अभिव्यक्ति की आजादी व लोकतन्त्र – अनीश कुमार (शोध छात्र)

Posted by अनीश कुमार
October 7, 2017

Self-Published

इतिहास ऐसे हत्याओं व उनके प्रति क्रूरताओं से भरा पड़ा हुआ है, जिसने मानवता व आजादी के लिए आवाज उठाने की जहमत की । तथाकथित पोगा-पंडित लोग उन्हें समाज से अलग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते, परंतु क्या हुआ? व्यक्ति मारे गए किन्तु विचार तो नहीं । आगे छलकार वही विचार और ज्यादा क्रांति का वाहक बनता है । चिंतन करने योग्य विषय ये है कि आज हम किस तरह के आजाद देश में रह रहे हैं ? असहमतियों और आलोचना से मुक्त समाज क्या जीवित रह सकता और द्वंद्वविहीन समाज क्या वाकई में मानव समाज ही कहलाएगा ? लोकतन्त्र में कार्यपालिका यानि राज्य हमेशा दमनकारी भूमिका में रहता है । जो लोकतन्त्र के पाखंड को बनाए रखता है । ऐसी स्थिति न्यायपालिका, विधायिका और मीडिया ऐसे स्तंभ हैं जिनसे जनपक्षधरता न्याय की उम्मीद की जा सकती है । अभिव्यक्ति की आजादी व्यक्तिगत नहीं होती उसका फैलाव सामुदायिक होता है । उसकी जरूरत भी सामुदायिक होती है । तब उसके लिए लड़ना वैयक्तिक कैसे हो सकता है ।

          हमारे समाज में या देश में लोग ये कल्पना करते हैं कि आग तो पड़ोसी के यहाँ लगी है जब मेरे यहाँ लगेगी तब देखेंगे । यहाँ आग किसके यहाँ लगी है ये ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है । महत्वपूर्ण ये आग है । वही बात कि भगत सिंह पैदा हो किन्तु पड़ोसी के यहाँ । आजकल दो प्रकार की चुप्पी इन बोलने और लिखने वाले लोगों के साथ समानान्तर चल रही है । एक वे सत्ताधीश जो बोलने व लिखने वालों के खिलाफ कुछ न कुछ बोलते व लिखते रहते हैं, पर आज चुप हैं । और दूसरी उन यथास्थितिवादियों से डरे हुए लोगों की चुप्पी है । कारण कुछ भी हो चुप्पी हमेशा उसी तरफ खड़ी होती है जिधर दबाव होता है, सत्ता का लोभ होता है, विश्वासघात होता है, नाइंसाफी होती है । इसलिए चुप रहना भी उतना ही बड़ा गुनाह है जितना बड़ा गुनाह गुनाह होता है । लोगों के पक्ष में खड़े होने वाले मानस हमेशा से मौजूद थे परंतु जनपक्ष में खड़े होने वालों के विरुद्ध दमन की भयावहता आज जिस तरह दिखाई दे रही है । वह भयाक्रांत करने वाली राजनीति का कुरूप चेहरा है । जो पहले कभी नहीं देखा ।

आज समाज व राजनीति कि स्थिति नागनाथ व सांपनाथ जैसी हो गई । दोनों तरफ वही मिलेंगे जिधर भी जाइए । वामपंथ हो या दक्षिणपंथ यदि बोलने, सोचने, लिखने व काम करने की आजादी वहाँ नहीं हैं और भयपूर्ण माहौल बनाने की राजनीति हो तो वहाँ सही मायने में लोकतन्त्र नहीं हो सकता । आज के समय में ये गहरे चिंतन के विषय हैं कि वे कौन से कारण हैं? कौन सी मनसिकताएँ हैं ? जिसके चलते हम और हमारा समाज और देश इस कदर भयपूर्ण माहौल में जीने को मजबूर हो गए हैं । यद्यपि इतिहास इस बात का गवाह है कि हमेशा कुछ संवेदनशील, ईमानदार, निर्भीक लोगों के जीवन कि शर्त पर ही मानवता के संघर्ष आजादी के लिए संघर्ष चलते रहे हैं ।

ग्रामीण अंचल का कोई छात्र शोधार्थी जेबी किसी मुद्दे व समस्या पर अपनी राय जाहिर करता है तो उसके सामने तमाम परेशानियाँ आती है । भारत ही नहीं पूरे विश्व में छात्र राजनीति सक्रिय है । सोशल मीडिया के जरिये ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि कोई भी व्यक्ति/छात्र/शोधार्थी अपनी बात रख न पाये । लोकतन्त्र कि बात करते हैं हैं सबसे आती है आजादी और अभिव्यक्ति कि आजादी उससे भी ऊपर आती है । किन्तु पिछले कुछ वर्षों से इसकी आजड़ी पर सबसे बड़ा खतरा मडरा रहा है । क्या कोई व्यक्ति विना बोले रह सकता है या विना विचार व्यक्त किए रह सकता है ।

