हिंसा सहने के बाद भी सौम्य बने रहना क्या हमें राहुल गांधी से सीखना चाहिए?

राहुल गांधी अपनी राजनीतिक छवि सुधारने के लिये तरह-तरह से प्रयास कर रहे हैं, लोगों के बीच जाकर उनसे एक रिश्ता कायम करने की कोशिश करते हुए भी दिखाई दे रहे हैं। लेकिन जब इनसे 1984 के कत्लेआम में कांग्रेस की भूमिका को लेकर सवाल पूछे जाते हैं तो इनका एक ही जवाब होता है कि इनसे ज़्यादा हिंसा को कौन समझ सकता है। वो कहते हैं कि उन्होंने 14 साल की उम्र में अपनी दादी इंदिरा गांधी और 8 साल बाद पिता राजीव गांधी को खो दिया था।

मैं राहुल की तहेदिल से तारीफ भी करना चाहूंगा कि जहां इन हादसों से एक इंसान निराश और क्रोधित हो सकता है वहीं राहुल, एक शांत और आशा से भरपूर इंसान की अपनी छवि बनाने में कामयाब हो रहे हैं। दशकों तक भारत की राजनीति में अपना लोहा मनवा चुके परिवार से आने वाले राहुल अगर चाहते तो आक्रामक रुख अपनाकर जुझारू नेता की छवि बना सकते थे, लेकिन वो इस तरह के अंदाज़ से दूर ही रहे। राहुल गांधी, शायद गांधी परिवार में ऐसे अकेले सदस्य होंगे जो इंदिरा गांधी को कत्ल करने वाले, उनके अंगरक्षकों को भी जज्बाती रूप से याद करते हैं, वह अक्सर कहते हैं कि वे इन सिख अंगरक्षको के साथ बैडमिंटन और दूसरे इंडोर गेम खेला करते थे।

हिंसा किसी भी रूप में हो उसकी निंदा करना ज़रूरी है, खासकर अगर हम लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं। आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से हमारा रुतबा कुछ भी हो लेकिन एक भारतीय होने के नाते, हम सभी को संविधान के तहत बराबरी का हक है। इसी फलसफे में यकीन रखते हुए मैं सरकारी और गैर सरकारी, हर तरह की हिंसा का विरोध करता हूं।

ये भी सच है कि आज हर भारतीय किसी ना किसी रूप से मानसिक, शारीरिक और सामाजिक हिंसा का शिकार है। एक आम आदमी अक्सर सरकारी व्यवस्था द्वारा किसी ना किसी तरह की हिंसा का शिकार होता रहा है। हम अक्सर फेक एनकाउंटर के बारे में सुनते हैं, सड़क के किनारे लारी लगाकर व्यवसाय करने वाले किसी इंसान से बात करने पर अक्सर ये पता चलता है कि कैसे कानून तोड़कर इनने पैसा लिया जाता है और ना देने की हालत में उसे गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।

एक आम आदमी साथ हुई हिंसा और किसी राजनीतिक परिवार या व्यक्ति के साथ हुई हिंसा जिस पर राहुल गांधी दुःख प्रकट कर रहे हैं, उन दोनों में एक समानता है कि दोनों ही पीड़ित हैं, लेकिन फर्क यह है कि एक सशक्त परिवार से है और दूसरा आम आदमी। राहुल का परिवार जिस पृष्ठभूमि से आता है, वहां व्यवस्था द्वारा की जा रही हिंसा को रोका जा सकता है, वहीं एक आम आदमी पर हिंसा बस थोप दी जाती है।

खासकर अगर हम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगो का उदहारण लें, तो अचानक से भड़की ये हिंसा एक तरह से इन परिवारों पर थोपी गई थी। बेनाम भीड़ अपने ही देश के नागरिकों यानि कि सिख समुदाय से जुड़े लोगों को चुन-चुन कर निशाना बना रही थी। ऐसे कई उदाहरण है जहां कई लोग घर से गए तो थे लेकिन आज तक वापस नहीं लौटे। ये एक विडंबना ही है कि इंदिरा गांधी के कातिलों को तो कुछ ही सालो में फांसी पर लटका दिया गया, वहीं 1984 के सिख नरसंहार के पीड़ितों को आज तीन दशकों के बाद भी न्याय नहीं मिला है और शायद उसकी उम्मीद भी नहीं है।

हिंसा एक ऐसा माध्यम है जो आग की तरह फैलता है और उन लोगों को भी चपेट में ले लेता है जो इसके समर्थक रहे हैं। इसलिये आज ये ज़रूरी है कि राहुल गांधी और हम सभी, इंदिरा गांधी की हत्या के साथ-साथ 1984 में भड़के सिख विरोधी दंगे और हर तरह की हिंसा का पुरज़ोर विरोध करें। हम सभी यह कोशिश करें कि संवैधानिक रूप से इस तरह की किसी भी हिंसा के कसूरवारों को सजा मिले।

जब संवैधानिक प्रक्रिया से हर तरह की हिंसा के कसूरवारों को सज़ा दिलाने में कामयाबी मिलेगी, तब ही एक आम नागरिक सुरक्षित महसूस कर पाएगा और उसका यकीन संवैधानिक प्रक्रिया में और बढ़ जाएगा।

लेकिन अगर सरकारी व्यवस्था ही एक लचर रूप ले लेगी तो क्या आम आदमी और क्या सत्ता के ऊंचे ओहदे पर बैठे लोग, सभी किसी ना किसी रूप से हिंसा का शिकार होते रहेंगे।

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