इन 8 मुद्दों से आपको पड़ा फर्क तो आपको पता है अपनी आवाज़ की ताकत

Posted by Anugraha Hadke in Hindi
September 11, 2017

हमारे आसपास हमारे देश की, हमारी दुनिया की कई ऐसी बातें होती हैं जो हमें परेशान करती हैं, कई ऐसी बातें होती हैं, जिनपर हम अपनी बात रखना चाहते हैं, हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे नज़रिये से भी कोई मुद्दा देखे।

Youth Ki Awaaz(YKA) में हम जानते हैं आपके ओपिनियन का महत्व और करते हैं उसकी कद्र। तो अब जब कभी भी, किसी भी बारे में लिखना हो और अपनी बात पूरी दुनिया तक पहुंचानी हो तो इंतज़ार ना करें बल्कि YKA पर लिखें।

एक नज़र उन मुद्दों पर जिनसे लोगों को अगस्त में पड़ा फर्क और उनके बारे में लिखकर आपके बीच से ही कुछ राइटर्स बन गए हमारे टॉप यूज़र्स

1. महिलाओं का संपत्ति पर अधिकार

बेटी तो ‘पराया धन’ होती है, उसका असली घर तो पति का घर ही होता है। इस तरह की बातें एक अरसे से हम लोग फिल्मों से लेकर अपने मोहल्ले और घर तक में ये सब बातें सुनते आए हैं। आखिर शादी के बाद पति तो उसका खयाल रखेगा ही और भाई भी तो है! इन्हीं सब बातों को परम्परा का नाम देकर महिलाओं के पारिवारिक संपत्ति के अधिकार को नकार दिया जाता है। आखिर उसे घर की ज़रूरत ही क्यूं है, पति का घर है ना! पढ़िए पैतृक संपत्ति को लेकर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर रोकी कुमार का यह बेहतरीन आर्टिकल।

बेटी को पराया धन वाला ज्ञान नहीं अपनी संपत्ति का हिस्सा दीजिए

बचपन से ही मेरी बहन को सिखाया गया कि वो पराया धन है और जो भी कुछ है वो उसके भाइयों का है। धीरे-धीरे मेरी बहन को भी ये लगने लगा कि सच में वो पराई है और शादी के बाद पति का घर ही उसका अपना घर होगा।


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2. बलात्कारी बाबा के प्रति अंधभक्ति

बलात्कार के दो मामलों में बाबा राम रहीम को दोषी करार दी जाने के बाद हुई हिंसा और आगजनी, तमाम बाबाओं के प्रति हमारी अंधभक्ति के खतरों की और साफ इशारा करती हैं। इस दौरान 30 से भी ज़्यादा लोगों की जानें गई, माडिया वैन को जला दिया गया ताकि ख़बरें लोगों तक ना पहुंच पाएं और उत्तर भारत के कई राज्य हाई अलर्ट पर थे। ये सब घटनाएं हमारे उस समाज की तस्वीर सामने लाती हैं जो धर्म के नाम पर अपराधी बाबाओं की अंधभक्ति में डूब जाता है। क्या हमारी श्रद्धा इतनी कमज़ोर है?

सोभा रना ग्रोवर का ये सशक्त लेख इसी मुद्दे पर बात करता है।

जब बलात्कार के आरोपी बाबा के पीछे लोग बौराने लगे तो समझिये सब ठीक नहीं है

दो राज्यों में हाईअलर्ट… भारी-भरकम सुरक्षा के इंतजाम… ज़िला प्रशासन की निगरानी तेज़…इंटरनेट सेवाएं बंद… स्कूल-कॉलेज बंद… ट्रेनें रद्द! लेकिन ये सब किसलिए? क्या कोई पड़ोसी देश हमले की तैयारी में है? या फिर खुफिया विभाग को किसी आतंकी हमले की संभावना है?

