BHU में जब मैं पढ़ती थी तब से अब तक हालात कुछ बदले नहीं हैं

यह उन दिनों की बात है जब मैं BHU में पढ़ती थी, कॉलेज में पढ़ते थे लेकिन अफसोस है थोड़ा उपर-नीचे होगा लेकिन आज भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं।

“मधुर मनोहर अतीव सुंदर, यह सर्वविद्या की राजधानी। बिके हरिश्चन्द्र थे यहीं पर, यह सत्यशिक्षा की राजधानी। सुरम्य धारायें वरुणा अस्सी। नहायें जिनमें कबीर तुलसी। प्रतीचि-प्राची का मेल सुंदर, यह विश्वविद्या की राजधानी।” यह BHU के कुल गीत का कुछ अंश है। कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम या शैक्षणिक कार्यक्रम इसी गीत से शुरू होता है।

कैंपस भी खूब सुंदर है। बाहर से लोग कैंपस घूमने आते हैं। एकदम हरियाली है। जगह-जगह पानी पीने के लिए नल लगा हुआ है। कहीं से भी जा रहे हैं जाइए और पानी- पीजिए। बड़ा भव्य सा सेंट्रल लाइब्रेरी है। प्यार करने के लिए मधुवन है तो पूजा के लिए परिसर में भी एक विश्वनाथ टेंपल है जिसे देखने बाहर से भी लोग आते हैं।

हमेशा से कहा जाता है कि BHU बहुत सारे विद्वान- विदुषियों का गढ़ है। हमारे यहां तो पहले लोग पढ़ने के लिए काशी- बनारस ही जाते थे। ये एक पहलू है जो बाहर- बाहर से दिखता है और आकर्षित करता है लेकिन भीतर-भीतर से कैसा है यह रहकर पता चलता है।

यहां पहरा(चौकीदारी) है, पहरा है लड़कियों पर, पहरा है उनके कपड़ों पर, पहरा है प्यार पर, पहरा है मर्ज़ी पर।

यहां हौआ है। लड़का- लड़की का साथ होना, हौआ है, लड़कियों का मर्जी से अपने हिसाब का कपड़ा पहन लेना हौआ है, देर रात हौआ है। देर रात हॉस्टल से बाहर का मतलब ही लड़का- लड़की!

यहां अत्यंत मुश्किल काम है इवनिंग क्लास ज्वाइन करना यहां बड़ा मुश्किल है। शाम होते- होते घड़ी देखना शुरू। यहां अत्यंत मुश्किल काम है, बिड़ला, ब्रोचा, रुइया, डालमिया बॉयज़ हॉस्टल के रास्ते लड़कियों का हेल्थ सेंटर या विश्वनाथ टेंपल जाना। यहां प्रतिबंधित है, विरोध करना। यहां प्रतिबंधित है आवाज़ उठाना। यहां प्रतिबंधित है सात बजे के बाद बाहर रह जाना।

यहां सामान्य बात है, कैंपस के अंदर घटिया कमेंट देना, छेड़छाड़ करना। यहां सामान्य बात है, वॉर्डन और प्रॉक्टर द्वारा लीपापोती करना। यहां सामान्य बात है, लड़की के साथ कुछ भी हो तो उसे ही लेक्चर दे देना। इसलिए जब ये पता चलता है कि किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ हुआ, वॉर्डन-प्रॉक्टर ने उल्टे लड़की को चरित्रवान होने का ‘ज्ञान’ दिया है तो सही- गलत पड़ताल करने की ज़रूरत नहीं लगती मुझे।

अभी जो हुआ है (जितनी जानकारी है) उसमें शाम के वक्त फाइन आर्ट की स्टूडेंट हॉस्टल लौट रही थी और रास्ते में रौशनी के कोई इंतज़ामात नहीं थे। (इसलिए लिखा था उपर इवनिंग क्लास मुश्किल है।) अब तीन से चार लोगों ने घेरकर सेक्शुअल असॉल्ट किया। अपनी बेहन- बेटी से पूछिएगा बिना मर्ज़ी कोई टच करता है तो कैसा लगता है! ख़ैर, BHU जेएनयू की तरह शुद्ध रूप से स्टूडेंट कैंपस नहीं है। आम लोगों का भी रास्ता है। ऑटो, साइकिल, भीड़ लगी रहती है।

कैंपस में ही सर सुंदर लाल सरकारी अस्पताल है जहां पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के आरा, छपरा, बक्सर के लोगों की भारी भीड़ होती है। गरीब जाएगा कहां! इसलिए लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की घटना या किसी भी तरह के शोषण में अंदर- बाहर दोनों तरफ के लोग होते हैं। कभी अंदर के तो कभी बाहर के।

एक सीनियर स्टूडेंट ने बताया कि अंदर वाले घटिया कमेंट करके रह जाते हैं लेकिन बाहर वाले छूना, घटिया गाली देना इत्यादि। इन सब के बाद प्रशासनिक और शैक्षणिक पदों के शीर्ष पर बैठी महिलाएं कभी ‘बेट्टा’ बोलकर तो कभी डराकर कहती हैं पढ़ाई पर ध्यान दो। ‘बेट्टा’ तुम लोग ठीक कपड़े पहना करो, मां- बाप ने इतनी दूर किसलिए भेजा।

दुनिया का सबसे खतरनाक शोषण वो होता है जो ‘इज़्जत’ की दुहाई देकर, ‘पुचकार’ कर किया जाए। क्योंकि इसे समझने में ही वक्त लग जाता है! शोषित इंसान समय रहते समझ ही नहीं पाता कि किस रूप में उसका शोषण हुआ। तसल्ली इसी बात की है कि धीरे-धीरे ही सही अब ना तो उस ‘बेट्टा’ रूपी ‘पुचकार’ से और ना ही धमकाकर दबाया जा सकता है।

और हां, रेप या छेड़छाड़ लिखकर अपनी बात कह देना आसान है लेकिन घटना के दौरान क्या हुआ,उसे कैसे अंजाम दिया गया, अपने आपको ‘भेड़ियों’ से घिरा पाकर उस वक्त की मनोदशा कैसी थी, इसके बाद जीवन भर मनोविज्ञान पर क्या असर पड़ेगा। और ये सब कहां तो कैंपस में! अगर अपने आपको BHU के इस प्रोटेस्ट से नहीं जोड़ पा रहे तो इन सब बातों पर गौर करिएगा।और जैसे चाहे वैसे अपना समर्थन दीजिए।

उपाय एक ही है ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ उठाना।

फोटो आभार- BHU Buzz

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