“बोलना आंटी आऊं क्या घंटी मैं बजाऊं क्या” आपको कूल नहीं बेशर्म बनाता है

Posted by Prashant Pratyush in Hindi, Society
September 16, 2017

सोशल मीडिया की साइबर खिड़कियों पर केवल लाइक, कमेंट, शेयर और सब्सक्राइब के ही विकल्प मौजूद नहीं है। सिनेमा, नाच-गाना आदि के बारे में यह मानकर चलते हैं कि ये सांस्कृतिक दासता से मुक्त भी करते हैं और गुलाम भी बनाते हैं। लेकिन, आज हम उपभोग की प्रक्रिया के मायनों में एक अर्थ का निर्माण भी करते हैं और देखने वाले को सक्रिय भी करते हैं। इसके साथ एक ऐसा बाज़ार भी जुड़ा हुआ है, जिससे सीधा-साधा ठोस लाभ जुड़ा हुआ है। इस लाभ की कोई नैतिकता, मर्यादा या सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं है। इस पर पिछले दिनों कई क्षणभंगुर महाकाव्य इस तरह प्रसारित हो रहे है, जिसने शीला की जवानी और तन्दूरी चिकन को भी पीछे छोड़ दिया है। वे एक नया सौंदर्य और वर्णन भाषा लेकर आते है, फूहड़ बोलों, घटिया संगीत के साथ ऐसा कुछ प्रस्तुत करते है, जो गर्व कम और सर झुकाने की वजह अधिक देता है।

बिना किसी बुनियादी रचनात्मक मौलिकता के यह चोखाधंधा- लाइक, कमेंट, शेयर और सब्सक्राइब के अंगूठे के ठेलने भर से शुरू होता है और कुछ लाख व्यू के बाद अतीत में खो जाता है। लेकिन यह पीछे छोड़ जाता है सोशल मीडिया के एक हिस्से का ऐसा दिवालियापन, जिसे निजी और सार्वजनिक जगहों पर केवल महिलाएं ही झेलती हैं और आंखे झुकाए अपने कपड़ों की सलवटों को ठीक करके आगे बढ़ जाती है।

कुछ दिनों पहले “सेल्फी मैंने लेली आज” जैसे गानों से लाखों कमाने वाली ढिचंक पूजा, अब ट्रेंडिंग लिस्ट के साथ खबरों का भी हिस्सा नहीं हैं। उनकी जगह पर अब ओमप्रकाश मिश्रा आए हुए हैं, मिश्रा की “आंटी की घंटी” किस आंटी को गर्व और सम्मान दे रहा है, पता नहीं? कुछ दिनों बाद इससे भी अधिक अश्लील प्रस्तुति के साथ कोई नया चेहरा होगा और सोशल मीडिया के खिलाड़ी लाइक, कमेंट, शेयर और सब्सक्राइब्स में धंसे रहेंगे।

सोशल मीडिया के इन खिलाड़ियों और नीति-निर्माताओं को यह समझने की ज़रूरत है कि इन चीजों के जरिए इंटरनेट का खतरनाक उदारवाद आभासी दुनिया के माध्यम से असल दुनिया में पैंठ बनाने की कोशिश कर रहा है। सोशल मीडिया पर आइटमों की पैठ क्षणभंगुर नहीं है, यह हफ्तेभर में अतीत में खो ज़रूर जाते हैं, लेकिन इसके अपने प्रभाव हैं, जिन्हें गंभीरता से समझने की ज़रूरत है।

भाषाई शिष्टाचार, नैतिकता और मर्यादा के मायने ही नहीं समझने वाले इन गानों को सुने, तो इसमें कोई मौलिकता नहीं दिखती है। ध्यान से सुनने पर पता चलता है कि किस तरह से महिलाओं से जुड़ी कुंठाओं का गान गर्व के साथ हमारी स्वीकृति से किया जा रहा है। आश्चर्य यह भी है कि इस तरह के गाने किसे कूल बनाते है और हमेशा महिलाएं ही इनके केंद्र में क्यों होती है?

अगर हम इस तरह के गानों का हिस्सा बन गए हैं या बनने वाले हैं तो हमें सोचना होगा कि आगे से महिलाओं के बारे में किस तरह की और कैसी टिप्पणियों को हमें गलत कहेंगे और किन्हें नहीं कहेंगे। इस तरह के गानों से अगर किसी के अपमान को कानूनी दायरे में देखा जाए तब या तो हमें विशाखा गाईड लांइस को फाड़कर फेंकना होगा या उस पर पड़ी धूल को झाड़ना होगा।

‘बोलना आंटी आऊं क्या’ गर्व से चिल्लाने की नहीं, शर्म से सर झुकाने देने वाली बात है। हम, ‘तुम्हारी है तुम ही संभालों ये दुनिया!’ कहकर अलविदा नहीं कह सकते है। हमको शर्म भी आती है, जिसे अब हमें कहना भी होगा।

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