रह रह कर 1984 को याद करवाया जाता है

Self-Published

बचपन से हिंदू समाज के बीच ही रहा हूँ, पढ़ा भी हिंदी माध्यम में हूँ, जँहा बहुताय दोस्त मित्र, सहपाठी, उत्तर भारत से खासकर हिंदी भाषित क्षेत्र से ही थे और जिनसे आज भी घनिष्ट मित्रता है, ये रिश्तों की डोर है जो क्रिकेट के मैदान से लेकर दीपाली और रक्षाबंधन के मधुर एहसास से होकर गुजरी है और अब ये बहुत ज्यादा मजबूत भी है, इतनी मजबूत है की कोई समाज की बुराई या अफवा इस डोर को तोड़ने में असमर्थ ही रही है, मुझे ये कबूल करने में भी कही भी कोई झिझक नही की इसी हिंदू, हिंदी, गुजराती समाज से मुझे सबसे ज्यादा अपनापन मिला है खासकर जिंदगी के हर कठिन मोड़ पर सहायता भी यही से मिलती रही है.

लेकिन एक जगह आकार अक्सर मैं खुद को अकेला।महसूस करता हूँ जंहा मुझे सुना तो जाता है पर वैचारिक कट्टरता इतनी प्रबल है की मेरे शब्द कही भी कोई असर नही रखते, अगर मैं मेरी परिभाषा दूँ, तो एक व्यक्ति, शरीर से ज्यादा हर इंसान की तरह मैं भी अपनी एक वैचारिक पहचान रखता हूँ, यही वैचारिक पहचान है जो हमैं समाज मैं हमारे रुतबे को ब्यान करती है, इसी वैचारिक गठजोड़ में आस्था का बहुत बड़ा अहम योगदान और स्थान है, खासकर भारत जैसे देश में जँहा हर एक किलोमीटर के दायरे में अनेकों धार्मिक स्थान अपनी मौजूदगी का एहसास करवाते है. जँहा, हम आज धर्म को एक कट्टरता के माध्यम से ही देखते है, वँहा मेरा ये व्यक्तिगत मानना है की जिस देश में सुरक्षा कर्मचारी और संसाधन की प्रति नागरीक बहुत ज्यादा कमी है उस देश में शांति का माहौल बना कर रखने में धर्म और मजहब का बहुत बड़ा योगदान है, धार्मिक आस्था सही मायनों में अगर सही दिशा में उभर कर आये तो ये एक जनजागरण समाज की रचना करने में अहम योगदान निभा सकती है, मसलन अगर हम स्वस्थ भारत का उदाहरण दे जँहा सरकार इसे लेकर बहुत ज्यादा प्रयास कर रही है फिर भी ये कार्य ज्यादा सफल नही हो पा रहा लेकिन इसी कार्य के अंतर्गत अगर धार्मिक स्थानों से सरकार की मदद की जाये और स्वस्थ समाज और देश का नारा दिया जा तो, यकीनन ये एक स्वस्थ समाज की बुनियाद रख सकता है, कहने का तातपर्य है की हमैं ये मानना चाहिये की आस्था का हमारे समाज में बहुत बड़ा और ऊँचा स्थान है और इसे सही दिशा देने से हमारे देश की काया पलट हो सकती है.

भारत, जैसे देश में जँहा दिवाली से लेकर ईद, गुरु नानक जयंती जैसे अनेक अलग अलग धार्मिक पर्व बड़े प्यार और हर्ष उल्लास से मनाये जाते है, इस हर्ष उल्लास को देखकर हमारे समाज की एक अमीर, बुद्धिमान पहचान उभर कर आती है, लेकिन ये सारे हर्ष उल्लास सामाजिक और धार्मिक रीतिरिवाज अक्सर, बधाई देने तक ही सीमित रह जाते है, कही भी इन पर सवांद नही होता की आखिर इन सभी पर्व का इतिहास क्या है ? या इतिहास में ऐसी कौन सी घटना घटित हुई थी जिसके संदर्भ में आज ये पर्व मनाया जा रहा है ? इसका कारण है की ये आस्थाये परस्पर एक दूसरे के विपरीत सिद्धांत पर कायम है, मसलन अगर भोजन, पहरावा, भाषा, मसलन जन्म से लैकर मोत तक, सारे रीती रिवाज परस्पर एक दूसरी आस्था के विरोधी है कही जन्म पर मुंडन कराया जाता है तो कही और रीती रिवाज है, उसी तरह इंसानी लाश को कही जलाने की संस्कृति है तो कही इसे दफनाने का रिवाज है.

