ग्लोबल होते हमारे देश में कौन चुका रहा है डेवलपमेंट की कीमत?

Posted by vivekanand singh in Hindi, Society
September 24, 2017

हर सप्ताह की तरह शुक्रवार के दिन घर पर ही सोया था। मेरी आंखें तो बंद थी, लेकिन उनमें से नींद कहीं और गायब हो चुकी थी। दरअसल, पिछले कुछ समय से मैं महसूस कर रहा हूं कि जैसे-जैसे मुझे सोने में मज़ा आ रहा है, उसी तरह मेरी नींद को बाहर घूमने में मज़ा आने लगा है। लंबे समय तक आंख बंदकर नींद महाराज को मनुहार करने के बाद ही वे पधारते हैं। हां, जब वे एक बार पधार जाते हैं, तो वापस जाने के लिए मां की डांट तक का इंतजार भी करते हैं। इस मामले में मेरी मां का कहना है कि सारा दोष मेरे स्मार्टफोन का है।

मां इस बात से नाराज़ रहती हैं कि मैं हमेशा अपने मोबाइल देवता को सीने से किसी प्रेमिका की तरह चिपकाए रहता हूं। वैसे तो मेरी मां को तकनीक की कोई खास जानकारी नहीं है, लेकिन वह कहती हैं कि इसके रेडिएशन की वजह से ही आजकल लोग दिमागी तनाव को झेल पाने में कमज़ोर साबित हो रहे हैं। वह बक्सर के डीएम मुकेश पांडे के आत्महत्या कर लेने से काफी नाराज़ हुई थीं। मैंने मां को मुकेश का आखिरी वीडियो दिखाया था। तब से वह स्मार्टफोन के नाम से ही चिढ़ती है। खैर, यह जानते हुए कि मां ठीक ही बोल रही हैं, फिर भी उसकी बातों को सुनकर अक्सर अनसुना कर देता हूं।

खैर, उस दिन मेरी आंखें बंद ही थी कि मन का इंजन स्टार्ट हो गया। वह भी मेरी नींद की तरह इधर-उधर फुदकने लगा। तभी खयाल आया कि अगर इंसान द्वारा किये गये सारे आविष्कारों को ही दुनिया से हटा लिया जाता, तो क्या होता? क्या पूरे देश या पूरी दुनिया को कभी देख पाना हमारे लिए संभव हो पाता? क्या हमारी जिंदगी नीरस हो जाती या फिर हम प्रकृति का और बेहतर आनंद ले रहे होते?

पेड़ से सेब को गिरते देखकर न्यूटन द्वारा गुरुत्वाकर्षण बल की खोज हो या कोलंबस और वास्कोडिगामा जैसों के द्वारा दुनिया के खोज की साहसिक कहानियां, ये सभी मैंने बचपन में पढ़ी थी। रोनाल्ड रॉस कैसे मलेरिया परजीवी की खोज करते हुए मलेरिया के शिकार भी हुए। लेकिन आज जिस दुनिया में हम जी रहे हैं, वह हम इंसानों की जिज्ञासा का ही कमाल है। पलक झपकते वॉशिंगटन में नौकरी कर रहे दोस्त से वीडियो कॉलिंग पर बात हो जाती है।

हालांकि जिस तेज़ी से हम सभ्य हो रहे हैं, उसी तेज़ी से प्रकृति के साथ अन्याय भी कर रहे हैं। प्रकृति बार-बार आपदाओं के जरिए हमें संकेत भी दे रही है। फिर भी हम सब सचेत होने की जगह अंधी दौड़ में शामिल होने को बेताब हैं। विज्ञान एक बीमारी को मात देता है, तो डेंगू, इबोला जैसी दूसरी बीमारियां मुंह बाएं खड़ी हो जाती हैं। ग्लोबल विलेज बन रही दुनिया के भिन्न-भिन्न देशों के बारे में कुछ जानकारी टटोलने के लिए मैंने झट से बेड पर पड़े स्मार्टफोन महाराज को हाथों में लिया और गूगल देवता से सवाल पूछना शुरू कर दिया। अगले ही पल सूचनाओं का विशाल संसार मेरे सामने आ गया। यह तकनीक का कमाल था, पल भर में मिली सूचनाएं मुझे अज्ञात के भय से लड़ने की ताकत दे रही थी।

अभी यूनाइटेड नेशंस के मेंबर्स के संख्या के हिसाब से देखें, तो देशों की कुल संख्या 193 है। इसके अलावा दो देश ऐसे भी हैं, जो यूनाइटेड नेशंस से संबद्ध नहीं हैं। यानी दुनिया में अभी 195 देश हैं। हालांकि, ताइवान को भी अगर देश माना जाये, तो यह संख्या 196 हो जाती है। दरअसल, यूएन ताइवान को चीन का हिस्सा मानता है।

