हंगरी के लोगों में भी है हिंदी का क्रेज़

Posted by Kanchan Bhardwaj in Hindi
September 14, 2017

विदेश में हिंदी रोज़गार के लिए नहीं पढ़ी जाती। हिंदी विदेशियों के लिए एक देश की संस्कृति को खोलती है। हिंदी पढ़कर कोई रोज़गार मिलेगा यह सोचकर विदेश में हिंदी नहीं सीखी जाती। अधिकतर लोग हिंदी भारत को जानने के लिए पढ़ते हैं। भारतीय आध्यात्मिकता और रिश्तों की गर्माहट विदेशियों को आकर्षित करती है। बॉलीवुड की फिल्में देखकर भारतीय रिश्तों के प्रति लोग बेहद आश्चर्य से देखते हैं और उनके नज़दीक जाना चाहते हैं। कई लोग भारतीय कविता और संगीत को पढ़-सुनकर भी हिंदी के पास पहुंचते हैं।

हिंदी और संस्कृत भाषा के बहाने कहानी, कविता, संगीत, योग, आयुर्वेद और पयर्टन भारतीय संस्कृति को समझने का माधयम बनते हैं। मैं जब बुडापेस्ट (हंगरी ) आई तो सबसे पहले जो मकान मालकिन मिलीं, उन्हें हिंदी में अच्छी तरह बात करते देखकर मैं चौंक गई। फिर पता चला कि वह पिछले कई सालों से हिंदी सीखतीं और अभ्यास करती हैं। उन्होंने कोई फिल्म देखी थी और उसके रिश्ते उन्हें आकर्षित करते हैं। उन्हें हमसे बात करने में बहुत दिलचस्पी रहती क्योंकि उनका अभ्यास होता रहता और हमें भी अच्छा लगता क्योंकि हमारी शुरूआती दिनों की मुश्किलें हल हो रहीं थीं। एक भाषा के बहाने हम बहुत अच्छे दोस्त बने हैं।

धीरे-धीरे कई अन्य लोगों से मिलना हुआ जो हिंदी, भारतीय संगीत और योग से किसी ना किसी तरह जुड़े थे। अधिकतर लोगों ने बॉलीवुड की फिल्में देखने के बाद हिंदी सीखना शुरू किया। हिंदी गाने भी उन्हें पसंद आते। एक लड़की ने अपनी बांसुरी वादन के साथ कई पुराने हिंदी गाने मुझे सुनाए। बॉलीवुड अभिनेता और गांधी को लोग खूब पहचानते हैं। एक अंजान व्यक्ति ने बारिश से बचने के लिए मेरे बच्चों को छाता इसलिए ही दे दिया क्योंकि हम अमिताभ बच्च्चन जी के देश से हैं। यहां अक्सर लोग हमें ना जाने कैसे पहचान लेते और कहते कि ‘इंडीआई’ और फिर ‘नमस्ते’ कहते। यह बहुत बार हुआ।

बुद्ध की मूर्तियां भी यहां बहुत बिकती हैं और योग केंद्र भी खूब हैं। कई लोग भारत को आध्यात्मिक नज़रिये से देखते हैं। भारत घूमने जाने और भारत के बारे में जाने की ललक से भी कई लोग हिंदी सीखते हैं। ऐसे एक नहीं कई लोग मिले जो भारत की संस्कृति को हिंदी और संस्कृत के ज़रिये जानना चाहते हैं। भारतीय रोटी कोई हिंदी प्रेम के कारण बनाये और ‘गीता’ भी पढ़े-समझे, यह बात विदेश में देखकर सचमुच बहुत रोचक लगती है। यह सच है कि डिजिटल समय में सब कुछ गूगल अनुवाद हो सकता है, लेकिन यह भी सच है कि आज भी हिंदी और हंगेरियन भाषा का शब्दकोष मैंने यहीं हंगरी से खरीदा।

बुडापेस्ट में हिंदी एक पूरी संस्कृति की तरह पल्लवित होते मैंने देखी है। एक भारतीय संस्कृति की परवरिश और हिन्दी भाषी होने का गौरव, विदेश में आनंद से भर देता है। खासकर तब जब आप विदेशी लोगों को आपकी अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति नतमस्तक देखते हैं। यह भारत सरकार का योगदान है जो ‘भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद’ के बहाने इंडोलोजी विभाग में हिंदी अध्यापन की सुविधाएं विदेश में देती है। आखिर हमें अपनी भाषा पर गर्व करने की बात भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कितने समय पहले ऐसे ही तो नहीं कही थी -”निज भाषा उन्नति अहे ,सब उन्नति को मूल।” हम विदेश में अपनी भाषा के बहाने अपनी संस्कृति को फलते फूलते हुए देख सकें, यह गौरव की बात है।

फोटो प्रतीकात्मक है।

फोटो आभार: www.indovacations.net

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