रिव्यू: एडॉप्शन और परवरिश जैसे मुद्दों पर बनी एक खूबसूरत फिल्म लायन

Posted by Sparsh Choudhary in Art, Hindi
September 4, 2017

जिस तेज़ी से भारत सरसराता हुआ बढ़ रहा है, उससे आने वाले कुछ तीस सालों में एक अनुमान के अनुसार यह जनसंख्या में भी सबसे अव्वल आने वाला है। उसी रफ़्तार से सरकार और आवाम की मुश्किलें बढ़ना भी तय है, अगर एक समाज के तौर पर हम खुद को प्रगतिशील, संवेदशील और विकास से जुड़ी समस्याओं के समाधान का हिस्सा ना बना सके तो।

ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई फिल्म लायन, जीवन की कठिन चुनौतियों का सामना कर रहे एक खास तबके के किस्से को बयान करती है। ये तबका है बच्चों का, हमारे बच्चे, वही जिनके नाम का एक दिन हम बड़ी धूम-धाम के साथ 14 नवम्बर को मनाते हैं। पूरी दुनिया में कुछ 15 मिलियन बच्चे गुमशुदा हैं। नेल्सन मंडेला का कहना था, “हम अपने बच्चों की देखरेख कैसे करते हैं, यह हमारे समाज और राष्ट्रीय मूल्यों का आइना होता है।” अब आप ही सोच लीजिए!


लायन, मध्यप्रदेश की एक पत्थर तोड़ने वाली मां के सरू नाम के बेटे की सच्ची कहानी का फिल्मी रूपांतरण है। फिल्म गुमशुदा बच्चों की ज़िन्दगी, मानव तस्करी, संभावित अपहरण, रेलवे में सोने वाले लावारिस बच्चों, शिक्षा और स्कूल से कोसों दूर कोयला चुराने या छोटे-मोटे काम करने वाले बच्चों, अच्छे खाने और कोल्डड्रिंक के लालच से बच्चों को आकृष्ट करने वाले मीठे ज़हरीले इंसान, अनाथालयों की दुर्दशा, अखबारों में आती रोज़ाना की खबरों- जहां इन सो कॉल्ड रीहेब या पुनर्वास की जगहों में हो रहे शोषण और दुर्व्यवहार जैसे कई मुद्दों पर नज़र डालती है।

सबसे बढ़कर यह फिल्म मां, अभिभावक और एडॉप्शन जैसे मानवीय और सामाजिक पहलुओं की व्यक्तिगत कहानी है। हालांकि फ़िल्म मूलतः एक बच्चे, युवा और ऑस्ट्रेलिया के कपल के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन यह उन तमाम मुद्दों को छूकर जाती है, जिससे आप बार-बार यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि आप अपने जीवन में कितने स्वार्थी हैं और कैसे एक कूपमंडूक की तरह बन चुके हैं।

आप मिलिए सू और जॉन से। देखिए निकोल किडमैन और देव पटेल के उस बेहद खूबसूरत, मानवीय और गहन संवाद को। देखिये कि क्यों सरू और खुद को नुकसान पहुंचाने वाले एक बच्चे मंटोश (Mantosh) को सू ने अपनाया। क्यों अंततः यह उन्हें एक आध्यात्मिक शक्ति का पर्याय लगता है, जब ये दोनों बच्चे उनके पास होते हैं! देखिए वो परवरिश, वो आभार जो एक फॉस्टर मदर (गोद लेने वाली मां) अपने सरू के लिए महसूस करती है। महसूस करिए जब सरू से वो कहती हैं कि एक दिन वो खुद अपनी कहानी, अपना अतीत उसे बताएगा।