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3. कैसा होता है एक अकेली भारतीय महिला के लिए ट्रेवल करना

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चर्चाओं का कोई अंत नहीं है, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को देखते हुए यह ज़रूरी भी है। एक लड़की होने की वजह से मैंने देखा है कि कैसे मेरे माता-पिता घर से बाहर जाने की बात सुनते ही परेशान हो जाते हैं। मैं कैसे सफ़र कर रहीं हूं, किसके साथ जा रही हूं, कब वापस लौटूंगी, इन सभी चीजों को लेकर वो हमेशा चिंतित रहते हैं। अब ज़रा उस लड़की के बारे में सोचिये जिसने अकेले सुनसान हिमालय या भीड़भाड़ वाले गोवा तक का सफ़र अकेले तय किया हो।

स्नेहल वानखेड़े उनके अकेले सफ़र करने के इन्ही अनुभवों को इस आर्टिकल के ज़रिये साझा कर रही हैं।

थैंक्स पापा, आप स्कूटर चलाना ना सिखाते तो आज अकेले इंडिया ना घूम पाती

ट्रेन में एक बच्ची के पापा को उसको अपर बर्थ पर चढ़ाने की प्रैक्टिस करवाते हुए देख अपने पुराने दिन याद आ गए। जब सारी लड़कियां स्कूटी चलाना सीख रही थी, पता नहीं कहां से मुझे बजाज स्कूटर चलाने का शौक चढ़ा।

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4. भारत में क्या हैं प्रिविलेज के मायने

हमारे देश में एक हिन्दू, ऊंची जाति से आने वाला, धनी, शरीर से सक्षम, हेट्रोसेक्शुअल पुरुष होने का अर्थ है कि आपको मिलने वाली सुविधाओं और प्रिविलेज का कोई मेल नहीं है। कास्ट, जेंडर या सेक्शुअलिटी को लेकर शायद ही आपको किसी भेदभाव का सामना करना पड़े। ‘द सवर्णा फाइल्स’ इन्ही सहूलियतों और प्रिविलेज की बात करती है और साथ ही इन सहूलियतों के साथ आने वाली ज़िम्मेदारियों पर भी ध्यान खींचती है। ये उन बातों की और ध्यान ले जाती है जिन्हें हम बेहद मामूली समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

Buzzfeed’s Quiz On Privilege And What It Actually Means

You might have taken this quiz recently through the Buzzfeed website which asks the question ” How privileged are you? “. It is essentially a checklist of 127 points. You get to know how privileged you are in society based on the number of points you check.

सवर्णा फाइल्स को YKA पर फॉलो करें।

5. असम में बाढ़ से हुआ नुकसान जिसे शायद रोका जा सकता था

एक लम्बे अर्से से हर साल हम असम को बाढ़ से जूझते हुए देखते आए हैं। हर साल बाढ़ की वजह से जान-माल का भारी नुकसान होता है, कई परिवारों के घर उजड़ जाते हैं। लेकिन फिर भी ना तो ये मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए बड़ा मुद्दा बनता है और ना ही सरकारें इस तरफ कोई ध्यान ही देती हैं।

बाढ़ से हुए नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता था, अगर बड़े शहरों के अनियमित विकास की तरफ थोड़ा ध्यान दिया जाता। अगस्त के पूरे महीने के दौरान, कुमार दीपक ने असम में बाढ़ को कवर किया और बाढ़ की त्रासदी को सामने लेकर आए।

Flash Floods In Guwahati Are A Warning Sign That The City Is Heading Towards Doom

The government and civilians of Guwahati have blood on their hands for the brutal and shameless killing of river Bharalu due to corrupt, blind and aberrant development in the city. The expanding population and mass immigration in Guwahati stems from depleting livelihoods and a lack of employment opportunities in Assam and the rest of the northeast Indian states.

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6.  कैसा होता है एक विकलांग का भारत में यात्रा करना

कहीं ट्रेवल करने के लिए प्लानिंग करने वाला काफी थकाने वाला हो सकता है। कहां जाना है ये तय करना, जाने का दिन तय करना, ट्रेवल प्लान के लिए ऑफिस से छुट्टी लेना, टिकट बुक करना, पैकिंग करना और समय पर बस/ट्रेन/प्लेन पकड़ना वगैरह। हममें से कई लोग होटल्स की बुकिंग पर भी अपना समय लगाते हैं। क्या वहां होटल के खर्च में नाश्ता भी साथ में मिलेगा? क्या वहां पर गर्म पानी की सुविधा मौजूद है? या क्या होटल में लिफ्ट मौजूद है?

