21 साल लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने वाली आंग सान रोहिंग्या मुस्लिम पर खामोश क्यों है

रोहिंग्या, एक ऐसा समुदाय जो वर्तमान में हिंसा का शिकार हो रहा है। बौद्ध बहुल देश म्यांमार में अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय पर पिछले दो महीनों से अत्याचार हो रहा है और उन्हें म्यांमार के रखाइन प्रान्त से खदेड़ा जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल इनके अस्तित्व का है, क्योंकि म्यांमार सरकार का मानना है कि ये बांग्लादेश से आए अवैध शरणार्थी हैं। वहीं कुछ इतिहासकारों और इस समुदाय का मानना है कि वे इस रखाइन प्रान्त में 12वीं सदी से रह रहे हैं। अगस्त में शुरू हुई हिंसा के बाद से अब तक करीब 4 लाख रोहिंग्या बांग्लादेश पहुंच चुके हैं और लगभग 50 हज़ार लोगों ने भारत में शरण ली है।
वैश्विक समुदाय ने इस पर चिंता व्यक्त की है, लेकिन इनके आवास और पुनर्वास की अब तक कोई स्थाई व्यवस्था नहीं हो सकी है। इंडोनेशिया ने अस्थाई आवास की व्यवस्था करने की बात कही थी। वहीं, बांग्लादेश ने भी एक सुदूर द्वीप पर इनके अस्थाई निवास की व्यवस्था की बात कही है, जिस पर आलोचकों का मानना है कि ये क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है। लेकिन सभी देशों को यह चिंता है की गरीबी के कारण ये किसी आतंकी संगठनों से ना जुड़ जाएं, जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो। सभी देशों को अपनी सुरक्षा का खतरा लग रहा है और उन पर आतंकवादी संगठनों में शामिल हो जाने की आशंका जताई जा रही है। लेकिन उनकी सुरक्षा का क्या? उनको पता नहीं कि वे कहां जाएं, कहां रहें, किससे मदद मांगें? कोई शरण देने को तैयार नहीं।
 इस मामले में म्यांमार की लोकतांत्रिक नेता और नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची द्वारा कोई निर्णय ना लिए जाने की आलोचना हो रही है। उनसे सबसे ज़्यादा उम्मीद इसलिए भी है कि उन्होंने म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के लिए बड़ी लड़ाई लड़ी और 21 सालों तक नज़रबंद रहीं, लेकिन अब ऐसा क्या हो गया कि वे इतने बड़े समुदाय के साथ हो रही हिंसा पर कुछ नहीं कर रही हैं?
यह मुद्दा शरण देने या पुनर्वास से अधिक मानवीयता का है कि एक समुदाय के लोगों की हत्या और बलात्कार किया जा रहा है, उनको अपने रहने के ठिकाने से बेदखल किया जा रहा है और इस पर कोई तैयार नहीं कि उनकी मदद की जाए।  क्या यह अजीब बात नहीं है कि एक समुदाय के लोगों को उनके घर से खदेड़ा जा रहा है (भले ही ये उनका दावा हो) और सभी मूकदर्शक बने हैं। क्या कोई मानवीय संवेदना इनकी मदद करने को नहीं कहती। तो इसका मतलब कल किसी और समुदाय के साथ भी ऐसा होगा तो हम कुछ नहीं कहेंगे और सिर्फ अपनी सुरक्षा की दुहाई देते हुए उन पर अत्याचार होने देंगे।
स्थाई नहीं तो कम-से-कम उनके रहने की अस्थाई व्यवस्था तो की ही जानी चाहिए, क्योंकि इस समस्या का स्थाई समाधान तो यही है कि इस समुदाय को उनके असली घर, जहां के वे हैं या जहां से आए हैं, पहुंचाया जाए और उनको एक नागरिक होने का सम्मान दिया जाए। मानवीय पक्ष तो यही कहता है।
फोटो आभार: getty images 

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