शिक्षक को व्यक्तित्व शिल्पी भी होना चाहिए

Posted by Aheer Shishir Yadav
September 24, 2017

Self-Published

अनगढ़ को गढ़ना ही अध्यापन है…..सर्वांगीण विकास करना ही फर्ज है….. बालमन को समझना ही विशिष्टता है । अध्यापक व्यतित्व शिल्पी भी होता है । विद्यालयों में अनेक बच्चे पढ़ने आते हैं । प्रत्येक बच्चा एक दूसरे से अलग होता है । कोई सीखने में तेज, कोई धीमा तो कोई मन्द बुद्धि का होता है । कोई शरारती तो कोई शांत होता है । कोई दब्बू तो कोई शर्मीला होता है । जो बच्चे तेज होते हैं, शरारती होते हैं शिक्षक की जबान पर अक्सर उनका नाम होता है । ऐसे बच्चे शिक्षक द्वारा कहे किसी कार्य को करने हेतु तुरन्त लालायित हो जाते हैं । शिक्षक भी बार-2 उन्हीं बच्चों से कार्य करवाते हैं, पढ़वाते हैं, ध्यान देते हैं, संवाद करते हैं । कुछ बच्चे ही अक्सर प्रार्थना करवाना, मोनिटरिंग करना आदि कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं या यूँ कहें कि वे बच्चे ही सर्वेसर्वा होते हैं । शिक्षक की जबान पर उनका नाम चढ़ जाता है, वे उन्ही बच्चों से कार्य करवाते रहते हैं । जो बच्चे दब्बू व शांत प्रकति के हों उनसे भी प्रार्थना करवायी जाये, पढ़वाया जाये, मॉनिटरिंग करायी जाये, रचनात्मक कार्य कराये जायें ताकि उनका दब्बूपन खत्म होवे । दब्बूपन उनके व्यक्तित्व के विकास और उन्मुक्त उड़ान में बाधक है । दब्बू और शांत बच्चा समाज में अपनी बात अभिव्यक्त करने, अपनी प्रतिभा व कला अभिव्यक्त करने में झिझकेगा जिससे उसका मनोबल गिरेगा और दब्बूपन के दायरे में सिमट जायेगा । शांत व दब्बू बच्चों के मन को समझिये, उन्हें तेज मत डाँटिये कम डाँटिये उन्हें ज्यादा अपनापन दीजिये । अपने शब्दों में चासनी घोलते हुये बातें कीजिये । अक्सर किसी कार्य हेतु शिक्षक कह देते हैं, एक या दो लोग यह कार्य कर लाओ । ऐसे में दब्बू व शान्त बच्चे बैठे ही रहते हैं । ऐसे बच्चों का नाम लेकर उन्हें कार्य दीजिये ताकि उनमें आत्मविश्वास बढ़े । कार्य के उपरांत उन्हें शाबाशी दीजिये जिससे उन्हें ख़ुशी मिले व आत्मबल मजबूत हो । और प्रत्येक कार्य को दिलचस्पी, जिंदादिली और खुलकर करने की प्रेरणा मिले । पहल कीजिये ताकि मासूमियत को सजायें न मिले । व्यक्तित्व शिल्प की संभावनायें हमारी पहल में है । आपकी संवेदनशील पहल उन बच्चों के भविष्य में सम्भावनाओं व खुशियों के द्वार खोलेगी ।

 

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