BHU संघर्ष के संदर्भ में मौजूदा VC और रबींद्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद

Posted by preeti parivartan in Campus Watch, Hindi
September 25, 2017

BHU के उप कुलपति कहते हैं “कैंपस से राष्ट्रवाद खत्म नहीं होने देंगे।” अगर कैंपस में लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने से राष्ट्रवाद खतरे में पड़ जाता है तो फिर यकीन मानिए राष्ट्रवाद उन सभी के लिए खतरा है, जिन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की इस घटना पर दुख, शर्म, चिंता और गुस्सा है।

रबींद्रनाथ टैगोर ने अपनी किताब ‘Tagore’s Nationalism’ में राष्ट्र और मानवता का फर्क समझाते हुए लिखा है, “हम मुगल और पठान के झुंड को जानते हैं जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया, लेकिन हम उन्हें उनके धर्म, रीति-रिवाज, पसंद-नापसंद के साथ एक मानव प्रजाति (human races) के तौर पर जानते थे। हम उनसे मुहब्बत करते थे और ज़रूरत पड़ने पर हमने उनका विरोध भी किया। हम उनसे उस भाषा में बात करते थे जो जितनी उनकी थी, उतनी ही हमारी भी। हमने उस साम्राज्य की मंजिल तक पहुंचने में उनकी मदद भी की। लेकिन आज (तब के अंग्रेजी शासन काल में) हमारा सामना किसी मानव प्रजाति से नहीं बल्कि एक राष्ट्र से हो रहा है।”

राष्ट्रवाद का उभार तो पश्चिम में 14वीं शताब्दी में ही हो गया था। हमारे यहां भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को राष्ट्रवाद के नाम पर एकजुट किया गया था। लेकिन मुझे जितनी समझ है पिछले एक-दो सालों में इसकी जितनी चर्चा राष्ट्रवाद पर हमारे देश में हुई है, उतनी शायद आज़ाद भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई है। आज कभी भी, कहीं भी, कुछ भी हो तो वो राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह का विवाद बनकर रह जाता है।

राष्ट्रवाद एक ऐसा विश्वास है जो यह मानता है कि यदि लोगों के एक समूह में सभी लोग समान इतिहास, परंपरा, भाषा और संस्कृति के आधार पर एक- दूसरे से जुड़े हैं तो उन्हें अपनी एक प्रभुसत्ता, एक संपन्न राजनीतिक समुदाय बनाना चाहिए। यह प्रभुसत्ता, संपन्न राजनीतिक समुदाय ही राष्ट्र है।

दुनिया भर में इसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव हुए हैं। सकारात्मक प्रभाव ये रहा कि कई हज़ार आबादियों को समानता के आधार पर संगठित किया गया। नकारात्मक प्रभाव के रूप में एक राष्ट्रीयता ने दूसरी राष्ट्रीयता से घृणा की। अपनी सर्वोच्चता कायम करने की होड़ लग गई। हम ‘बड़े’ तो ‘हम बड़े’! मानवीय मूल्य का महत्व ही नहीं रह गया।

कुछ लोगों ने टैगोर की आलोचना की तो कुछ ने राष्ट्रवाद स्थापित करने के लिए कमर कस ली। कुछ ने मुक्त कंठ से राष्ट्रवाद के नकारात्मक प्रभाव की प्रशंसा की है और कर रहे हैं। जब चर्चा राष्ट्रवाद पर हो तो जिसकी आलोचना करनी हो या प्रशंसा करनी हो करें, लेकिन जब मसला विश्वविद्यालय परिसर में लड़कियों से छेड़छाड़ का हो और उस कैंपस में जहां विरोध का स्वर उठाने पर मेनडोर बंद कर दिया जाता हो, जहां शिकायत करने पर लड़की को ही समय और कपड़ों की नसीहत दे दी जाती हो, वहां से प्रतिरोध की आवाज़ उठ रही है तो आवाज़ को राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह की भेंट ना चढ़ाइए और चढ़ने से बचाइए।

फोटो आभार: facebook पेज BHU BUZZ

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