घूमते-घूमते इतिहास और संस्कृति जाननी हो तो भोपाल आइये

झीलों का शहर भोपाल, यह ना सिर्फ प्राकृतिक रूप से सुन्दर है बल्कि मध्यप्रदेश की प्रशासनिक राजधानी होने के साथ ही सांस्कृतिक राजधानी भी है। इसके नाम का संबंध ग्यारहवीं सदी के मालवा के विद्वान शासक राजा भोज से जोड़ा जाता है। नवाबशाही के दौर में परवान चढ़ता यह शहर देश की आज़ादी के वक्त देशी रियासत भोपाल का केंद्र था जिसे 1956 में नवगठित मध्यप्रदेश राज्य की राजधानी बनाया गया।

ताज-उल मस्जिद, भोपाल; फोटो आभार: flickr

जैसे मध्यप्रदेश देश का ह्रदय कहलाता है वैसे ही भोपाल मध्यप्रदेश का दिल है। हर बड़े शहर की तरह यहां भी पुरानी और नई बसाहट है। नवाबों के दौर में फला-फूला शहर जिसमें गौहर महल, शौकत महल, सदर मंजिल, लाल कोठी, मिन्टो हॉल (पुराना विधानसभा भवन), गोलघर, ताज-उल मस्जिद जैसे पुराने समय के प्रत्यक्षदर्शी स्मारक मौजूद हैं, साथ ही स्वतंत्र भारत में मध्यप्रदेश की राजधानी बनने के बाद हुए विकास के बहुत से हस्ताक्षर भी यहां दिखाई देते हैं।

बड़ा ताल इस शहर की पहचान है जिसका निर्माण परमार नरेश भोज ने करवाया था। श्यामला हिल्स के नीचे से इस ताल को निहारने पर दूर-दूर तक इसका कोई ओर-छोर दिखाई नहीं पड़ता। यहीं पर अब बोट हाउस बनाया गया है और इसका किनारा एक चौपाटी बन गई है, जहां पर लोग मनोरंजन के लिए आते हैं और यहां विशेष अवसरों पर आयोजित होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों का लुत्फ उठाते हैं। बड़ा ताल के अलावा छोटा तालाब, शाहपुरा झील, करियासोत डैम, भदभदा डैम और कोलार डैम भी जलराशि से मन की तरंगों को उभारने वाले स्थल हैं।

वन्य प्राणी, ट्रैकिंग और एडवेंचर पसंद करने वालों के लिए भोपाल के आस-पास ऐसे जंगलों और पहाड़ियों के कई विकल्प मौजूद हैं। आम दर्शकों को वन विहार का भ्रमण काफी रोमांचक लगेगा तो वहीं भोपाल के नज़दीक रातापानी वन्य अभ्यारण में जंगल का सजीव अहसास मिलेगा। ट्रैकिंग के लिए भी नज़दीक में कई ट्रैक खोजे गए हैं।

इतिहास और संस्कृति की समझने की इच्छा रखने वालों के लिए भोपाल और इसके आस-पास बहुत कुछ मौजूद है। भोपाल शहर में जहां नवाबी इमारतें हमें कुछ सौ वर्षों पहले पहुंचा देती हैं, वहीं भोपाल से 50 किलोमीटर दूर होशंगाबाद रोड पर भीमबेटका की गुफाओं में आदिमानवों द्वारा की गई चित्रकारी हज़ारों वर्ष पूर्व के कलासंवाद से हमें जोड़ देती हैं। इसी मार्ग से होते हुए भोजपुर भी पहुंचा जा सकता है जहां पर दसवीं सदी का विशालकाय शिवलिंग, भोजेश्वर मंदिर में स्थापित है। इसी के नज़दीक कुछ किलोमीटर की दूरी पर आशापुरी मंदिर समूह के भग्नावशेष भी दिखाई पड़ जाएंगे।

सांची स्तूप, भोपाल; फोटो आभार: flickr

भोपाल से विदिशा की ओर चलने पर विश्वविरासत स्थल सांची को देखकर प्राचीन समय में बौद्ध धर्म के प्रभाव का भी अंदाज़ा लगता है। सांची के साथ ही इस मार्ग के आसपास सोनारी, सतधारा जैसे कई बौद्ध स्तूप मौजूद हैं, लेकिन वहां तक पहुंचना थोड़ा मुश्किल है।

संस्कृति एवं इतिहास को सहेजने के लिए कई सारी संस्थाएं भोपाल में काम कर रही हैं। भारत भवन, रबीन्द्र भवन सहित कई कला केन्द्रों में प्रायः नृत्य, नाटक, संगीत एवं कला प्रदर्शनियों का आयोजन होता रहता है। श्यामला हिल्स में स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, मानवीय विकास को दिखाने के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के रहन-सहन, आदिवासी तकनीक और कला को संरक्षण देने वाला एक महत्वपूर्ण संस्थान है। इसी के नज़दीक जनजातीय संग्रहालय में आदिवासी समाज का जीवन प्रदर्शित है और राज्य संग्रहालय में पुरावस्तुओं का बेहतरीन संकलन और प्रदर्शनी है।

निजी सहयोग से चलाए जा रहे दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय और माधवराव सप्रे पत्र संग्रहालय रोचक एवं दर्शनीय हैं। मछलीघर, क्षेत्रीय विज्ञान केंद्र और क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय बच्चों के कौतूहल को शांत करने के लिए अच्छे स्थान हैं। भोपाल एक हरा-भरा और शांत शहर है, अभी हाल ही के सरकारी सर्वे में इसे इंदौर के बाद देश का दूसरा सबसे स्वच्छ शहर माना गया है। इसके लिए बस यही कहने का मन होता है –

“राजा भोज की विद्वता, नवाबों की सरपरस्ती; झीलों की ये नगरी, पहाड़ियों से ढकी-बसी है।
इतिहास को दिखलाती, संस्कृति को जन से मिलवाती; देश की यह एक महत्वपूर्ण जंक्शन नगरी है।”


देवांशु, Youth Ki Awaaz Hindi सितंबर-अक्टूबर, 2017 ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा हैं।

फोटो आभार: flickr

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