आंटी की घंटी: औरतों की इज्ज़त का माखौल उड़ाना अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर ओमप्रकाश मिश्रा का गाना (हालांकि जिसे गाना कहना भी गानों की बदनामी ही है) ‘बोल ना आंटी आऊं क्या’ वायरल हो रहा है। इस गाने को 2015 में ही ओमप्रकाश मिश्रा ने यूट्यूब पर अपलोड किया था और अब दो सालों बाद यह अचानक से वायरल हो गया है। इस वीडियों में ओमप्रकाश ने ‘बोलना आंटी आऊं क्या, घंटी मैं बजाऊं क्या’ जैसे द्विअर्थी और स्त्री विरोधी लिरिक्स के साथ अपने (बे’)सुरों को साधने की कोशिश की है।

इस गाने के बोल इतने वाहियात और घटिया हैं कि इसने फूहड़ और भद्दे कहे जाने वाले अब तक के तमाम बॉलीवुड और भोजपुरी गानों को भी पीछे छोड़ दिया है। कई लोगों ने यूट्यूब चैनल से इस वीडियो को हटाने की मांग भी की है, इसके बावजूद कई युवा इस गाने को बड़े चाव से सुन रहे हैं और इस पर झूम रहे हैं। अब तक 27 लाख से भी ज़्यादा लोग इस गाने को लाइक और सब्सक्राइब कर चुके हैं।

सबसे कमाल की बात यह है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी लोग इसे ओमप्रकाश मिश्रा की अभिव्यक्ति की आज़ादी बताते हुए उसके गाने का समर्थन कर रहे हैं और इसमें केवल लड़के ही नहीं, लड़कियां भी शामिल हैं। भला यह कैसी अभिव्यक्ति की आज़ादी है जनाब, जो किसी लिंग विशेष की मर्यादा को सरेराह तार-तार करती हो? यह सच है कि हमारे देश के संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी के रूप में अपनी बातों और अपने विचारों को खुलकर कहने का एक बेहद सशक्त एवं खूबसूरत अधिकार दिया है।

इसके बावजूद इस अधिकार पर कुछ पाबंदियां भी हैं, जिनमें से एक पाबंदी यह है कि हम अपने इस अधिकार का उपयोग उसी सीमा तक करने के लिए स्वतंत्र है, जहां किसी की मानहानि ना होती हो। किसी की धार्मिक या सामाजिक भावनाओं को ठेस ना पहुंचती हो। आप सरेआम किसी की इज्जत को नंगा करें और इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी का तमगा दे दें, तो यह किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है। ओमप्रकाश मिश्रा द्वारा गाये गाने के बोल इसी तरह से ना केवल इस अधिकार का सरासर उल्लंघन करते हैं, बल्कि एक वर्ग विशेष की भावनाओं और सम्मान को भी तार-तार करते हैं।

दरअसल ओमप्रकाश मिश्रा जैसे लोग वास्तव में साइकोपैथ की श्रेणी में हैं, जो अपनी शेक्शुअल कुंठा मिटाने के लिए इस तरह के गाने गाते हैं या ऐसे वीडियोज़ बनाते हैं। कुछ कर नहीं सकते तो बोलकर और ऐसे भद्दे गाने गाकर ही अपनी मर्दानगी दिखाने की कोशिश करते हैं और जो लोग इन गानों या वीडियोज़ को लाइक या शेयर करते हैं, वे भी इसी कैटेगरी के होते हैं। मर्दानगी दिखानी ही है, तो ईमानदारी से अपने प्यार से किसी लड़की का दिल जीतकर दिखाए ना। ज़बरदस्ती इस तरह के गाने गाकर क्यों लड़कियों की नज़र में गिरना चाहते हैं? ऐसे लेागों को यह समझना चाहिए कि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है, बल्कि दूसरों के सम्मान के साथ किया जाने वाला खिलवाड़ है।

ओमप्रकाश खुद को नए ज़माने का नया रैप सिंगर बताते हुए कहता है कि जिस तरह कुछ समय पहले ढिंचक पूजा ने यूट्यूब् पर अपने वीडियोज़ अपलोड करके पैसे कमाए, उसने भी सिर्फ पैसे कमाने और पॉपुलैरिटी पाने के लिए इस वीडियो को अपलोड किया है। वह सब तो ठीक है, लेकिन इस दलील को देते समय इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ढिंचक पूजा बेसिरपैर के गाने गाकर नेम-फेम और पैसे ज़रूर कमाए, लेकिन उसके गानों से किसी के मान-सम्मान या मर्यादा को ठेस नहीं पहुंचती है।

सोशल मीडिया ने लोगों को आज के समय में एक ऐसा प्लेटफॉर्म दिया है, जहां कई लोग बगैर कुछ सोचे-समझे मात्र कुछ सौ, हज़ार या लाख लाइक्स और व्यूज़ पाने के लिए कुछ भी पोस्ट करते रहते हैं। ऐसा करते समय ओमप्रकाश मिश्रा या ढिंचक पूजा जैसे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि ऐसी लोकप्रियता क्षणभंगुर होती हैं। जिस वक्त हवा का रूख उनके फेवर में होता है, उस वक्त तो उनको लाइक्स या व्यूज़ मिल जाते हैं, पर हवा का रूख बदला नहीं कि उनकी इस सस्ती लोकप्रियता को कोई पूछने वाला भी नहीं होता।

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