शहीद-ए-आजम को कवयित्री का अधूरा ख़त

Posted by Siddharth Ratnam
September 28, 2017

Self-Published

प्यारे साथी भगतसिंह

आपके जन्मदिन पर मै आपको यह पत्र लिख रही हूँ । इसलिए नहीं कि आपकी आत्मा मेरे सपने में आकर मुझे धिक्कारती है और अपेक्षा की नज़रों से देखती है; अतः आपसे कोई शिकायत करूं । बल्कि इसलिए कि मुझे लिखना था और लिख रही हूँ । आपके अनेकों ख़त मिले, जो आप हम युवाओं के लिए छोड़ गये थे । उनमें से अधिकांश मैने सहेज कर रक्खा है । मै उसे बस पढ़ लेती हूँ , और काफी देर तक सोचती रहती हूँ । मुझे आपके विचारों से प्रेम है, आपकी नास्तिकता के प्रति निष्ठा है । मै जान चुकी हूँ कि नास्तिक होने का अपना अलग ही मजा है, और यह आस्तिक व्यक्ति के समझ के परे की चीज़ है । यूं कहें स्वतंत्र चेतन मस्तिष्क के विकास के लिए यह आवश्यक दर्शन जैसा है । आपके विचार मुझमें नये उत्साह भरते हैं जिससे मै और नवीन होती जा रही हूँ । यह कुछ रक्त संचार जैसा ही है । मानसिक ग़ुलामी की बेड़ियाँ चटक रहीं हैं, बहुत कुछ टूटना अभी बाक़ी है । मेरे दोस्त-यार सब इन बातों को नहीं समझते । वे अपनी दुनिया में मस्त हैं और सामाजिक सरोकारों से उनका कुछ लेना-देना नहीं । फिर भी उन मित्रों से मुझे लगाव है । क्योंकि वे भी मुझे उतना ही प्रेम करते हैं । मेरे पत्र लिखने का एक कारण यह भी है कि- मै आजकल इस बात से बड़ी आहत हूँ । इस देश के लोग आपकी मूर्तियां बनाकर उसकी पूजा करने पर आमदा हैं । आपको भगवान बना दिया गया है । आपके विचारों से किसी को कोई लेना-देना नहीं । जो भी आता है आपके नाम पर कुछ भी लफ्फ़ाजी बक के चला जाता है ….कितनी ग़लत बात है न बीरा । कोई नेता कहता है- सदियों बाद फरिश्ता एक बार ही पैदा होता है । ..तो कोई कहता है- वीरता के मिसाल थे भगतसिंह । …तो कोई तुम्हारे बसंती रंग को और ही रंग दे देता है । और तो और कुछ अतिक्रांतिकारी लोग तुम्हारी विचारधारा का घालमेल भी कर रहे हैं । इतना कुछ तो लिख गये हो फिर भी इन्हें इतनी सी भी अक़्ल नहीं । इन्हें डर है भगतसिंह के तार्किक विचारों से, उनकी क्रांतिकारी राजनीतिक चेतना से ।
इसलिए तो यह सब हो रहा है । ये जिक्र तक न करेंगे धर्म पर तुम्हारा क्या दृष्टिकोण है । नास्तिकता और संप्रदायिकता पर तुमने क्या लिखा है, वे चूं तक न कहेंगे । इसलिए तुम्हारी वीरता को सजा-धजा कर उसे महिमामंडन की चादर में लपेटा जा रहा है । जिन फिरकापरस्त लोगों से बार-बार सावधान रहने को कहा, वे ही लोग तुम्हारे नाम से अपनी राजनीति चमका रहे हैं । काश ! तुम देख पाते ।
मुझे मालूम है तुम्हारे हाथ में अगर मेरा यह पत्र होता, तो पढ़कर मुस्कुरा रहे होते; और कहते कि- ‘कमबख्त इस दिन के लिए ही हम फांसी चढ़ गये ?’ …गुरु भी ठहाके मार के हंस जाते । अगर ग़लती से यह पत्र कहीं भाई सुखदेव के हाथ लग जाता, तब तो एक और बखेड़ा खड़ा हो गया होता अबतक… पंडित जी इन्क्वायरी बिठा देते । हालांकि बाद में तुम सब साॅल्वआउट कर देते हा..हा..हा.. ।
शहीद-ए-आजम ! तुमने भाई सुखदेव और राजगुरु ने जिन विचारों के लिए हँसते-हँसते शहादत दी; वे अब भी प्रासंगिक हैं और समय के साथ और भी समृद्ध ही हुए हैं । आज हम सब युवाओं का सामना ऐसे ही अनेकों सवालों से रोज होता है । और हम हैं कि उनसे आंख चुरा कर निकल जाना चाहते हैं । हमारे सामने से अशिक्षा, बेरोजगारी, भूखमरी, शोषण, उत्पीड़न व नैतिक पतन जैसे मूल सवाल ग़ायब होते जा रहे हैं । इनका स्थान कुछ प्रायोजित मुद्दों नें ले रक्खा है ।
अब तुम भी कहोगे कि ये लड़की जनम दिन पर क्या लेकर बैठ गई । तो और नहीं लिखती हूँ । एक और बात जो लिखनी थी, अब क्या लिखूं.. ? मन में और बहुत कुछ है, वैसे ही… जैसे तुम अपने साथ बहुत कुछ ले गये । इतना सारा लिखने के बाद भी तो और कुछ रहा होगा, जिसे लिखने का वक़्त नहीं मिल सका । इस बारे में मै कुछ ज्यादा ही सोचती रहती हूँ । खैर, इस पत्र का प्रतिउत्तर तो मिलेगा नहीं, अतः यह पत्र अधूरा छोड़ती हूँ । फिर भी.. मै उम्मीद करती हूँ तुम हर कदम मेरे साथ रहोगे, एक साथी की तरह.. उत्साह से भरपूर यथार्थ जीवन के ठोस सत्य की तरह.. मेरे विचारों में .. इक नयी सुबह के लाल उजाले की तरह ।
जन्मदिन की शुभकामनाओं समेत !
तुम्हारी –  कवयित्री

!! इन्क़लाब जिंदाबाद !!

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