नोटबंदी के राजनीतिक प्रपंच से हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा

Posted by Deepak Bhaskar in Hindi, Society
September 3, 2017

नोटबंदी से जो देश का नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कौन करेगा? देश की अर्थव्यवस्था को इतना बड़ा नुकसान हुआ उसकी जबाबदेही कौन लेगा? प्रधानमंत्री का किसी मुद्दे पर ना बोलना स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन गलत बोलना कैसे स्वीकार्य होगा, वो भी लाल किले की प्राचीर से? वित्तमंत्री जी कह रहे हैं कि विमुद्रीकरण का उद्देश्य यह नहीं था जो लोग समझ रहे हैं या इसे समझ नहीं पा रहे हैं। यह हो सकता है कि लोग गलत समझ रहे हों, लेकिन जो बात प्रधानमंत्री जी ने अपने 8 नवम्बर 2016 के भाषण में कही, वो गलत कैसे हो सकती है?

क्या उन्होंने नहीं कहा कि इससे भ्रष्ट्राचार खत्म हो जाएगा, काला धन वापस होगा? नए शिगूफे गढ़े गए कि आयकर भरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन कोई खास संख्या नहीं बढ़ी है, बल्कि यह बढ़त जो दिख रही है वह उन्ही लोगों की है जो पहले कागजी तौर पर आयकर भरते थे और अब ऑनलाइन भरते हैं, तो यह कैसे कह दिया गया की संख्या बढ़ी है? छोटी-मोटी बढ़ोतरी तो हर वर्ष होती ही रहती है, क्या 1950 में जितनी आयकर भरने वालों की संख्या थी, उससे हम आगे नहीं बढ़े, बढ़े ना?

यह समझना ज़रुरी है कि जब सरकार झूठ और प्रपंच करने लगे तो जनता क्या करेगी? नोटबंदी के दौरान सैकड़ों जानें गई, लोगों ने सरकार को अपना सर्वस्व दे दिया। इतना अटूट विश्वास और फिर जनता को वापस क्या मिला? अब कोई अगर यह कहे कि नोटबंदी एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रपंच था तो उसे क्या जवाब दिया जाएगा? क्या उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना इतना ज़रूरी था जिसके लिए देश की अर्थव्यवस्था को ताक पर रख दिया गया। कितनी जीत चाहिए भाई, अब हर घर में तो मोदी ही हैं। अब तो लोग अपने बच्चे के मरने पर भी कुछ नहीं बोलते हैं, कोई आन्दोलन नहीं खड़ा होता, अभी भी मोदी जी ही सबसे ऊपर हैं।

नेता कब समझेंगे कि जनतंत्र में हार और जीत का मसला नहीं होता। प्रजातंत्र चुनाव की राजनीति से कहीं ऊपर है और वर्तमान राजनीति ने जनतंत्र को महज़ चुनावी जीत तक सीमित कर दिया है। एक मजबूत जनतंत्र का ही परिणाम है कि मोदी जी जैसे आर्थिक रूप से निम्न वर्ग के परिवार के होते हुए भी इस देश के प्रधानमंत्री बन गए। यह एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें चुनाव हारने वाले की भी अहमियत उतनी ही होती है, जितना चुनाव जीतने वाले की। इसलिए तो कोई सरकार में होता है तो कोई विपक्ष में। यह समझ अगर नहीं है तो जनतंत्र का विनाश निश्चित है और इस विनाश से होने वाले नुकसान का अंदाज़ा शायद अभी लगाया नहीं जा रहा है।

यह कैसा देश बनाया जा रहा है, जिसमें सरकार कोई भी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार ही नहीं है। सड़क लोग खुद साफ़ करेंगे, रोज़गार खुद सृजित करेंगे, पढ़ने के लिए पैसे खुद कमाएंगे, जब लोग सब कुछ खुद ही करेंगे तो सरकार क्या करेगी? प्रजातंत्र में संवेदनाओं की भी जगह होती है, ऐसे कैसे कोई मुख्यमंत्री कह सकता है कि लोग बच्चे पैदाकर सरकार के पास छोड़ आयेंगे? क्या सरकारें भूल गयी हैं कि इस राज्य का निर्माण ही उसी सिद्धांत पर हुआ है जहां सरकारों को जीवन के हर पहलू की ज़िम्मेदारी दी गई है?

आज जनता के सामने पिछले सत्तर सालों में कुछ नहीं होने का दावा किया जा रहा है, कल कोई और सरकार आएगी और सारा दोष इस पर मढ़ देगी। लेकिन सवाल तब भी यही रहेगा कि जनता को मिला क्या? इस देश को मिला क्या?

नोटबंदी ने देश को सालों पीछे कर दिया, आर्थिक संस्थान चरमराने लगे हैं। बैंक ने खुद के पैसे निकालने पर भी वसूली शुरू कर दी है। इसकी ज़िम्मेदारी भी सरकार नहीं लेगी तो सरकार क्या करेगी? सरकारों को साफ़-साफ़ बताना चाहिए कि वो क्या कर सकते हैं और जनता उनसे क्या उम्मीद रखे।

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