’. यही सबसे बड़ी दिक्कत, कई बार कई गलत चीज़े का डर मार या डांट से ही होता है, और वो जरूरी भी है. सुधार के लिए.

अगर बचपन के सिलेबस में इस ‘मार’ के चैप्टर को पूरी तरह से एक्सक्लूड कर दिया जाए तो बहुत कुछ बदल जाएगा, या शायद सब कुछ!

इस मामले में Human Rights वाले कहां, तक राइट है. ये एक लम्बी डिबेट का विषय है. जिसे बाद के लिए छोड़ा जा सकता है. फ़िलहाल मुद्दा ये है, जिस मार-पिटाई ढोक बजाई के साथ उन पेरेंट्स का बचपन इतनी खूबसूरत बीता है. आज वही, जब उनके बच्चों के साथ हो रहा है, तो वो इतना घबरा क्यों रहें है? एक मिनट में 40 थप्पड़ पर बड़ी बड़ी बातें करने वाले भूल गए कि कभी इंग्लिश के चार वर्ड की स्पेलिंग के चक्कर में चालीस घूंसे उन्होंने नही खाए होंगे. फर्क बस इतना तब वो बात, वही रह गई और आज  डिजिटल इंडिया के इन इक्विपमेंट कारण 20X10 के क्लासरूम की बात सरे-बाज़ार होकर लोगो के व्हाट्सऐप ग्रुप में उतर रही है.

फ़िलहाल बात सिर्फ इतनी है कि मार-पिटाई, टीचर की डांट सभी कुछ बचपन का एक भाग है. जो कुछ सालों में गुजर जाता है, लेकिन आखिर में जीवनभर हमें यही सीख याद रहती है जो इस दौरान हम सीखते है. तो मेरे मानना है, कोमल बचपन को उसके प्राकृतिक रूप में ही बढ़ने देने चाहिए न कि उन्हें, इन गैजेट के सरर्विलांस में रखना चाहिए.  हमारे पास टेक्नोलॉजी और कुछ हाई-टेक गैजेट है, इसका मतलब ये तो नहीं कि हम किसी का बचपन उससे छीन ले. ये उनके हिस्से की खुशियाँ, ये उनके हिस्से की चीज़ है, उन्हें लेने दीजिये क्योंकि हमने तो अपने हिस्से के जी ही ली है!

 

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