लौंडा नाच वो कला जिससे लोग मज़े भी लेते हैं और नज़र भी चुराते हैं

Posted by Karunesh Kishan in Art, Culture-Vulture, Hindi
September 30, 2017

देह मर्दाना हो और देह पर कपड़ा जनाना तो कुछ अलग ही होगा, मर्दानी चाल मे जनाना थिरकन हो तो कुछ अलग ही होगा। महाभारत में शिखंडी का नाम तो सुना ही होगा?

जब आप बिहार, उत्तर प्रदेश के इलाको से गुज़रेंगे, तो कई गांवों-कस्बों की शादी-बारात में इन्हे थिरकते पाएंगे। ऊपर से नीचे तक मेकअप किए कम उम्र के लड़के, मेकअप भी इतना की आप उन्हे लड़की से कम नहीं जानेंगे। शामियाना (आम तौर पर बारातियों के ठहरने का स्थान) खचाखच भरा मिलेगा। बच्चे, जवान, बुजुर्ग सब इस कदर हुड़दंग करेंगे कि आप एक पल यह सोचने लगेंगे कि क्या मै इंसानी समाज का ही हिस्सा हूं? तभी मंच से एक आवाज़ आती है, जिस पर सभी ध्यान देते हैं। गाना शुरू होता है और इन मेकअप किए लड़कों का नाच भी।

‘लौंडा नाच’, भोजपुरी लोकगीत की संस्कृति में इसका कहीं-कहीं जिक्र मिलता है। भिखारी ठाकुर जिन्हे भोजपुरी का शेक्सपियर भी कहा जाता है, उनके लोक गीतों मे भी कहीं-कहीं लौंडा नाच का ज़िक्र मिल जाता है। सिर्फ भारत ही नहीं पाकिस्तान, अफगानिस्तान और कई अन्य मुस्लिम तथा गैर-मुस्लिम देशों मे भी यह देखने-सुनने को मिलता है। लोग इसे देखते-सुनते भी बहुत चाव से हैं।

खासकर उत्तर भारत मे पूरबी गीत और लौंडा नाच का एक अलग ही मेल है। एक बार खबर हो जाए कि फलाना की शादी मे ‘ट्वींकलवा’ का नाच है (‘ट्वींकलवा’ काल्पनिक नाम है) तो देखो कैसे सुबह से सब अपना-अपना रुमाल डाले जगह पक्का कर लेगा सब। फिर धर के लूहेड़ापनी और छीछालेदर मचाएगा सब।

यहां तक तो कोई दिक्कत नहीं है, बात वहां आकर अटक जाती है जब लौंडा नाच की एक अलग ही कहानी निकलती है। लोक कला से बदलकर यह पहले एक सस्ता मनोरंजन बना, फिर धंधा और अब कुछ और। लौंडा नाच को और पास से देखते हैं तो इसमे जो नाचने वाले (जिन्हे ‘लौंडा’ कहा जाता है) दिखते हैं, वो कम उम्र मे ही उठाए गए या घर से भागे लड़के, पैसो के लिए इस विधा को सीखते हैं और इसी मे रम जाते हैं।

इनकी अपनी कोई खास पहचान नहीं होती। आज स्थिति यह है कि नाच के बहाने इनके साथ अश्लील हरकते और यहां तक कि यौन शोषण भी किया जाता है। हम आज भी ट्रांसजेंडर्स या उन जैसे किसी भी समुदाय को सिरे से नकार देते हैं।

हम अपने सभ्य समाज का चुनाव भी खुद करते हैं और उन्हे असभ्य भी खुद ही करार देते हैं। यह समाज का एक ऐसा हिस्सा है जिससे लोग मज़े तो लेते हैं, पर मुंह भी चुराते हैं।

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