खुदा करे मुझे दोबारा BHU के उन रास्तों से ना गुज़रना पड़े

बात ज़्यादा पुरानी नहीं है, करीब डेढ़ साल पहले की यह घटना है। मेरी बहन की तबियत ठीक नहीं थी, जिसके लिए हम बीएचयू के सर सुन्दर लाल अस्पताल में इलाज करवाने के लिए गए थे। नंबर देर में आना था तो सोचे कि कैम्पस में घूम लेते हैं। पहले कैम्पस के एक पार्क में हम लोग थोड़ी देर आराम किए। उसके बाद विश्वनाथ मंदिर घूमकर थोड़ा आगे निकल गए, लेकिन क्या मालूम था ये आगे आना इतना खतरनाक होगा कि ज़िंदगी में आगे जाने में हमेशा एक डर सा बना रहेगा।

गर्मी का दिन था और रास्ते में पेड़ पौधे थे तो अच्छा लग रहा था, लेकिन हुआ कुछ यूं कि वहां से जब हम घूमते हुए निकले तो हम भूल गए कि ये जगह हमारे लिए अनजान है। हमें तब हल्का सा डर लगने लगा, जब वो रास्ता बिलकुल सुनसान हो गया। रास्ते में कोई भी नहीं दिख रहा था, तभी आगे से दो-तीन लड़के आते हुए दिखाई दिए। थोड़ी राहत हुई कि चलो कुछ लोग तो हैं, लेकिन कहां मालूम था कि ये राहत नहीं ज़िंदगी भर के लिए एक डरावने सपने जैसा हो जाएगा।

वो लड़के हमे देखकर मुस्कुरा दिए, हमें लगा कि कैम्पस के ही लोग होंगे, हम इनसे रास्ता पूछ सकते हैं। थोड़े स्माइलिंग फेस के साथ पूछ लिए, “भैया यहां से मेन गेट पर जाने का रास्ता कौन सा है?” लेकिन उनसे जो जवाब हमें मिला उसने झकझोर कर रख दिया। उसमें से एक बोलता है- “लड़की हंसी मतलब फंसी”, दूसरा कहता है, “इतना परेशान क्यों होती हो, आओ- हम छोड़ देते हैं।”

बहुत नाम सुनी थी बीएचयू का लेकिन उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि ये पढ़ाई का अड्डा नहीं कुछ और ही है। खैर हमारी किस्मत अच्छी थी, दूसरी तरफ से दो पुलिस वाले बातें करते हुए आते दिखाई दिए, उन्होंने हमें रास्ता तो बताया ही, विश्वनाथ मंदिर तक साथ भी आए।

उसी दिन से बीएचयू के नाम से कहीं ना कहीं दिल में एक खौफ जाग जाता था। आज जब वहां कि छात्राएं अपनी सुरक्षा के लिए आवाज़ उठा रही हैं तो क्या गलत है? जहां मुझे दिन को ग्यारह बजे डर लग रहा था, सोचिए वो लड़कियां सुबह शाम कैसे वहां अपना वक्त काटती होंगी? ये तो होना था आज नहीं तो कल। कहते हैं ना कि बर्दाश्त की भी एक हद होती है, यहां मैरीकॉम का एक डायलाग बहुत फिट होता है – “किसी को इतना भी मत डराओ कि डर ही खत्म हो जाए।”  हमने बस सुरक्षा ही तो मांगी है, आपकी कोई जागीर तो नहीं।

फोटो आभार: facebook पेज BHU BUZZ

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