मोदी को कोई मोदी जैसा सेल्फ मेड नेता ही हरा सकता है

Posted by vivekanand singh in Hindi, Politics
September 16, 2017

केंद्र सरकार कुछ करे या ना करे, फिर भी अगले लोकसभा चुनाव तक मोदी जी लोकप्रिय नेता बने रहेंगे। जानते हैं क्यों? क्योंकि उनके आगे-पीछे राजनीति में कोई नहीं है। विपक्ष अगर जनता से यह कहे कि वे बड़े उद्योगपतियों के लिए काम कर रहे हैं, तो जनता उन्हें घुमाकर कहेगी कि आपने कौन-सा मेरे लिए ताजमहल बनवा दिया था या आगे भी बनवा देंगे।

एक बात लिख लीजिए कि राजनीति के जंग लग चुके कुल-चिराग, मोदी जी को हराने का स्वप्न ना ही देखें। मोदी जी को कोई उन्हीं की तरह का आदमी परास्त कर सकता है, जिसके ना आगे कोई हो और ना पीछे। अभी यह बात शून्यता की ओर बढ़ रहा विपक्ष मानने को तैयार ही नहीं है। उन्हें लगता है कि जेएनयू, डीयू में आए परिणाम मोदी जी से मोहभंग हो रही जनता का इंडिकेटर है।

हां यह सच्चाई है कि देश की जनता, मोदी जी की बक-बक से बोर हो चुकी है, लेकिन वह विकल्पहीन होने की तरफ तेज़ी से अग्रसर है। आप खुद ही सोचिए कि देश में ऐसा कोई विपक्षी दल है, जिसने अपनी राजनीति में सेकंड लाइन ऑफ लीडरशिप खड़ा करने की कोशिश की हो।

यहां तो कोई बेटे को सेट करने में जुटा है, तो कोई विपक्षी एकता के नाम पर घिसी माचिस की तीलियों को इकट्ठा करने में जुटा है। उन्हें उम्मीद है कि वे उन तीलियों के बारूद से धमाका कर पाएंगे। मुझे तो लगता है कि उस धमाके की गूंज उनकी ही चाहरदिवारी में दबकर रह जायेगी।

मोदी जी के पीछे एक ऐसी वैचारिक ताकत रीढ़ की हड्डी की तरह खड़ी है, जो उनकी हर नाकामी को सहर्ष अपने सिर-माथे लगाने को तैयार है। चातक की तरह वर्षों तक आसमान में टकटकी लगाने के बाद उन्हें पूर्ण बहुमत से सत्ता मिली है। फिर भी वे शहर-शहर, डगर-डगर विचारों को विस्तार देने में जुटे हैं।

यहां सो कॉल्ड विपक्ष के विचारों की हालत देखिए। महात्मा गांधी के विचारों को आगे बढ़ाने का दावा करने वाली कांग्रेस ने तो उनके विचारों का गला दबाना, इंदिरा जी के समय से ही शुरू कर दिया था। उसके बाद वे जब भी कमज़ोर हुए, तब ही उन्हें गांधी की याद आयी। आज देश को ठीक से गांधी का विचार भी नहीं पता है।

तथाकथित समाजवादियों के भी कहने ही क्या! सामाजिक न्याय के नारे के दम पर जो सत्ता मिली, उसे फॅमिली कैरियर बनाने में इन लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे सारे समाजवादी नेता अपनी जातियों के नेता बनने को बेताब हो गए। लोहिया-जयप्रकाश को ये लोग खुद तो भूले ही, अपने लोगों तक उनके विचारों को भी इन लोगों ने नहीं पहुंचने दिया। आज इनकी हालत किसी से छिपी है क्या?

देश के वामपंथी ना जाने किस नशे में रहते हैं। इनके व्याकरण में ऐसे ऐसे शब्द जमे हैं जिसे वो लोग ही समझ नहीं पाते, जिनकी लड़ाई का दावा ये लोग करते हैं। इन सभी लोगों ने अपने विचारों को खुद मर जाने दिया, आज देश की जनता चाहे भी तो क्या कर सकती है?

यह जो भी रोष दिख पा रहा है, उसके पीछे की वजह ये नए माध्यम ही हैं। नहीं तो आपको पता भी नहीं चलता कि आज रांची में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के स्वागत में खड़ी भीड़ को यह भी नहीं पता था कि आ कौन रहा है। उनके हाथ में तख्तियां थी, जिसमें से किसी में प्रधानमंत्री तो किसी में अमित जी की तस्वीर लगी थी। जैसे भीड़ मैनेज होती है, वैसे ही वोट भी मैनेज हो जाएंगे। वैसे भी सोये हुए लोगों को ज़्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए।

बाकी आज से वीकऑफ का दिन शुरू होगा, लोग घर में साउथ की डब मूवी देखेंगे। मेरा तो कल ही था तो आगामी विश्वकर्मा पूजा को ध्यान में रखकर मैकेनिकल मशीन को साफ-सुथरा कर दिया है। आप लोग भी साफ करके कल पूजा कर लीजियेगा। राधे-राधे!

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