4 महीने छत्तीसगढ़ में रहकर मैंने जाना, गोली नक्सलियों की हो या सरकार की मरता आदिवासी ही है

Posted by Saurabh Raj in Hindi, My Story, Staff Picks
September 19, 2017

‘छत्तीसगढ़’ ये शब्द सुनते ही आपके ज़हन में सबसे पहले क्या आता है? जल, जंगल और ज़मीन, आदिवासी, स्मार्ट सिटी या नक्सली हिंसा और बस्तर में फैला आतंक? मेरी मां को जब यह पता चला था कि मैं छत्तीसगढ़ जाने वाला हूं और अपने जीवन का कुछ समय वहीं गुज़ारने का फैसला लिया है, तब उनकी आवाज़ में उभरे डर और चिंता को आसानी से सुना जा सकता था। दिल्ली विश्वविद्यालय और इतिहास विषय का छात्र होने के नाते बस्तर के बारे में काफी कुछ सुना और पढ़ा था। लेकिन छत्तीसगढ़ आने के बाद इन सब बातों से अलग बहुत कुछ देखा, सुना, महसूस किया है। कई पूर्वाग्रह गलत साबित हुए और कई नयी उलझनो ने घेर लिया। अब मेरे लिए स्वस्थ्य और मज़बूत लोकतंत्र की व्यवहारिकता और प्रासंगिकता और बढ़ गयी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की कैंटीन में और राजस्थान के बुद्धिजीवी मित्रों के साथ चाय पर जितनी चर्चा हुई उससे यही समझ में आता था कि बस्तर की लड़ाई पूंजीवाद बनाम साम्यवाद की है, अमीरी बनाम गरीबी की है, व्यवस्था परिवर्तन बनाम व्यवस्था निरंतरता की है। लेकिन इससे इतर यह लड़ाई तथाकथित सरकारी क्रांति बनाम नक्सली क्रांति की है। जिसमें क्रांति के नाम पर दोनों पक्षों को गरीब-मजलूमों के ऊपर नाना प्रकार के अत्याचार करने का लाइसेंस प्राप्त है।

ऐसी जगहों पर न्याय और लोकतंत्र जैसे बड़े-बड़े शब्द सिर्फ विश्वविद्यालयों में ही सुनने में अच्छे लगते हैं क्योंकि बस्तर में प्रवेश होते ही ये सारे शब्द एक खोखले स्तम्भ का रूप धारण कर वहां की प्राचीन कलाकृतियों में समा जाते हैं, एक मूकदर्शक बन जाते हैं।

इस खोखलेपन के शिकार कई मासूम आदिवासी होते हैं। एक ग्रामीण ने चर्चा में बताया कि मई महीने में बस्तर के सुकमा जिले में बुरकापाल नामक जगह पर मुठभेड़ हुई। तीन दिनों बाद पुलिस ने मुठभेड़ में मारे गए एक व्यक्ति का शव बरामद किया। पुलिस के अनुसार वह शव माओवादी बामन का था लेकिन ग्रामीणों ने उसकी पहचान चिंतागुफा नामक गांव के पूर्व सरपंच माड़वी दुला के बेटे के रूप में की। माड़वी दुला को कुछ महीने पहले ही नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में मार डाला था।

एक माह के भीतर पिता और पुत्र की अलग-अलग वारदातों में हुई मौत इस क्रांति की बखिया उधेड़ते सरकारी तंत्र और तथाकथित क्रांतिकारियों की क्रांति पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। आखिर जिन लोगों ने बामन के पिता की हत्या बस एक महीने पहले की हो, वह कैसे उन्हीं लोगों के साथ सुरक्षाबल और पुलिस पर हमला करने चला आएगा? बामन और माड़वी दुला अब तक इस लाल क्रांति के लाल पन्नों में कहीं गुम हो चुके होंगे। ऐसे कई मामले हैं जो पुलिस की विश्वसनीयता को संदेह के कठघरे में खड़ी करती है।

एक स्थानीय अखबार देशबंधु में छपी रिपोर्ट में संयुक्त संघर्ष समिति की जांच दल की रिपोर्ट का ज़िक्र किया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार CRPF के जवानों ने माओवादी हमले के बाद बुरकापाल गांव को ही खाली करने का फरमान सुना दिया है। सैकड़ों की संख्या में गांव के आदिवासियों को जेल में डाल दिया है। इनके खिलाफ किसी तरह का मामला भी नहीं है।

बस्तर बचाओ संयुक्त संघर्ष समिति की जांच कमेटी ने एक और शर्मनाक सच उजागर किया। जांच कमेटी के मुताबिक दंतेवाड़ा ज़िले के पालनार कन्या छात्रावास की छात्राओं को, CRPF के जवानों द्वारा तारीख से एक सप्ताह पूर्व ही रक्षाबंधन त्यौहार मनाने के लिए विवश किया गया था। यह वही छात्रावास है जिसमें CRPF के जवानों द्वारा राखी बंधवाने के बहाने यौन प्रताड़ना का मामला सामने आया था। जिसे देश के बड़े अखबारों ने भी प्रमुखता से छापा था।

