कुम्भ और त्रिवेणी से हटकर, इलाहबाद शहर के कुछ कम फेमस जगहें

Posted by Saurabh Agarwal in Culture-Vulture, Hindi
September 28, 2017

इलाहबाद एक ऐसा शहर जो त्रिवेणी संगम, उत्तर प्रदेश का अहम राजनीतिक केंद्र होने के साथ-साथ अपनी छात्र राजनीती के लिए भी जाना जाता है। इन सब चीज़ों को तो आपने देखा, सुना या पढ़ा ही होगा। आइये मैं आपको इलाहबाद के कुछ उन पहलुओं से मिलवाता हूं जिनके बारे में कम ही लिखा या कहा गया है।

इस शहर का दशहरा यूनीक है

त्यौहारी सीज़न है तो सबसे पहले बात करते हैं दशहरे की। इलाहबाद का दशहरा यूनीक है। यहां रावण नहीं जलाए जाते, बल्कि दशहरे पर शहर की हर सड़क रौशनी से कुछ ऐसे जगमगाती है जिसे देखने के लिए मेला लग जाता है। रौशनी से सजे विशाल द्वार हर सड़क के मुहाने पर स्वागत करते हैं। रौशनी का ऐसा अद्भुत प्रयोग कम ही देखने को मिलेगा आपको। दारागंज, चौक, कटरा, सिविल लाइन्स, मुट्ठीगंज हर क्षेत्र की सड़कें खूबसूरत रौशनी में नहाई कलाकृतियों से सजी रहती हैं।

जिस दिन मेला होता है उस दिन तो सड़क पर इतनी भीड़ रहती है कि आप पैदल ही चल सकते हैं। इसलिए नवरात्रि के ही अलग-अलग दिन हर क्षेत्र का मेला होता है और विजय दशमी तक यह क्रम चलता है। लेकिन त्यौहार यहीं खत्म नहीं होता, इसके साथ-साथ राम दल, रावण बारात, काली स्वांग और पजावा, कटरा, पथरचट्टी अलग-अलग रामलीला कमेटियों द्वारा निकाली गई झाकियां और श्रृंगार चौकियां भी देखने के मुख्य आकर्षण केंद्र हैं।

इलाहबाद की डॉल्फिन

त्यौहारों से आगे अब शहर से बाहर की तरफ रुख करें तो एक ऐसी सीक्रेट जगह आपको बताता हूं जहां आपको प्रकृति की गोद में बैठकर गंगा की डॉल्फिन को निहारने का अवसर मिल सकता है। नैनी इंडस्ट्रियल क्षेत्र में यूनाइटेड कॉलेज से आगे निकलते हुए रेमंड फैक्ट्री के पीछे से एक संकरा रास्ता है जो कि चांडी गांव की तरफ जाता है। संगम पर यमुना से मिलने के बाद गंगा यहीं से धीमे-धीमे आगे बहती है। घाट पर पहुंचने का वक्त दोपहर के बाद का रखना चाहिए, क्योंकि सुबह स्नान करने वाले श्रद्धालुओं के कारण डॉल्फिन का पानी के ऊपर दिखना मुश्किल ही है। वैसे इस जगह को अगर टूरिस्ट स्पॉट की तरह विकसित किया जाए तो चिल्का की तर्ज पर इस क्षेत्र का भी विकास किया जा सकता है।

शहर की भूली बिसरी राजनीतिक विरासतें

इलाहाबाद शहर अपनी राजनीतिक गतिविधियों की वजह से भी जाना जाता रहा है। हालांकि अब ना तो प्रधानमंत्री यहां से हैं और ना ही कांग्रेस का गढ़ ही अब बचा है, लेकिन फिर भी यदा-कदा जो भी पुराने राजनीतिक क्रांतिकारी हैं वो आज भी सिविल लाइन्स के पत्थर गिरजाघर के पास कॉफी हाउस में भेंट करते मिल जाएंगे। कॉफी हाउस आज भी पुरानी बम्बइया फिल्मों की याद दिला देता है, जिनमें वेटर वही ट्रेडिशनल सफेद ड्रेस पहने आपकी कॉफी लेकर हाज़िर होता है, ये नज़ारा तो अब भी ज्यों का त्यों ही है।
अब राजनीति की ही बात कर रहे हैं इलाहबाद के संदर्भ में इतिहास के एक कम ही पलटे गए पन्ने का ज़िक्र ज़रूरी है, और वो है फिरोज गांधी। एक कुशल नेता होने के बावजूद भी भारतीय राजनीति में फिरोज गांधी को हमेशा नजरअंदाज़ ही किया गया और उनकी पहचान बस इंदिरा गांधी के पति होने तक ही सीमित कर दी गई। फिरोज की कब्र यहीं बेली रोड से मम्फोर्डगंज की तरफ जाते हुए पारसी कब्रिस्तान में स्थित है।

आम लोगों के आम चौराहे और बाज़ार

अन्ना आंदोलन के समय से ही इलाहाबाद का लोकल जंतर-मंतर मतलब धरना स्थल तो सुभाष चौराहा ही है। चाहे अन्ना आंदोलन रहा हो या सौंदर्यीकरण के नाम पर दुकानें तोड़ने से नाराज व्यापारियों का धरना प्रदर्शन, सुभाष चंद्र बोस चौराहा ही एक हॉट स्पॉट है। सामाजिक मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हो या राजनीतिक धरना, जनता और मीडिया से आसानी से जुड़ पाने के लिए अब सब यहीं दिखते हैं।

सुभाष चौराहे के ही बगल में है इंदिरा भवन, जहां सब तरह के मोबाइल, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान मिल जाएंगे। लेकिन मोबाइल उपकरण खरीदने के लिए सुलाकी चौराहे के पास लक्ष्मण बाज़ार बढ़िया जगह है। इलाहाबाद की ये भी एक खास बात है कि यहां का नेतराम चौराहा, जगराम चौराहा, सुलाकी चौराहा आदि सभी चौराहों के नाम पुरानी मशहूर मिठाई की दुकानों के नाम पर ही पड़ गए हैं। तो फिर आइये कभी इलाहबाद, इस शहर के ये अंजाने पहलू आपका इंतज़ार कर रहे हैं।


फोटो आभार: getty images

सौरभ, Youth Ki Awaaz Hindi सितंबर-अक्टूबर, 2017 ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा हैं।

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