ग्लोबल परिवार के महाद्वीपों पर अगर नजर डालें, तो हम पाते हैं कि 54 देशों के साथ अफ्रीका सबसे ज्यादा देशों वाला महाद्वीप है। उसके बाद हमारे एशिया का नंबर आता है, जिसके देशों की संख्या 48 है। देशों के मामले में 44 देशों के साथ यूरोप तीसरे स्थान पर है। लेकिन आबादी के मामले में एशिया के दो प्रमुख देश चीन और भारत ही दुनिया के कई महाद्वीपों पर भारी हैं। अगर प्रतिशत का हिसाब लगाया जाए तो चीन में पूरी दुनिया की आबादी के 18 प्रतिशत से ज़्यादा और हमारे अपने देश में दुनिया की आबादी के 17 प्रतिशत से ज़्यादा लोग रहते हैं। कमाल की बात है कि तीसरे नंबर पर सर्वाधिक आबादी वाले देश यूनाइटेड स्टेट्स में दुनिया की आबादी का मात्र 4.3 प्रतिशत हिस्सा ही रहता है।

यानी तमाम साधनों से संपन्न अमेरिका की आबादी भारत की एक चौथाई से भी कम है। इंटरनेट जैसी अनोखी क्रांति की वजह से दो अमेरिकी सोशल साइट फेसबुक और ट्विटर और अमेरिकी सर्च इंजन गूगल का प्रसार काफी तेज़ी से भारत में हुआ है। आज अमेरिका-यूरोप के वैभवों को आम भारतीय भी इन वर्चुअल माध्यमों पर देख और जान पा रहा है। उनकी तरह जीवन जीने की आकांक्षा पाल रहा है।

लेकिन अगर देश और उसके तमाम संसाधनों को एक रोटी माना जाये, तो एक रोटी को 17 टुकड़े करके देखिए और दूसरी रोटी को चार टुकड़े करिए, तब असल अंतर समझ में आएगा। ऊपर से अपने देश के सरकारों की आर्थिक नीतियों की वजह रोटी के टुकड़े समान भी नहीं होते हैं। यहां कुछ टुकड़े काफी बड़े होते हैं, तो कुछ काफी छोटे। यानी अपने देश में दिनोंदिन अमीरी और गरीबी की खाई तेज़ी से बढ़ रही है। अमेरिका के केस में ऐसा नहीं है, क्योंकि वहां की बड़ी-बड़ी कंपनियों में देश की जनता के शेयर मौजूद हैं। यानी कंपनी बढ़ेगी, तो किसी एक या सौ आदमी ही नहीं, बल्कि पूरे देश के अधिकांश लोगों की संपत्ति बढ़ेगी।

अब सोचिए ग्लोबल होते अपने देश का कितना दबाव भारतीय जनमानस पर पड़ रहा है? क्योंकि इंसानी आकांक्षाओं और सपनों को तो रोक पाना संभव है नहीं। वह भी तब, जब बेड पर सोए-सोए मैं अमेरिका स्थित फ्लोरिडा के सड़कों पर भागती गाड़ियों को देख पा रहा हूं। यहां पर आपको लगेगा कि विकसित देश चीन की चर्चा तो मैंने की ही नहीं। वहां की आबादी भी अधिक है और वह देश संपन्न भी है। अगर आबादी बड़ा मुद्दा होता, तो उसने यह कारनामा कैसे कर दिखाया? दरअसल, चीन में लोकशाही नहीं है। वहां लोग मनमानी नहीं कर सकते। वहां भ्रष्टाचार जैसे अपराधों के लिए कड़े कानून हैं। अपना देश तो आकंठ भ्रष्टाचार रूपी शराब में डूबा हुआ है।

ऐसे में अपने देश की बेहतरी के लिए पहली शर्त अनियंत्रित आबादी को तो ब्रेक लगाना है ही। साथ ही दूसरी सबसे महत्वपूर्ण शर्त है कि देश की आर्थिक नीतियों को बदला जाये। शेयर खरीद-बिक्री का प्रपंच तो यहां भी होता है, लेकिन हम अभी तक एक अमेरिका की तरह विकसित राष्ट्र नहीं हैं। ऐसे में सरकार को अपनी नीति बड़े उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने की जगह आम नागरिकों के हिसाब से बनानी होगी। अगर ऐसा नहीं हो पाया तो क्या होगा? उसका जवाब आप खुद ही खोजने की कोशिश करियेगा।

आज आपके हाथ सस्ते में मोबाइल फोन और डाटा तो पहुंच गया है, लेकिन उस डाटा को रेगुलर भरवाते रहने की कमाई आज भी अधिकांश आबादी नहीं कर पा रही है। सोचियेगा, इस पर ज़रूर सोचियेगा।

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