झारखंड के ऐसे 18 गाँव जहां मुसलमानों को रहने की इजाज़त नहीं है

भारत देश में अलग-अलग मज़हब के लोग अपनी संस्कृति, परंपरा और रिवाज़ की खूबसूरती समेटे जीवन यापन करते हैं, जो इस मुल्क को अन्य देशों से अलग बनाता है। हालांकि समय-समय पर नेताओं द्वारा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए दो मज़हब के लोगों के बीच तनाव उत्पन्न किया जाता रहा है। सियासी तवे पर वोट बैंक की रोटी सेंकने के लिए हिन्दू और मुसलमान के बीच नफरत की दीवार खड़ी की जाती है।

झारखंड के दुमका ज़िले के शिकारीपाड़ा प्रखंड स्थित पंचायत मलूटी में सदियों से ऐसी धारणा चली आ रही है, जिसके तहत आज भी पूरी पंचायत में किसी मुस्लिम परिवार को बसने की इजाज़त नहीं है।

इतिहास में मलूटी गांव की अपनी एक अलग पहचान रही है। पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे इस गांव को गुप्त काशी और मंदिरों का गांव भी कहा जाता है। इतिहासकारों के मुताबिक इस गांव के राजा कभी किसान हुआ करते थे और उनके वंशजों ने यहां 108 मंदिरों का निर्माण करवाया। ये मंदिर बाज बसंत राजवंश के समय में बनाए गए थे। 1695 में राजा बाज बसंत राय के वंशजों ने मलूटी गांव को बसाया था।

बताया जाता है कि मलूटी के धार्मिक स्थल होने की वजह से यहां मुसलमानों को रहने की इजाज़त नहीं है। मलूटी पंचायत के अंतर्गत भीरनगर, सतरंगा, कदम गोरिया, चांदपुर और कुरूमडाह समेत 18 ऐसे गांव हैं, जहां आज भी मुसलमानों को बसने की इजाजत नहीं है।

ग्रामीणों ने की पुष्टी

यूथ की आवाज से बातचीत करते हुए गांव के शिक्षक कुमोद बरन राय बताते हैं कि पूरी तरह से धार्मिक होने की वजह से मुसलमानों को यहां बसने नहीं दिया जाता। इसे लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ है, मुस्लिम समुदाय के लोग भी पंचायत की इस प्रथा का सम्मान करते हैं। हां, ये ज़रूर है कि आज से लगभग 30 वर्ष पहले मलूटी काली मंदिर के सामने एक मुस्लिम परिवार अपना घर बसाने जा रहा था, लेकिन इस बात की भनक जैसी ही गांव वालों को लगी, उन्हें तुरंत हटा दिया गया।

कुमोद कहते हैं कि पंचायत में मौजूद शिक्षित लोग मुसलमानों के यहां नहीं बसने को लेकर कोई ऐसा बयान नहीं देते, जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचे।बातचीत के इस सफर के आखिरी पड़ाव में ग्रामवासी शांतो मुखर्जी बताते हैं कि दुनिया भर में घटित हो रही आतंकी घटनाओं में मुसलमानों की संलिप्तता पाए जाने की वजह से भी यहां उन्हें शरण नहीं दी जाती है।

मलूटी पंचायत की मुखिया मुंगिला टुड्डू की माने तो गांव के धार्मिक होने की वजह से यहां किसी मुसलमान को बसने की इजाजत नहीं है। हालांकि उन्होंने ये बात ज़रूर कही कि जब भी गांव में किसी भवन का निर्माण होता है तब उसे तैयार करने वाले अधिकांश मज़दूर मुसलमान होते हैं और इस चीज़ को लेकर कभी कोई विवाद नहीं होता।मलुटी ग्राम के लोगों की यह कैसी मानसिकता है जहां वे मुसलमानों को गांव में रहने की इजाज़त तो नहीं देते लेकिन जब मकान बनवाने की नौबत आती है तब मुस्लिम समुदाय के लोग ही हिन्दुओं के रहने के लिए मकान बनाते हैं। यदि ग्रामीणों को मुसलमानों से आपत्ति है, फिर तो इन्हें उनसे मकान भी नहीं बनवानी चाहिए। क्योंकि हिन्दुओं के मकान में पूजा करने की जो जगह होती है उसे भी तो मुसलमान ही तैयार करते हैं।

प्रशासन से बातचीत

बहरहाल मलूटी गांव में सदियों से चली आ रही ये एक ऐसी प्रथा है जिस पर बात करने के लिए ग्रामीण जल्दी राज़ी नहीं हो रहे थे। ऐसे में हमने शिकारीपाड़ा थाने के ऑफिसर इंचार्ज अजय केसरी से बात की। उनसे मलूटी पंचायत के इस प्रथा को लेकर पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि प्रशासन के पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है। लेकिन हम इस बारे में पता लगाएंगे।

मलूटी पंचायत की इस अदभुत परंपरा को लेकर भले ही गांव के लोग धार्मिक दृष्टिकोण से अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं। लेकिन जिस भारत में अलग-अलग मज़हब के लोगों को साथ लेकर चलने की बात की जाती है, वहां समुची पंचायत से मुसलमानों का बहिष्कार किया जाना कट्टर हिन्दुत्ववादी सोच का परिचायक है।

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