परस्पर, विरोधी आस्थाओं का जँहा पहरा हो वँहा किस तरह दो समुदायों के बीच सवांद का रिश्ता कायम किया जा सकता है, मेरा मानना है की यँहा सवांद की उपस्थति समाज को जागृत बना सकती है और इसी की अनुपस्थति में एक तर्कहीन समाज की मौजूदगी का भी एहसास होता. बस यही है, मेरी समस्या जँहा मैं किसी भी तरह से ब्लूस्टार और इसी के माध्यम से जोड़कर दिखाया जा रहे संत भिंडरावाले और 1984 के नवम्बर में हुये सिख विरोधी दंगो में मारे गये अनगणित सिख नागरिक पर अपने विचार नही रख सकता, इसका कारण है मेरी आस्था जंहा अमृतसर का श्री हरमिंदर साहिब गुरुद्वारा साहिब सर्वपरि है और लेकिन इन्ही घटनाओं के समर्थन में खड़ा एक बहुसंख्यक समुदाय जिसकी नजरो में भिंडरावाले की तस्वीर एक खूंखार आतकवादी के रूप में हमारे मीडिया और व्यवस्था ने बना दी है.

वैचारिक रूप से मैं कही भी किसी भी जमीनी और वैचारिक लकीर का समर्थन नही करता, क्योकि मेरा मानना है की ये लकीरे ही है जो घर, समाज, देश, विश्व, आस्था, जाती, धर्म को बाटती है, वही कही भी सिख समाज या धार्मिक स्थान पर मैंने कभी भी किसी भी के खिलाफ नफरत को ब्यान किये जाने वाले शब्द ना सुने है और ना ही किसी ने कहै है, लेकिन मुझे ये कहने की जरूरत क्यों है ? आप समझ सकते है और आप ही इसका उत्तर खोजिये, मैं यँहा किसी भी रूप से 1984 और उस से पहले और बाद में घटीत घटनाओं पर कोई टिप्पणी नही करना चाहता हां एक वाक्य जरूर याद दिलाना चाहता हूँ, साल 1983 अक्टूबर, इस वक़्त तक शिरोमाणी अकाली दल और जनता दल का राजनीतिक गठबंधन था, केंद्र में कांग्रेस सरकार थी, शिरोमणि अकाली दल, आनंद पुर मतै के अधीन जेल भरो आंदोलन कर रहा था इसकी कमांड संत हरचरण सिंह लंगोवाल ने संभाल रखी थी, इसी के अधीन  हजारो के करीब गिरफ्तारियां हो चुकी थी और इसमे सेंकडो की तादाद में लोगो पर गंभीर इल्जाम लगा कर जेल में रखा गया जँहा 2 साल तक जमानत भी नही हो सकती थी, पुलिस फायरिंग में कई सिख नागरिको की मौत हो चुकी थी, यँहा राजनीतिक विरोध इस तरह था की 1982 की एशिया गेम में भी पंजाब के सिख समुदाय को जाने से रोका जा रहा, अकाली दल और संत भिंडरावाले पंजाब राज्य कांग्रेस सरकार की बर्खास्त करने की मांग कर थे इसी बीच अक्टूबर में एक राज्य सरकार की बस पर कुछ अज्ञात लोगों ने हमला कर उन लोगो को मार दिया जिनका पहनावा एक सिख का नही था, लेकिन इस पहचान के दायरे में सिख और हिंदु दोनों मारे गये, लेकिन मीडिया द्वारा इसे सिर्फ हिंदु कत्लेआम की तर्ज पर दिखाया गया, जिसका सीधा इल्जाम सिख समाज पर लगा और केंद्र की इंद्रा गांधी सरकार ने अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शाशन लगा दिया, इसी घटना के कारण जानता पार्टी और अकाली दल का राजनीतिक बंधन भी टूट गया, जंहा अकाली दल और भिंडरवाले को एक आतंकवादी के रूप में दिखाया गया, केंद्र की राजनीति में अकाली दल हाशिये पर चली गयी. मेरा यही व्यक्तिगत मानना है की इसी घटना ने ब्लूस्टार की नींव रखी, यँहा दो सवाल है की क्यों हमारे देश में जब भी कोई बहुसंख्यक समुदाय पर हमला एक आतंकवादी हमले के रूप में देखा जाता है ? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक मंशा नही होती ? क्या इस तरह बहुसंख्यंक समुदाय पर हमला होने से, हिंदू वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने की राजनीतिक इच्छा नही हो सकती ? खेर, इस घटना को अंजाम देने वाले आज तक पकड़े क्यों नही गये. (http://m.indiatoday.in/story/sikh-terrorists-gun-down-bus-load-of-passengers-in-punjab-delhi-mobs-react-against-sikhs/1/348721.html) हम भिंडरावाले को आज एक आतंकवादी कहकर उन सारे घटनाक्रम से मुह फेर लेते है जँहा ब्लूस्टार, सिख विरोधी दंगे और बाद में पंजाब का 10 साल का काला दौर जँहा हजारो की संख्या में सिख नागरिक को दंगो में या पुलिस की गोली से गद्दार, आंतकवादी, पाकिस्तानी कहकर मारा गया. और इस कत्लेआम के दोष में आज भी न्यायालाय में के कटघरे में कोई मुल्जिम बना कर पेश नही किया जाता. क्या हमारा।देश वास्तव में लोकतांत्रिक है ?

