सत्ता तो आनी-जानी है, आओ इस देश में मुहब्बत बचा लें

वह सड़क पर पेशाब करते दो नौजवानों को रोक रहा था और इसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। पर वह सच्चे मायनों में एक ‘शहीद’ था। जब स्वामी विवेकानंद के शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मलेन के संबोधन को याद करते हुए प्रधानमन्त्री जब युवाओं से कहते हैं कि वन्देमातरम गाने से ज़्यादा ज़रूरी है देश और मातृभूमि की स्वच्छता, तो मुझे वह ‘शहीद’ याद आ जाता है।

एक लम्बे वक़्त से हमारा देश मूल मुद्दों के तह तक जाकर उनकी तार्किक, अर्थपूर्ण, तथ्यात्मक और लोकतान्त्रिक विवेचना करने के बजाय हिंसक, विध्वंसक और विनाशकारी तरीकों का इस्तेमाल करने में लगा है। ज़रा सोचिये कि जिस देश की आज़ादी के मूल्यों में अहिंसा सबसे ऊपर हो, वह आज जल रहा है। केवल भौतिक रूप में ही नहीं बल्कि दिल, दिमाग और विचारों में भी। जला रहा है औरत के वजूद को, दलित, पीड़ित, गरीब, बच्चों और उन सबको जिनके लिए आवाज़ उठाना आज एक ज़रुरत बन गया है।

मैं इस देश के लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य, अधिकारों, न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और उनके संवर्धन के लिए ज़मीनी तौर पर क्या करती हूं, यह मेरी देशभक्ति का प्रमाण होना चाहिए, ना कि मेरी खान-पान की आदतें, मेरा पहनावा या मेरा मुखर होकर गलत को गलत बोलना। ये मूल मुद्दे और उनके समाधान ही देश, देशभक्ति और देशप्रेम के वास्तविक निर्णायक होने चाहिए।

देश बनता है हम सब से –नागरिकों से, ना कि सिर्फ किसी एक विचारधारा से। भारत तो ऐसी तमाम विचारधाराओं का संगम है। हम कहते हैं ना बड़े प्यार से और गर्व से कि हम गंगा-जमुनी तहज़ीब वाले देश में रहते हैं। पर क्या हम सच में संगम के पावन जल का अर्थ समझ पाए हैं?

क्यूं आज हम इतने भयभीत, कायर और बेशर्म  हो गए हैं कि हम एक मृत व्यक्ति (वह जो संविधान या कानून के तहत कोई अपराधी भी नहीं हो) के खिलाफ सोशल मीडिया जैसे पब्लिक स्पेस में सरेआम जश्न मनाते हैं या अपशब्दों का प्रयोग करते हैं। सिर्फ इसीलिए क्यूंकि हम उसकी बात से असहमत हैं!

क्यूं हम एक इतिहास के किस्से पर आधारित फिल्म के चरित्र की ‘इज्ज़त’ और धर्म की दुहाईयों पर किसी को यूं पीटकर और डरा-धमका कर गर्वोन्मत्त हो उठते हैं? क्यूं आज डर अपनी जडें इतनी गहरी बना चुका है?

पूर्व आरबीआई गवर्नर डॉ. रघुराम राजन हों या पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और तमाम सारे जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक बिगुल बजाने वाले नागरिक या कारवां-ए-मोहब्बत, जो इस विषाक्त माहौल में प्यार और साथ की मिसाल देते हैं। सबने कहा – ‘क्या विविधता के बिना एक विकसित और भविष्य की और बढ़ता देश जिसमें हर एक व्यक्ति प्रसन्न और संतुष्ट हो, बन सकता है?’

सत्ताएं तो आनी-जानी हैं, आप और मैं यहां अंत तक रहने वाले हैं। हमारी आने वाली पीढियां और हमारे बुज़ुर्ग और हमारे बच्चे। सोचिये!

स्वामी विवेकानंद तो सवा सौ साल पहले बोल गए, लेकिन मैं और आप भारत के इतिहास, संस्कृति को अगर इज्ज़त देते हैं तो क्या यूं घटिया, असभ्य और जाहिल ज़रियों से उसी भव्य गरिमा, उदारता और नैतिकता पर कालिख नहीं पोत रहे?

