१२ बम्ब, बम्बई के नाम !

Posted by mehtaanjali109
September 8, 2017

Self-Published

१२ मार्च १९९३,जब मायानगरी खून से लत पत हो गई, चीखो से तिल गई, ये वही दिन है जब आतंक ने इतिहास अपना वजूद बनाया और कई जान को मौत के नींद सुलाया। मायानगरी जो अपने रफ़्तार के लिए दुनिया भर में प्रख्यात है वो इस दिन रुक सी गई! अपने ही रफ्तार मे डूबी ये बम्बई मायानगरी जैसे धमाको के बीच दब सी गई। स्टॉक मार्केट जैसे हिल सा गया, कही धुंआ तो कही खून दिखाई दिया। धुंआ जैसे हटने लगा वैसे ही तभाई सामने आने लगी। BSE का धमका थमा भी नहीं, तो शुरू हुआ धमाको का सिलसिला। एक के बाद एक ऐसे कही धमाको ने कही लोगों को मौत के कफ़न में सुलाया। देखते ही देखते २ घंटे के भीतर सीरियल बॉम्ब ब्लास्ट ने मायानगरी को श्मशान बना दिया। कही लोगो के सुहाग उजड़े तो कही लोग अनाथ हुए, २५७ मासूमों ने अपनी जान गवाई। पर अगले ही दिन मायानगरी ने फिर रफ़्तार पकड़ी, और इन्साफ का इंतज़ार किया। आखिर बम्बई को ही क्यों निशाना बनाया गया? भारत को आर्थिक परेशानी देने के खातिर या १९९२ में हुए अयोध्या बाबरी माजिद मसले के बाद, बदले की नीति से बनाई गई साजिश। बहराल लोगो के अंदर डर पैदा करना और अलग अलग मजहब और धर्मो को आपस में भड़काना और आतंक को फैलाने ये मकसद सीधी ओर से CBI जाँच में सामने आया। वर्ल्ड वॉर २ के बाद पहली बार सबसे अधिक मात्रा में RDX का इस्तेमाल हुआ जिसने कहर मचा दिया। आखीर क्यों? आखिर क्यों इतना मजबुर कर देता है आतंक के एक आदमी को अपनी औरत को अर्ध नग्न कपड़ो में खून से लहु लोहान हुए गोद मे उठाना पढ़ता है, एक माँ को अपने बेटे के मास के लोठड़े हाथों से छुने पढ़ते है, एक परिवार को खून से लतपत लाशों से अपने खून की शनकाती करनी पढ़ती है। इस आतंक ने ना मज़हब देखा न कोई धर्म। इसका मकसद था सिर्फ लोगो को मौत के घाट उतारना। कहियो ने कहा इस आतंक से जुड़े गुन्हागारो को फाँसी ना दी जाए, तो कहियो ने मज़हब का वास्ता दिया। पर न्याय कभी अंधा नही होता नाही कमज़ोर। कही लोगो ने मिलकर इस आतंक को अंजाम दिया था जिसमे काफी जाने माने चेहरे भी सामने आए, जो दोषी साबित हुए वो कभी शराफ़त की चुनर ले घूमते थे। पहली दफा बलजीत परमार ने ऐसे चेहरे से शराफत का नकाब हटाया, और सामने लाया चोकाने वाला सच। संजय दत्त, ये वही जानेमाने शक्श थे जिन्होंने अपने घर में AK-47 रख कर इस आतंक में अपनी मौजूदगी शामिल की, और असल मे खलनायक बन गए। दो हिस्सों में चले ये लंबे केस ने कही मुजरिमों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो कही मुजरिमों सजा ए मौत का ऐलान। पोर्तुगल से प्रत्यापन किये गए अबु सलेम की, डी कम्पनी के दावूद, छोटा शकील और टागोर मेमन जैसे नामंकित फरार आरोपी की साथ काफी कड़िया जुड़ी थी। फिर ताहिर मर्चेन्ट को दुबई से हिरासत में लिया गया। अबु सलेम, मुस्तफा डोसा, करीमुद्दीन खान, फ़िरोज़ अब्दुल रशीद खान, रियाज़ सिद्दीक़ी, ताहिर मर्चेन्ट, अब्दुल कय्यूम अन्सारी जैसे इस आतंक का मंसूबा बनाने वालो को आखिर कार ७ सेप्टेंबर २०१७ को  टाडा कोर्ट ने सजा की सुनवाई की और आखिर कार २४ साल बाद मायानगरी नाम से महशूर बम्बई शहर को इंसाफ मिला। वक़्त तो बहौत बीत गया पर अब शायद उन मासूमो को इंसाफ मिला। ये कहना बिल्कुल गलत नही होगा के भारतीय न्यायलय में देर है पर अंधेर नही।

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