लेकिन कभी भी हमारा।मीडिया ये ईमानदारी से नही बताता की आनंदपुर मता क्या था ? यँहा पंजाब को राज्य के तौर पर ज्यादा अधिकार देने की मांग की गयी थी, उसी तर्ज पर जिस तरह 370 कश्मीर में लागू है वही सिख धार्मिक पहचान को सवैधानिक करने की मांग थी, जिसे अंग्रेज सरकार ने 1909 में बनाया था लेकिन आजाद भारत में ये कानून नही बनाया गया, खेर अब 1984 को बीते हुये 33 साल होने वाले है, हमारा मीडिया एक रश्मी रूप से जून और नवम्बर में 1984 की घटनाओं को याद कर अपनी ईमानदारी का सबूत भी देता है जँहा सिख कत्लेआम को श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से छुपा दिया जाता है मसलन अगर श्रीमती गांधी की हत्या सिख पुलिस कर्मी नै की तब ही सिख समाज को इन दंगो से गुजरना पड़ा.

एक उदहारण भी देना चाहूंगा हमारे मीडिया का प्रधानमंत्री श्रेणी के तहत एक निजी टीवी चैनल नै देश की आजादी के बाद से 20वीं सदी रहे प्रधानमत्रो और उनके राजनीतिक हालात के बारे में एक श्रेणी बंध प्रोग्राम बनाया और इसी के अंतर्गत 1977 से लेकर 1984 तक पंजाब के हालात एक डाक्यूमेंट्री के आधार पर दिखाये गये जिसकी शुरुआत एक अधूरी जानकारी से होती है मसलन 1977 मैं पंजाब के अंदर अकाली पार्टी की सरकार बनी जबकी पूरा सच ये था की यँहा अकाली और जनता पार्टी के गठजोड़ की सरकार बनी थी, वही आगे चलकर एक बड़ा पत्रकार बयान देता है की भिंडरावाले के सामने बड़े बड़े नेता जमीन पर बैठते थे लेकिन ये पत्रकार ये बताना भूल गया की फिर ये कैसे भिंसरवाले के सामने कुर्सी पर बैठा है, यँहा खासकर हिंदी पत्रकारिता में भिंडरावाले को बहुत क्रूर और निर्दयी खलनायक बनाकर पेश किया जाता है लेकिन क्या वास्तव में1 भिंडरावाला इतना क्रूर था इसी के बारे में यही पत्रकार पंजाबी इंटरव्यू में कुछ और कहते है, अब आप इसका निष्कर्ष निकालिये.

हिंदी लिंक: https://youtu.be/Phs7Wr96siI

पंजाबी लिंक:

लेकिन अब आप सोच रहे होंगे की ना ये महीना जून का जब ब्लूस्टार हुआ था और ना ही नवम्बर का तो मैं आज इस मुदै पर क्यों लिख रहा हूँ, वास्तव में इन दिनों सोशल।मीडिया पर एक।महीला एक श्रेणीबंद तरीके से सिख धर्म, समाज पर इस कदर घटिया शब्दावली का उपयोग कर रही है जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से सुन नही पा रहा, यँहा हमारे धार्मिक स्थान और धार्मिक।मर्यादाओं की खिल्ली उड़ाई जा रही है, वह भी एक महीला के रूप में. ये महीला जो नाम बता रही है वह गलत ही होगा लेकिन जिस तरह ये हिंदी बोल रही है, इनका पहनावा है, बोलने का लहजा है उस से ये प्रतीत जरूर होता है की ये किसी हिंदी भाषित प्रदेश है, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मेरी भावनाओ को इस से बहुत ज्यादा ठेस पहुंची है, मुझे 1984 और 2015 में हुई गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी याद आ रही है और इसकी कोशीश भी है. एक आम नागरिक होने के नाते जीवन की उथल पुथल में इतना व्यस्त हूँ की कही भी इसका सवैधानिक रूप से इसका प्रतिरोध नही कर सकता, और वही एक आम नागरिक होने के नाते खाखी और काले कोट से भी डर लगता है, मैं भी यँहा भी नही जाना चाहता लेकिन हमारी सरकार जो अक्सर सोशल।मीडिया।पर एक्टिव रहती है, डिजिटल  तकनीक को बढ़ावा दे रही है, वह इसका क्यों संज्ञान नही लेती, इस तरह एक समुदाय की भावना को आहित करना, समाज में डर का वातावरण फिर से पैदा करना, एक सवाल जरूर पूछने को मजबूर कर रहा है की हम 70 साल की आजादी के बाद देश को किस और ले जा रहे है ? क्या ये वही लोकतंत्र है जिसके लिये भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव फांसी चढ़ गये थे, शायद नही.

वीडियो लिंक: https://youtu.be/a4qjZz8D3_U

https://youtu.be/EDV9_HmZ1jk

https://youtu.be/889CnjJsxO4

हर वीडियो में बैकग्राउंड और पहनावा एक जैसा ही है. इस वीडियो श्रेणी से सिख समुदाय का हर नागरिक बेहद निराश है और भावनाओ को आहित महसूस कर रहा है.

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