सवाल यह नही है कि सामने वाला हमें खुश करने वाली ही बातें रख रहा है, बल्कि यह कि क्या हम अपने विरोधियों को भी राष्ट्र-निर्माण व विकास की यात्रा में एक भागीदार मान सकते हैं?  क्या हम उन मंथनों से अपने देशप्रेम के वास्ते ही सही, देश के लिए कुछ ‘अमृत’ निचोड़ सकते हैं?

क्या हम अपनी वसीयतों में नफरतों की पूंजी और विचारों की हिंसा छोड़कर जाएंगे?

वह जो हम इंसानों के साथ-साथ प्रकृति, अन्य जीवों और हर उस चीज़ के साथ कर रहे हैं जिसने हमारी तथाकथित ताकत के तख्त को हिलाने की कोशिश की? क्या हम मूर्खता की बजाय तथ्यों, प्रमाणों पर आधारित वस्तुपरक व्यवहार का प्रदर्शन कर पाएंगे?

आज ध्रुवीकरण के नतीजतन सुशिक्षित लोगों ने भी विषय को विषाक्त बना दिया है। चर्चा कहीं सतह पर व्यक्ति केन्द्रित है या फिर राष्ट्रवाद की मनगढ़ंत और विचित्र राजनीतिकृत परिभाषाओं पर? पर क्या हम इस अवसर पर खुद को एक राष्ट्र के तौर पर ही सही मौका नही देना चाहते? वही राष्ट्र जिसके राष्ट्रवाद की निशानी हमें ‘जन गण मन’ पर खड़े होने का मूल्य तो देती है, पर किसी कारणवश ऐसा नही करने पर हिंसा करने को उकसा जाती है। वही राष्ट्रवाद जो काले कपड़ों में क़ानून के पैरवीकारों को भारत माता की जय के साथ अपशब्दों और वीभत्स व्यवहार करने को प्रेरित करता है या वह जो सच को आइना दिखाने पर बौखला जाता है।

दरअसल हम सब भारतीय कहीं न कहीं आईने से घबराते हैं और इस कारण अपना देश, अपनी सरज़मीं के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात और प्रहार करते हैं। मुश्किलों के वक़्त में ही तो गढ़ा जाता है इतिहास, पर वर्तमान के लिए तो हम सब आज या तो डरते हैं या अपना हित साधने में ही भलाई खोजते हैं।

क्या विरोध के स्वर दबा दिए जाने चाहिए? क्या सहनशीलता और लोकतंत्र के सन्दर्भ, अब हमें दूसरों से प्रमाण पत्र के रूप में सौंपे जाएंगे? क्या जो किसी भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में शामिल नही होता तो वह देशहित का विरोधी है? क्या सवालों के जवाब हिंसा के रूप में ही मिलेंगे और रोज़ नई परिभाषाएं समाज की अनवरत प्रगति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय कई साल पीछे छोड़ देंगी?

हां, निःसंदेह गलत या सही पूर्ण रूप से कुछ भी नही होता। क्या मुझे जो गलत लगता है, मैं उसे ना सुनू तो वह पक्ष ख़त्म हो जाएगा? क्या वह सच को पूरी तरह जानने, समझने और विश्लेषित करने की दिशा में मेरा खुद पर लगाया हुआ पूर्ण विराम नहीं होगा?

और यह नहीं भूलियेगा कि इन प्रश्नों के उत्तर भी कई पक्षों और सतहों पर होंगे और वास्तविकताएं तब भी दूर होंगी। अगर वो निरंतर चर्चा ,परिचर्चा और चिंतन के साथ तथ्यात्मक और वैज्ञानिक नही होंगी। संस्कृति, मूल्य और भावनाएं देती है पर आपका मानव होना आपको एक बेशकीमती तोहफा, यानि कि आपका मस्तिष्क देता है। चीखिये या दबा दीजिये गला। मार दीजिये गोली पर हम और आप ऐसा करके खुद की तरक्की के रास्ते के रोड़े बन रहे हैं, पर क्या हम नफरतों से सच को दबा सकते हैं? क्या सच का गला घोंटना और उसकी आत्मा को मारना दोनों एक ही बात है?

हरेक वो व्यक्ति जो हमसे ‘अलग’ है ,मार डालिए हर एक को और देखिएगा कि आस-पास अब सिर्फ बियाबान है दूर तक। काश हमारे स्कूलों ,कॉलेजों और शिक्षा की संस्थाओं में यह फ़र्क करना हम सीख पाते… काश!

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