वाह री दुनिया ..

Posted by Sparsh Choudhary
September 17, 2017

Self-Published

 

तुमने किया होता तो क्या फर्क पड़ता क्यूंकि तुम एक आदमी हो ! तुम्हारा यह जन्मसिद्ध अधिकार है ,तुम छाती ठोक के अपने अफेयर्स को यूँ खुद ही ‘माफ़’ कर देते हो . मैं इस ‘कमजोरी’ को अपने ऊपर हावी नही होने देती तब भी ‘बाँझ ‘ कहलाती और तुम तब भी पाक़-साफ़ थे . और शायद आज भी क्यूंकि उसके बाद हमारा कोई दूसरा बच्चा हो ही नही पाया . मुझसे जो हुआ वो गलत था .पर मैं तब भी और अब भी सिर्फ तुमसे प्यार करती हूँ . हालांकि तुम्हारा झूठा अहं जो आज तुम्हे इस तमाशे को करने को मजबूर कर रहा है , आज मैं उससे परे अपना आसमान ढूँढने जा रही हूँ . किसी की पत्नी ,किसी की माँ नही ,आज मैं खुद अपने लिए कुछ करने जा रही हूँ . नही ,यह मत सोचो ,सत्ताईस साल का रिश्ता है तुम से  .पर इन सबके बीच मैं खुद कहीं खो गयी थी और मैं आज अपना वज़ूद तलाशने जा रही हूँ .और ,अनिकेत ,मेरे बेटे , तुम तो मेरी परवरिश थे ,मेरे खून थे पर क्या तुम भी मेरे इस पति पर चले गये ?

और तुम ,तुम तो मेरे ऊपर कई बार बलात्कार किया करते थे क्यूंकि तुम मेरे पति थे ! तुम जिसे शादी के बाद मेरे लिए एक सुन्दर भविष्य बनाने के नाम पर कभी खुद के सपनों ,खुद की कंपनी ,खुद के दौरों , और खुद की सहूलियत के साथ साथ जन्मजात सामंतवादी सोच के सिवाय कुछ और आता ही नही था . और कुछ गलत नही था उसमें ,बस उन सपनों में पत्नी होने के नाते मैंने अपने लिए भी जगह ढूंढी थी थोड़ी !! प्यार की एक मूल इंसानी ज़रुरत की ही तो उम्मीद की थी मैंने अपने ही पति से . और इन सत्ताईस सालों में क्या  झोंक नही दिया मैंने अपने सर्वस्व को इस घर के लिए ,तुम्हारे लिए . पर मैंने सहा क्यूंकि मैंने प्यार किया था . और आज एक पल में सब कुछ बदल गया ,तुम कहते हो तुमने मुझे झेला !

हो सकता है तुम एक निहायती क्रूर और हिंसक पति न हो पर तुम्हारी पितृसत्तात्मक सोच तुम्हारा परिचय दे देती है – जिसमे रीत हो कि औरत को नौकरी करने की क्या ज़रुरत –वही परंपरा का ढकोसला और जिसमें मन बहलाने के लिए संगीत सीखा जा सके ,करियर बनाने के लिए नही -भले ही  उसमें कितनी ही प्रतिभा ही न हो .

मेघना कहती है कि नौकरी उसे  ख़ुशी देती है ,आत्मसम्मान देती है वह  क्यूँ इसे न करे  भले ही वह  अपने पति से बहुत प्यार करती है  . क्या प्यार का मतलब अपनी पहचान खो देना है ? मैं सिर्फ मिसेज़ फलानी नही हूँ . काश मेघना मुझमें तुम सा साहस होता .

गलती मेरी .मेरे शरीर की .प्यार की एक बूँद को तरसती मैं भावनाओं के ज्वार में यह भूल गयी कि “मैंने होंठों से लगायी तो ,हंगामा हो गया “ और “हम लड़कियां तो डकार भी नही ले सकतीं “ ….! वाह री दुनिया .

पर उसके बाद मैंने  तुम्हे बताने की कोशिश की और तुमने “ अतिउत्साह “ के कारण नही सुनना चाहा .पर मैंने ऐसा इसीलिए किया कि तुम्हारे ऊपर कोई दाग  न लगे .और इसीलिए इस सच को दफ़न कर लिया .

हाँ मैंने गलती की और मैं इसके लिए तब भी दोषी थी ,अब भी . गलत तो था वह पर क्या वह एक चीज़ बाकी सब जो हमारे बीच था या कहूँ मेरी तरफ से था ,तुम्हारे तरफ से हो या न  ,वह सब बेकार  ?

पर मेरा सवाल है कि क्या जिन  पंचतत्वों से तुम बने हो , क्या उन्ही से मैं नही बनी ?क्या एक सी तकलीफ नही होती इन सबसे मुझे और तुम्हे ? क्या जो मेरे लिए गलत है ,वो तुम्हारे  लिए नही ?क्या तुम्हे यह महसूस नही हुआ ….कैसे होगा …तुम जिसे समाज में रहते हो वह तो सदियों से ऐसा है . दरअसल सारा संसार ही ऐसा है . औरत मतलब “द सेकंड सैक्स “

तो सवाल यह यह है कि शादी की पवित्रता के आड़ में औरतें पिसती रहती हैं ,शोषण का शिकार भी . हो सकता है आदमी भी आज इसके शिकार हो रहे हों .पर क्या बराबरी उर्फ़ फेमिनिज्म का यही मतलब नही कि सबके लिए एक से नियम हों .

