इस टीचर्स डे पर ज़रूर पढ़ें हज़रत निज़ामुद्दीन और अमीर खुसरो की कहानी

Posted by preeti parivartan in Education, Hindi, History
September 5, 2017

गुरू-शिष्य की तो बहुत सारी कहानियां हैं। एक कहानी सूफी संत निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की है। औलिया-खुसरो को पीर-मुरीद के तौर पर भी जाना जाता है।

“गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस, चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस।”

इसका अर्थ है- मेरे प्रिय, बिस्तर पर लेटे हुए हैं। इन्होंने संसार से पर्दा कर लिया है। इनके जाने के साथ ही इस संसार से रौशनी चली गई, अब यहां सिर्फ अंधकार ही अंधकार है। चल खुसरो अपने असली घर, अब चारों ओर अंधेरा हो गया, रात हो गई।

अपने गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के साथ अमीर खुसरो; फोटो आभार: http://www.inquiriesjournal.com

यह अमीर खुसरो की आखिरी पदावली है, अपने पीर निज़ामुद्दीन औलिया का पार्थिव शरीर जब खुसरो ने देखा तो उनके मुंह से बस यही निकला था। इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं लिखा, वे शोकाकुल रहने लगे और फिर कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। कहीं-कहीं यह भी लिखा गया है कि इतना बोलकर खुसरो गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गई। (इसकी विस्तृत व्याख्या मध्यकालीन इतिहास 13वीं से 14वीं शताब्दी के बीच मिल जाती है।)

सूफी मत में पीर-मुरीद या पीरी-फकीरी (मतलब गुरू- शिष्य) परंपरा का बड़ा महत्व रहा है। हिन्दुस्तान में यह और फला-फूला क्योंकि हमारे यहां धार्मिक ग्रंथों में गुरू-शिष्य परंपरा का वर्णन पहले से ही था। अमीर खुसरो, निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य थे और औलिया सूफी संत बाबा फ़रीद के। लेकिन जो प्रसिद्धि औलिया-खुसरो को मिली वो और किसी को नहीं मिली। खुसरो और औलिया का ऐसा तालमेल था कि दोनों बिना बोले एक-दूसरे की दिल की बात समझ लेते थे।

दोनों की समाधि भी साथ ही है। दिल्ली में हजरत निज़ामुद्दीन की समाधि के पास ही अमीर खुसरो की समाधि मौजूद है। हर साल यहां उर्स (दक्षिण एशिया में उर्स आमतौर पर किसी सूफी संत की पुण्यतिथि पर उसकी दरगाह पर वार्षिक रूप से आयोजित किये जाने वाले उत्सव को कहते हैं) मनाया जाता है। हर उर्स का आरंभ खुसरो के इसी अंतिम दोहे से किया जाता है– गोरी सोवे सेज पर। कुछ लोग कहते हैं खुसरो- औलिया का संबंध अलौकिक था। यह मध्यकालीन भारत की कहानी थी।

आधुनिक भारत में गुरूओं के सम्मान में भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
लेकिन बदलते वक्त के साथ-साथ अब सब बदल गया है। पढ़ाना एक व्यवसाय और पढ़ना एक बोझ जैसा हो गया है। अब पढ़ने वाले कम पढ़ाने वाले ज़्यादा हैं, सीखने वाले कम और सिखाने वाले ज़्यादा हैं, सुनने वाले कम और सुनाने वाले ज़्यादा हैं। कहीं कोई आत्मीयता नहीं है, सब धंधा या व्यवसाय का एक हिस्सा हो गया है।

गुरू वो नहीं हो सकता है जो एक घंटे बैठकर ज्योमेट्री और ट्रिग्नोमेट्री रटवाता हो, जो परीक्षा में पास करवाने की गारंटी लेता हो। गुरू वो भी नहीं जो घड़ी देखकर आए, होम वर्क चेक करे, होम वर्क दे और फिर चला जाए, ये तो व्यवसाय है। सीखने-सिखाने के लिए ना तो कोई तय वक्त हो सकता है और ना ही कोई तय स्थान। जिस वक्त हमें यह लगने लगता है कि हम किसी से कुछ सीख रहे हैं, उसी वक्त उस संबंध में आत्मीयता आने लगती है। लेकिन अब सीखने वालों की भारी कमी है और सिखाने वाले अब प्रोफेशनल कहलाते हैं।

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