एक बच्चे को गोद लेना और उसे उसके अतीत से जोड़े रखना, उसकी याद दिलाना, उसकी संस्कृति और खानपान के साथ-साथ उसे उसके नाम से भी जोड़े रखना मां होने का सच्चा रूप है। जन्म देने वाली मां हो या पालने वाली मां, वो असुरक्षित कैसे हो सकती है? और यहां तो उनके पास तमाम वजहें हैं। सरू की जैविक मां भी तो इतनी ही शेरदिल हैं कि अब सरू की अब दो-दो माएं हैं। सारा जहां अब उसका है।

सनी पवार जब नन्हें लेकिन चतुर सरू के रूप में परदे पर रहते हैं तो वो आपको सुखद बचपन के आपके सौभाग्य पर गर्व करवाते हैं, क्योंकि सरू और उसकी तकलीफ को वो बिना किसी नाटकीयता के साथ निभाकर आपकी पलकों को भिगो देते हैं। फिल्म के अन्य ऐसे बच्चे भी जब एक मार्मिक कड़वी सी लोरी खुद ही गा के खुद ही सो जाते हैं, तो आप सिहर उठते हैं।

फ़िल्म में सिवाय सरू के लव इंटरेस्ट के सब कुछ सटीक, ज़रूरी और सही जगह पर लगता है। सरू की पहचान, उसके भाई गुड्डू और मां के फ्लैशबैक्स, धुंधली यादें और देव पटेल का उम्दा अभिनय- फ़िल्म को मार्मिक और सच्चा बनाता है। सिनेमैटिक दृष्टि से भी फ़िल्म बांधें रखती है, कैमरा सरू की आंखों से उसकी ज़िन्दगी की गलियों को खोजता सा लगता है।

नवाज़ुद्दीन और तनिष्ठा चटर्जी एक छोटे से रोल में भयभीत कर देते हैं। एडिटिंग भी सिवाय कुछ फ्लैशबैक्स के फ़िल्म को कसी हुई बनाती है। अगर सरू की लव स्टोरी वाले पार्ट को हटा दिया जाता तो शायद एक बच्चे से काबिल युवा बनने के बाद के आम जीवन के अन्य वास्तविक या फिक्शनल पहलुओं पर नज़र नहीं पड़ पाती। हालांकि फिल्म थोड़ी कम लंबी और कसी हुई बन पाती।

फिल्म के सबसे अहम संवाद से मुझे महसूस हुआ कि बच्चा अडॉप्ट करना एक डिवाइन एक्सपीरियंस हो सकता है। आखिर क्यों हमें सेरोगेसी या आई.वी.एफ. की ज़रूरत है जब इतनी बड़ी दुनिया में इतने सारे बच्चे एक परिवार के प्यार को तरसते हैं? क्यों भारत में एडॉप्शन रेट इतना कम है? क्यों हम इतने छोटे दिमाग वाले हैं कि अब भी ‘अपने खून’ वाले पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं?

इस फिल्म ने मुझे यह भी समझाया कि कैसे एडॉप्शन के बाद बच्चे को उसकी सम्पूर्णता और स्वाभाविकता में अपनाने की ज़रूरत होती है। और यह भी कि कि बच्चों की परवरिश, देखभाल और उनकी तरक्की, एक बेहद ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता से जुड़ा मानवीय मसला है।

हमें गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है कि कुपोषित बच्चों, कुपोषित माओं और अनदेखी ट्रैफिकिंग की शिकार इस नन्हीं आबादी को आज़ादी हम दे पाएंगे? सरकारें, गैर सरकारी संगठन, तमाम अमीर, पढ़े-लिखे वैल टू डू लोग- क्या हम इस ग्लोबल दुनिया के सच्चे पैरोकार बनेंगे? एक ऐसी दुनिया जहां हर ऐसा बच्चा हमारा हो सकता है, उसकी ज़िन्दगी को बेहतर बनाने और उसे आम बच्चों सी ज़िन्दगी देने और खुद उन खुशियों को समेटने का वो मौका जो वो हमारी ज़िन्दगी में लाएंगे, क्या हम उन्हें देना चाहते हैं?

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