जा रे हिंदी तुम अपनी संतानों को ऑक्सीजन खरीदने की ताकत भी ना दे पाई

अगस्त में हमने ‘मौत’ के बारे में लिखा और सितम्बर में हम ‘हिंदी’ के बारे में लिखेंगे। चूकि अगस्त मौत का महीना है और सितम्बर मौत के कारण जानने का! खैर पहेली को छोड़िए और इस प्रश्न पर विचार कीजिए कि हिंदी के बारे में लिखने का हक़ किसको है? मतलब हिंदी की प्रगति आख्या किसको तैयार करना चाहिए! हिंदी के नाम पर पुरस्कारों की चाटुकारिता करने वाले लोगों को या इस भाषा को पढ़-लिखकर हाशिये पर जी रहे उस समाज को जिसके बच्चे अगस्त में ऑक्सीजन की कमी से मर गए!

एक ऐसी भाषा पर लिखना जो अपनी भाषा मे शिक्षित समाज को ऑक्सीजन खरीदने तक कि ताकत नहीं देती बहुत ही दुरूह कार्य है। हो सकता है बहुत हद तक आप मेरे इस विचार से सहमत ना हों! बिल्कुल आपको होना भी नहीं चाहिए और खुद मैं भी नहीं हूं। लेकिन एक सीमा तक इसमें सच्चाई भी है, क्योंकि मरने वाले अधिकतर हिंदी की संतान थे!

कुछ समय पहले एक सरकारी स्कूल से गुज़रना हुआ जहां बच्चों का हुजूम हाथों में थाली लिए पंक्तिबद्ध खड़ा था। अनुशासन का अद्भुत मनमोहक नज़ारा था। पेट और अशिक्षा की भूख दोनों आंखों में आशा लिए खड़ी थी! हिंदी का बचपन ऐसी लड़ाइयां रोज़ ही लड़ता है!

और तब मेरा भारत महान क्या करता है? वह तब शिक्षा दर के आंकड़ों की बाजार में नुमाइश करता है और कुपोषण से एक गुरिल्ला लड़ाई लड़ता पाया जाता है। ऐसा भी वह बड़ी मुश्किल से  कर पाता है।

अब ज़रा इनके भविष्य पर विचार कीजिए। लोहिया नहीं हैं और हिंदी अब भी बची है! लेकिन उसका स्वरूप क्या है? मनन कीजिए और तब आप पाते हैं कि हिंदी मज़दूरों की भाषा है! ऐसे मज़दूर जो बाज़ार की भाषा जानने वालों का नौकर बनेंगे! जो कोट पहनेंगे टाई पहनेंगे और शर्म से हीनताबोध के शिकार होकर अन्य लोगों की चौकीदारी, वेटर, रसोइया, बाबू या सिपाही बनकर सेवा करेंगे!

यही सच है और ऐसा इसलिए है कि हमने हिंदी में कुछ कविता-कहानी लिखने के सिवा हासिल ही क्या किया है? कितने अच्छे अनुवाद किए हैं!  क्या आज हिंदी विज्ञान की भाषा बन पाई है? कब तक संता-बंता के चुटकुलों और ट्रोल के भरोसे यह भाषा रहेगी! अफसोस होता है कि सर्वाधिक बिकने का दावा करने वाले अखबार भी औसतन 5 से 10 अशुद्धियां कर ही देते हैं!

खैर इस भाषा में बड़ा लिखने का भी कोई फायदा नही आखिरकार पढ़ेगा कौन! और फिर पढ़ भी लिया तो हासिल क्या होगा? बस चिंता इस बात की है कि ‘हिंदी वाला ही गाय भी चराता है और गाय हिंदी वालों को चराती है!

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