ताज़ा जानकारी के अनुसार यौन प्रताड़ना में शामिल जवानों के खिलाफ अब तक कोई भी कार्रवाई नहीं हुई है। यहां तक कि छात्रावास की अधीक्षिका द्रौपदी सिन्हा पर भी राज्य सरकार ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। जबकि उसकी भूमिका बिल्कुल ही स्पष्ट है। छात्राओं ने भी द्रौपदी सिन्हा के ऊपर कई गंभीर आरोप लगाए थे। एक छात्रा ने तो द्रौपदी सिन्हा के अत्याचारों से तंग आकर अपनी जान लेने की भी कोशिश की थी। लेकिन न तो सरकार कोई कार्रवाई कर रही है और न ही बस्तर क्रांति के ठेकेदार कुछ कर पा रहे हैं।

Report Published In Deshbandhu Newspaper About Burkapal Village
देशबंधु अखबार में छपी रिपोर्ट

ऐसे कई किस्से बस्तर की लाल दहशत की प्रासंगिकता को सही साबित करते हैं। आम आदिवासियों को दोनों तरफ से प्रताड़ित किया जा रहा है। पुलिस की एक रिपोर्ट के अनुसार 28 अप्रैल को नक्सलियों के एक समूह ने कोंडागांव ज़िले के एक आदिवासी गांव पर धावा बोला और सबकुछ लूट लिया। कुछ नक्सलियों ने दो आदिवासी परिवार के कुल बारह सदस्यों को गांव से बाहर निकाल दिया। पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने इस लूटपाट का विरोध किया था जिसके कारण नक्सलियों ने उन्हें पुलिस का मुखबिर बताकर गांव से बाहर निकालने का फरमान सुनाया।

पुलिस की विश्वसनीयता और नक्सलियों के आतंक के कारण आम आदिवासियों का जीवन दुभर हो चुका है। 17 साल बाद भी नक्सलियों का गढ़ सुकमा सरकार की पहुंच से दूर है। सुकमा ज़िले के 80 किमी हाईवे पर ही शासन का वजूद दिखता है जिसे भी नक्सली जब चाहते हैं आसानी से रोक देते हैं। इन इलाकों की सैकड़ों गांवों में नक्सलियों की जनताना कमेटी का शासन चलता है जहां पर बहस की गुंजाइश शून्य होती है। पुलिस और नक्सलियों के बीच चल रहे इस संघर्ष ने कई आदिवासियों को पलायन करने पर मजबूर कर दिया है। सरकार के पास इसका कोई आंकड़ा तो नहीं है। लेकिन सामाजिक संगठनों की माने तो यह संख्या लाखों में हो सकती है।

यह खूनी और खोखली क्रांति और सरकार का संघर्ष अब एक अनिश्चितता की ओर बेधड़क बढ़ चला है। आदिवासियों को आधार बनाकर सरकार और नक्सली अपनी-अपनी राजनीति साधने का प्रयास करते नज़र आते हैं। ऐसा लगता है मानो कि सरकार और तथाकथित क्रांतिकारियों की सोच को लकवा मार गया हो।

नक्सलियों का अमूमन मानना है कि अगले 50 सालों में पूंजीवाद अपने ही बोझ तले ध्वस्त हो जायेगा। तब नक्सलियों की राजनीति एक विकल्प बनकर उभरेगी। लेकिन जो आदिवासी अपने कन्धों पर बन्दूक रखकर इस खूनी क्रांति को ढो रहे हैं, वो कहां होंगे? क्या इसका अंदाज़ा है किसी को?

आज सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में नवफासीवाद बनाम नवउदारवाद पर बहस हो रही है। दुनिया में बेहतर लोकतंत्र के लिए हर कोने में संघर्षों और प्रयोगों का दौर जारी है। लेकिन तकनीक, आपसी बातचीत, जैसे माध्यमों से किये जा रहे प्रयोग, मुझे इस बन्दूक के प्रयोग से अधिक उम्मीद देते हैं।

अतिघोर असहमतियों के बावजूद जितना भी समझा हूं उससे यह तो बिल्कुल ही स्पष्ट है कि इस संघर्ष ने बस्तर के आदिवासियों को लड़ना सिखाया है। कई आदिवासी जल, जंगल और ज़मीन के अधिकार और अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसका अधिकार उन्हें हमारा संविधान देता है। लेकिन क्या इन आदिवासियों को गंभीरता से सुना जाएगा? क्या इन आदिवासियों को उनके अधिकार की लड़ाई जनतांत्रिक तरीके से लड़ना सिखाया जायेगा?

मैंने सुना है कि सच्चा कॉमरेड कभी नहीं थकता है। गरीब-मजलूमों पर कभी नहीं अत्याचार होने देता है। इसलिए थोड़ा रुको, आराम करो, और अपने आदिवासियों से बात करो। अब इस दिशाहीन और खूनी आन्दोलन को सही मार्ग लोकतंत्र (आदिवासियों से, आदिवासियों की बात) ही प्रशस्त कर सकता है। जिनका आन्दोलन है, जिनके नाम पर लड़ा जा रहा है, उनकी बातों को ध्यान से सुनने और उनसे बात करने का वक्त आ चला है, कॉमरेड।

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