हैलो इंडिया! मैं भारत बोल रहा हूं, एक अदद राष्ट्रभाषा चाहिए, मिलेगी ?

Posted by Nil Nishu
September 13, 2017

Self-Published

एक रात मुझे सपना आया कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा घोषित कर दी गई है। क्या करें, विषय से विषयांतर हो रहे बहसों का एक दौर ही चल पड़ा है। मैं तो फिर भी प्रासंगिक बातें कर रहा हूं। अच्छा, छोड़िए बहस, एक रैपिड फायर ही हो जाए!
भारत का राष्ट्रीय ध्वज?
तिरंगा
राष्ट्रीय पक्षी?

मोर

राष्ट्रीय पशु ?
बाघ

राष्ट्रीय खेल ?          
हॉकी

राष्ट्रगाण?
जन-गण-मन

राष्ट्रगीत?
वंदे मातरम

राष्ट्रभाषा ?‍
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बस्स! भारत की राष्ट्रभाषा कौन-सी है? इस प्रश्न के उत्तर स्वरूप हमारे पास बस एक चुप्पी है।
आजादी की 73वीं वर्षगांठ मना चुके इस देश की अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। 40% से ज्यादा आबादी द्वारा बोली जाने वाली भाषा ‘हिंदी’ राष्ट्रभाषा की प्रबल दावेदार मानी जाती है। ठीक है, लेकिन इसका विरोध करनेवालों का मानना है कि केवल यही इसकी मान्यता का पैमाना नहीं हो सकता।

भारतेंदु हरिश्चंद्र, महात्मा गांधी जैसे जननायकों ने हिंदी को लेकर क्या-क्या सपने नहीं देखे? इसके उत्तरोत्तर विकास के लिए कम प्रयास नहीं किए। किन्तु ये प्रयास बस स्टैंड से लेकर रेलवे स्टेशनों की दीवारों किसी बोर्ड पर दर्ज हो गए। हिंदी को लेकर कही गई उक्तियों को स्कूल-कॉलेजों से लेकर विश्वविद्यालयों, सरकारी दफ्तरों से लेकर संसद भवन तक, पुलिस थानों से लेकर कोर्ट परिसरों तक में समय-समय

पर चमका भर दिया जाता है।

संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकृति तो मिली है लेकिन आज तक यह पूर्णरूपेण राज-काज की भाषा नहीं बन पायी है। अपितु गाहे-बगाहे यह आलोचना का शिकार ही हुई है।

 

हिंदी के साथ समस्या ये है कि जब भी इसे राष्ट्रभाषा बनाने की चर्चामात्र हुई, इसने एक बहस को जन्म दिया है और कम समय में ही इस बहस ने बड़े विवाद का रूप ले लिया है। देश में सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा भले ही हिंदी हो, किन्तु राष्ट्रभाषा के रूप में इसकी स्वीकार्यता के विरोध में भी लोग बड़ी संख्या में हैं। विरोध व विवादों का नाता केवल ‘राजभाषा-राष्ट्रभाषा’ को लेकर ही नहीं है, मुझे लगता

है राष्ट्र शब्द के जुड़ते ही विवाद शुरू हो जाता है, जैसा कि इन दिनों भक्ति में राष्ट्र के जुड़ते ही हुआ है। पक्का याद नहीं, लेकिन पीजी की पढ़ाई के दौरान ऐसा पढ़ा-सुना था कि बड़ी संख्या में लोगों ने राष्ट्रगीत के रूप में वंदे मातरम को लेकर असंतोष जाहिर किया था और सोशल नेटवर्किंग साइट पर इसने बड़ा बवाल खड़ा किया था।

भारतीय संविधान के भाग 4ए में राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करना हमारे मूल कर्तव्यों में शामिल है किन्तु अफ़सोस कि राष्ट्रगान भी विवाद का विषय बनने से अछूता न रहा। आज भी काफी लोग इस पर सवाल खड़ा कर रहे हैं कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगो

र द्वारा 1911 में रचित यह गान जॉर्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया है। सच्चाई बयां करने हेतु गुरुदेव तो आज हमारे बीच नहीं हैं किंतु पढ़ने-लिखने के दौरान ही मालूम हुआ कि

23 मार्च 1939 को सुधारानी देवी को लिखे गए पत्र में लोगों के इस संदेह का उत्तर देने को उन्होंने आत्मावमानना माना है।

खैर, तमाम संदेहों को दरकिनार करते हुए राष्ट्रगान के प्रति जो सम्मान होना चाहिए, वह हमारे हृदय में बना हुआ है। लेकिन हिंदी जिस सम्मान की हक़दार है, वह उसे पूर्णतः प्राप्त नहीं हो सका है। भले ही गैर हिंदी भाषी वर्ग के कुछ लोगों और कुछ अन्य को हिंदी को अपनाने में आपत्ति हो, किंतु हिंदी एक ऐसी भाषा है, जिसने हर भाषा का सम्मान किया है । अन्य भाषाओं के शब्दों को इसने अपनाया भी है और अन्य भाषाओं को अपने शब्द भी दिए हैं ।

आज जिस हिंदुस्तान में हम जी रहे हैं, हिंदी से अलग उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। स्वाधीनता संग्राम में हिंदी का योगदान जगविदित है। कारण कि ब्रिटिश साम्राज्य को खौफजदा कर देने वाली भाषा हिंदी ही थी। आज़ादी के मिशन को पूरा करने हेतु पत्र-पत्रिकाओं, पर्चों में हिंदी के मिशनरी प्रयोग की बात हो या फिर जनसभाओं में जन-नेताओं द्वारा संबोधन और आज़ादी के संदेश-वहन की, हिंदी ने हिंदुस्तानियों की संपर्क भाषा बन जन-जागृति भी की और सम्पूर्ण भारत में आज़ादी हेतु ऊर्जा की लहर भी दौड़ाई। चार साल पूर्व दक्षिण अफ्रीका में हुए 9वें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को विश्व की संपर्क भाषा के रूप में विकसित किए जाने पर गहन परिचर्चा हुई। वहीं पर इस बात पर खुशी जाहिर की गई कि विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का स्थान तीसरा है। हिंदी के हो रहे विश्वस्तरीय विस्तार को चीन, जापान सहित यूरोपीय देशों ने भी माना है। आज जबकि सम्पूर्ण विश्व हिंदी की महत्ता का लोहा मान रहा है तो इस नए युवा भारत को राष्ट्रभाषा के रूप में इसकी स्वीकृति से ऐतराज नहीं होना चाहिए । जिन्हें ज़्यादा आपत्ति हो, वे चाहे तो व्यक्तिगत स्तर पर साल में केवल एक दिन राष्ट्रभाषा दिवस घोषित कर इसे सीमित रख सकते है। आज देश की अपनी राष्ट्रभाषा हो इसके लिए विरोध से ज्यादा स्वर इसके समर्थन में उठने चाहिए ।

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