क्या शादी ,इज्ज़त और बच्चे सिर्फ एक ही की ज़िम्मेदारी हैं . इसीलिए राष्ट्रीय पुरूस्कार प्राप्त तब्बू अभिनीत यह फिल्म – अस्तित्व -जहाँ अदिति पंडित के किरदार में एक औरत यही सब जीती है और फिर यही सारे सवाल छोडके जाती है – तब से आज तक क्या कुछ बदला ?

ऐसे में सत्रह सालों बाद एक और फिल्म आई जो ‘कैंची’ से कुतरने के लिए एक नया तमगा दे दी गयी – ‘लेडीज़ ओरिएंटेड फिल्म ‘ . –लिपस्टिक अंडर माय बुरखा -अब क्या करें पुरुषप्रधान जगत में इन दिनों औरतप्रधान मुद्दे खूब पंख फडफडा रहे हैं तो कैसे तिलमिलाहट न होगी ! आखिर ‘कैंचियाँ’ भी तो मर्दों ने बनायी हैं !

और हाँ ,आप किसी एक ख़ास ‘कैंची’ की और ऊँगली मत दिखाइए – तमाम कैंचियाँ गर्भ से अर्थी तक चलती हैं .

हाँ तो सुनो साँस भी धीरे से लो ,सीना दिखेगा .समझीं , तुम सिर्फ बुआजी हो .तुम्हारा अपना नाम तो तुम भूल चुकी हो . तुम सपने नही देख सकती हो –न एक चालीस हज़ार की नौकरी वाली सेल्स मैनेजर बनने के .न बच्चा पैदा करने की मशीन की बजाय कुछ और होने के . न तुम लस्ट रख सकती हो . और भूल जाओ अगर पचपन साल की हो और जवानी में ही विधवा हो गयी हो तो रहो अभिशप्त –किसी से प्यार या किसी के प्रति आकर्षण नही कर सकतीं. विधुर आदमी जो तुम्हारी उम्र का है उसे भी एक तीस साल की नयी दुल्हन चाहिए क्यूंकि अब वो इस उम्र में अकेला फील करता है !

तुम तो तुलसी की माला लो और जपो राम राम .नही .वो तो है ही अच्छा .और फिर राम –राम जपोगी तो यूँ इन लोगों से अपने ‘सपनों’ की डिमांड न करोगी ,न !

दिल खोलके नाच नही सकती  . लड़का होती तो दारू पी के तमाशा करती और फिर अगले दिन सब नॉर्मल हो जाता .पर अब से तुम्हारा सब कुछ बंद . तुम बिगड़ चुकी हो !

और हाँ तुम अपने पौरुषत्व के लिए पैसे का हिसाब ‘सिर्फ’ अपने पास रखो और साल भर का ‘कोटा’ कुछ महीनों में पूरा करने का अपना काम करते रहो .शौहर हो . ‘प्रोटेक्शन’ और फॅमिली प्लैनिंग में कहाँ विश्वास करते हो . तुम हर रात मेरी आत्मा को तबाह करते रहो . क्यूंकि अपने मुल्क में  शादी की ‘पवित्रता ‘के तले अपराधों की परिभाषा अलग अलग है ,दोस्त .

पर अगर मैं अपने प्यार का इज़हार ‘ऐसे’ करना चाहूँ तो करमजली हो जाऊं . तो तुम मुझे चार लड़कों को बुलाने की धमकी दे डालो ! प्यार …ऐसा ?

हाँ ,ज़रूरी नही तुम स्मोक या ड्रिंक करती हो तो ही सशक्त होंगी .और उसका तुम्हारे चरित्र से कोई भी लेना देना नही है .किसी के लिए भी नही है . हाँ लिवर आदमी और औरत दोनों का ही एक सा ख़राब होगा ,समझे !

खैर छोडो ये सब . सवाल और जवाब इसी में छुपे हैं कि अगर इंसानियत में भरोसा करते हैं तो ‘उसे’ भी एक इन्सान के रूप में सम्मान दीजिये ,प्लीज़. आदमी हों या औरत . उसे भी जो आपके समाज में ‘थर्ड जेंडर’ के रूप में कानूनी पहचान अभी अभी पाया है  .या उसे भी जिसकी आत्मा प्रेम के लिए जेंडर के तमगे नही ढूँढा करती या जिसके सो कॉल्ड सामाजिक बंधनों से परे एक दिल है ,जो शरीर में धड़कता तो है पर उसमें भावनाएं अमूर्त हैं और वो बंदिशों के परे हैं .

लिपस्टिक अंडर माय बुरखा के एक दृश्य में लीला कहती हैं –हमारी गलती यह है कि हम सपने बहुत देखती हैं !

लिपस्टिक मतलब सपने और बुरखा मतलब कैंचियाँ उर्फ़ इज्ज़त के ठेके . अब इन सपनों की कीमत तो देनी ही होगी न . सपनों के लिए जेंडर बेस्ड लायसेंस किधर मिलेगा ,भाई ?

 

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