लेकिन सोचिये कि तब क्या होगा जब आपको ये पता चले कि आप होटल के अन्दर नहीं जा सकते क्यूंकि वहां कोई रैंप नहीं है और आप व्हीलचेयर पर हैं?

आभा खेत्रपाल ने इसी को लेकर एक RTI फाइल की और ये बात सामने लेकर आई कि कैसे हमारे देश के कई होटल ‘डिसेबल्ड फ्रेंडली’ होने का दावा करते हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर वहां रैंप तक मौजूद नहीं हैं।

Despite Govt. Guidelines, This Is How Hotels Make Provisions For People With Disability

In 2009, the Ministry of Tourism issued guidelines for 3-star, 4-star and 5-star hotels, stating that all hotels must have specific facilities for persons with disabilities. The hotels had to comply with these guidelines for classification and reclassification, and for getting star certification. They had to make the hotels disabled friendly by 2010.

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7. वो कड़वी हकीकतें जिनका सामना भारत की सड़कों पर रहने वाले बच्चों को करना पड़ता है

20 लाख से भी ज़्यादा बच्चे, भारत की सड़कों पर रहने को मजबूर हैं। शिक्षा, साफ पानी, शौचालय और पूषण जैसी मुलभुत सुविधाओं से ये बच्चे पूरी तरह से महरूम हैं। इन सभी कारणों का सबसे बुरा असर इन बच्चों में बढ़ते नशे की लत के रूप में सामने आ रहा है। भूख और ठण्ड से बचने के लिए ये बच्चे ग्लू, शू पॉलिश या व्हाइटनर सूंघने के लिए मजबूर हैं। जल्द ही ये नशे के जाल में इस कदर फंस जाते हैं कि जो भी कमाते हैं नशे के लिए खर्च कर देते हैं। सियालदाह रेलवे स्टेशन के बाहर सड़कों पर रहने वाले बच्चों की इन्ही स्थितियों पर नज़र डालता है जोएता ताल्लुकदार का यह आर्टिकल।

Drugs And Prostitution Are Ruining Lives Of Kids Outside This Kolkata Railway Station

Editor’s Note: With #TheInvisibles, Youth Ki Awaaz and Save the Children India have joined hands to advocate for the rights of children in street situations in India. Share your stories of what you learned while interacting with street children, what authorities can do to ensure their rights are met, and how we can together fight child labour.

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8. पितृसत्ता और धर्म को चुनौती देता सिनेमा

खुले में शौच करने की समस्या को एक लव स्टोरी के ज़रिए दिखाने वाली फिल्म टॉयलेट: एक प्रेम कथा को लोगों के काफी सराहा। सामाजिक मुद्दों को उठाने वाले ज़िम्मेदार सिनेमा जैसे पिंक और लिपस्टिक अंडर माय बुरका की तर्ज़ पर बनी यह फिल्म पितृसत्ता से जुड़ी उन कई बातों को सामने लेकर आती है जिनके चलते महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। नमन सिंह इस आर्टिकल के ज़रिये बता रहे हैं कि कैसे यह फिल्म एक ख़ास तरीके से विद्रोह को परिभाषित करती है, वो बताते हैं कि कैसे फिल्म स्वच्छ भारत अभियान का समर्थन करती है और धर्म को शोषण का ज़रिया बनाए जाने का कड़ा विरोध करती है।

Toilet Ek Prem Katha’: A Subtle Rebellion Against Oppressive Patriarchy And Religion

“Maine aisa kya maang liya, ki tum mujhe de nahi sakte? (Did I demand something impossible for you to give me?)” This sole line has all the depth to evoke an exciting thought in me. But, what is exciting here is the need and want for a toilet in the house.

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