BHU के रावणों को जलाने के लिए लंका पर डटी लड़कियां

देश के दो महान विश्वविद्यालय, JNU और BHU इस हफ्ते दोनों ही ख़बरों की सुर्खियों में हैं। JNU अपने परिसर में छात्राओं और महिलाओं के शोषण के मामले देखने वाली संस्था जीएस-कैश के जगह नई थोपी गई संस्था आईसीसी को लेकर बनी अनिश्चतता के लिए खबरों में है। वहीं BHU की लड़कियां परिसर में अपनी सुरक्षा के विषयों पर लगातार शिकायतों की अनदेखी को लेकर विरोध प्रदर्शनों के कारण खबरों में हैं।

BHU में यौन हिंसा को लेकर लड़कियों का मेन गेट पर जमा होकर विरोध प्रदर्शन करना और बीते दिनों की घटनाएं बताती हैं कि BHU का परिसर जो अकादमिक गतिविधियों और वाद-विवाद की बेहद उम्दा जगह है, वहां सब कुछ समान्य नहीं है। BHU प्रशासन द्वारा ये दावा किया जा रहा है कि स्थिति समान्य है और ऐसा नहीं है कि छात्राओं की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया जाता है या लड़कियों के शिकायत पर उन्हें ही ज़िम्मेदार बताकर, उनको डांटकर चुप करा दिया जाता है।

फोटो आभार: facebook पेज BHU Buzz

BHU परिसर में लड़कियों के साथ छेड़खानी, हॉस्टल के सामने आकर अपशब्द बोलना, कभी पत्थर फेंकना और कभी मास्टरबेट करना, बेहद शर्मनाक स्थिति है। यह बताता है कि प्रशासन लड़कियों के शिकायत पर चुप्पी साधे रहता है, तभी इन लड़कों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में लड़कियों के साथ यौन हिंसा की घटनाओं को देखते रहना और लड़कियों के सुरक्षा में आगे ना आना, साबित करता है कि प्रशासन इन गतिविधियों पर जानबूझकर खामोश है और लड़कियों की शिकायतें बस फाइलों में जमा कर ली जाती हैं।

बीते दिनों BHU हॉस्टल में लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर लैंगिक भेदभाव करने वाले कई बेजा नियमों के खिलाफ याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के लिए सहमति जताई है। इसके कुछ दिन बाद ही BHU से बीए अॉनर्स की पहले साल की एक छात्रा को उसके समलैंगिक झुकाव के चलते हॉस्टल से निष्कासित कर देने का मामला भी सामने आ चुका है। यह घटना इस सत्य को भी सामने लाती है कि BHU प्रशासन के साथ-साथ परिसर भी जेंडर समानता और सेंसिटाइजेशन के ककहरे को नहीं समझ सका है।

BHU परिसर में लड़कियों के साथ यौन हिंसा के मामले उस सूबे की लड़कियों की सुरक्षा का सूरते-हाल बयां करता है, जिनको यौन हिंसा से बचाने के लिए मौजूदा राज्य सरकार ने रोमियों स्क्वाड ज़ोर-शोर से बनाया था। ये हाल सूबे के उस शहर का है, जहां का सांसद देश का प्रधानमंत्री भी है, जिन्होंने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया है। पर सवाल यही है जो विरोध कर रही लड़कियों का नारा भी है “बेटी बचेगी, तभी तो पढ़ेगी।”

विश्वविद्यालय परिसरों में फिर चाहे वो JNU या BHU ही क्यों ना हो, DU हो या जामिया, महिलाओं के सुरक्षा का सवाल तमाम परिसरों में उठते रहे हैं। तमाम विश्वविद्यालय प्रशासनों का इन समस्याओं से निपटने का तरीका इतना अव्यवहारिक है कि लड़कियों को “पिजड़ा तोड़” जैसी मुहिम का हिस्सा बनना पड़ता है, जो समाज और उसके सामाजीकरण पर थप्पड़ रसीद करता है। तुम अगर ऐसे ही हो, तो ऐसे हो ही क्यों? वक्त के साथ लड़कियों से जुड़े तमाम अव्यवहारिक मामले, जांच कमेटियों और न्याय की दहलीज पर दम तोड़ते रहते हैं और नए मामले अपनी उपस्थिति को ज़ाहिर करने के लिए जगह खोजते रहते हैं।

हाल ही के दशकों में आधी आबादी ने पढ़ने-लिखने में ही नहीं बल्कि सफलता के कई और मापदंडों पर भी अपनी धमाकेदार उपलब्धियों को दर्ज किया है। ऐसे में नीति निर्माता, इनकी सुरक्षा के लिए माकूल माहौल का निर्माण क्यों नहीं कर सके हैं और समाज पुरुषों को संवेदनसील और व्यवहारिक बनाने के प्रयास में क्यों चूक गया? ज़ाहिर है कि हम और हमारी व्यवस्था, समाज की विकृति को समय रहते पकड़ पाने में असफल रही है। इसलिए इस विकृति से ग्रस्त लोग लड़कियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के साथ-साथ देश को भी शर्मसार करते हैं। समय रहते अगर हमने इसका समाधान नहीं खोजा तो जिन युवाओं की क्षमता का दंभ यह देश कई मंचों पर भरता है, वो युवा ही इस देश को शर्मसार भी करेंगे।

फोटो आभार: facebook पेज BHU Buzz

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