आपात काल के दौरान टाइम्स ऑफ इंडिया के सभी संपादकीय खाली छोड़ दिये जाते थे । शायद विरोध का सबसे अनोखा तरीका था । इस तरह के बड़े अखबारो पर भी अभिव्यक्ति कि स्वतन्त्रता के खतरों का असर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था । वरिष्ठ अखबार रामनाथ गोयनका ने तो लगभग अखबार बंद करने का ही फैसला ले लिया था । उनका मानना था कि अभिव्यक्ति कि आजादी के बिना अखबार कोरा कागज मात्र ही रह जाएगा ।

तकनीकी युग में संचार माध्यमों का चमत्कारी विकास हुआ है । सुचानाओं का अभूतपुरवा भंडार आज जनता के पास है । इसके बहुत सारे सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं । इसने शक्तिहीनों के मौन बंधनों को तोड़ दिया है । इन्टरनेट और सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को बोलने का अवसर और अधिकार दे दिया है । हर नागरिक को जानने व अपनी बात कहने का अवसर मिल गया है ।

आज निष्पक्ष व स्वतंत्र विचार रखने वाले लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों, छात्रों व शोधार्थियों को अलग-अलग ढंग से निशाना बनाया जा रहा है । देश में यह दुर्भाग्यपूर्ण व विनाशक प्रवृत्ति बहुत तेजी से पनप रही है, जो समाज व देश के लिए अत्यंत घटक है । युवाओं को रोजगार, शिक्षा आदीसे भटकाकर एक अलग ही विचारधारा कि तरफ मोड़ा जा रहा है ।

इसी बीच शिक्षा के विभिन्न संस्थानों में एक नए प्रकार की बहस व मुद्दा हमारे सामने दिखाई दे रहा है । इसकी गूंज धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं । इसे हम शैक्षिक राष्ट्रवाद का नाम दें तो बेमानी न होगी । पिछले कई वर्षों में विश्वविद्यालय व अन्य शैक्षिक संस्थानों में इसकी चर्चा व उसका असर देखने को मिल रहा है । भिन्न-भिन्न क्षेत्रों व भाषा प्रदेशों के विद्यार्थी या शोधार्थी इस पर एकमत नहीं दिखाई दे रहे हैं । इसे राजनीति से जोड़कर देखने की कवायद जारी है । राष्ट्र के भीतर रहते हुए हम बिना राजनीति के ऊपर बात किए रह ही नहीं सकते । आज शैक्षिक संस्थानों में राजनीतिक मुद्दों व समकालीन मुद्दों को लेकर परिचर्चाएं व संगोष्ठियाँ आयोजित की जा रही हैं । किसी ने तो यह भी कह दिया कि आज विश्वविद्यालय के छात्र सरकार के साथ विपक्ष कि भूमिका निभा रहे हैं ।

इन सभी क्षेत्रों में हिन्दी पत्रकारिता का भी महत्वपूर्ण योगदान है । पत्रकारिता अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम होता है । कहा भी जाता है कि जब आपकी बात कोई न सुने तो पत्र या अखबार निकालो । भारतीय संविधान के अनुसार सभी को अखबार, पत्र-पत्रिकाए निकालने व अपनी बात कहने का अधिकार पूरा अधिकार है । हम अतीत में जाकर देखें तो पत्रकारिता का असर व्यापक तौर पर दिखाई देता है । सभी बड़े क्रांतिकारियों ने अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाज में क्रांति लाने का कार्य कर रहे थे । आज के इस भयपूर्ण माहौल में रविश कुमार जैसे निर्भीक पत्रकार को जब ये कहना पड़े कि हम जिंदा होते हुए भी मुर्दे के समान जी रहे हैं तो समझ लीजिये समाज का झुकाव या देश का माहौल कैसा है । संविधान जब किसी मनुष्य को अलग-अलग नहीं देखता तो ये कुछ यथास्थितिवादी लोग क्यों मनुष्य और मनुष्य के बीच खाईं बनाने में तुले हुए हैं ।

आज के समय में सबसे ज्यादा हमला हो रहा है तो वो है अभिव्यक्ति कि आजादी पर । अतीत में जाकर देखें तो जितनी भी लिखित तथ्य मिलते हैं उन्हें यथास्थितिवादी नहीं बदल पाये । फिलहाल उन्हें भी बदलने कि कवायद जारी है । उसी प्रकार आज के समय में लिखने से ये यथास्थितिवादी डरते हैं । स्त्री शिक्षा से डरते हैं, दलितों कि शिक्षा से डरते हैं । आखिर क्यों ? वे भी मनुष्य हैं । उन्हें भी लिखने, सोचने, समझने व उसे व्यक्त करने कि आजादी है । लेकिन आज एक भयपूर्ण माहौल बनाकर उन्हें रोकने कि कोशिश की जा रही है । युवाओं में भय पैदा किया जा रहा है । एक तरीके से अघोषित आपातकाल चल रहा है । सरकार की उदासीनता इसे और मजबूती प्रदान कर रही है । आश्चर्य होता है कि हम किस प्रकार के भारत के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं ।

जोहार । । जय भीम । । जय संविधान । । जय भारत । ।

अंत में आलम खुर्शीद  के शब्दों में –

“दरवाजे पर दस्तक देते डर लगता है ।

सहमा-सहमा-सा अब मेरा घर लगता है ॥

साजिश होती रहती है दीवार ओ डर में ।

घर से अच्छा अब मुझको बाहर लगता है ॥”

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