घर का सारा काम लड़कियों का फिर सम्पत्ति सिर्फ लड़कों के नाम क्यों

Posted by Sanjay Kumar in Hindi, Sexism And Patriarchy, Society
October 31, 2017

मेरी तीन साल की बिटिया न जाने कैसे इतनी सयानी हो गई है कि अपने आप सुबह आटा लेकर रोटियां बनाने लगती है। घर में जब भी कूड़ा कर्कट देखती है तो झाड़ू लेकर सफाई करने लग जाती है और सारी गंदगी को इक्कठा कर कूड़ेदान में डाल आती है। ऐसे ही अपनी रिश्तेदारी में कई बहनों को सुबह सबसे पहले उठकर घर आंगन की साफ सफाई करके, पशुओं का गोबर गाँव के बाहर कुरड़ी पर डाल कर आना, पशुओं को पानी पिलाना और उन्हें न्यार (घास) डालना, उसके बाद पूरे घर का खाना तैयार करते हुए देखा है।

सभी लड़कियों- महिलाओं का सुबह का यही काम रहता आया है। उसके बाद अपने खेतों में घर के मर्दों के बराबर बल्कि उनसे कहीं ज्यादा हाड़तोड़ मेहनत से वो काम करती रही हैं। दोपहर को घर आकर खाना भी बनाएंगी, सबके कपड़े भी धोएंगी। फिर पशुओं का न्यार काटकर लाना, उन्हें पानी पिलाना और फिर खेत में घर के पुरुषों की मदद करना। शाम को फिर से घर के उबा देने वाले काम। दूर नल से पानी लाना, खाना बनाना, सबको खाना खिलाकर बाद में बचा खुचा खाना खाकर बर्तन साफ करना। उस सबके बाद कहीं 10- 11 बजे उन्हें खाट नसीब होती है और पता नहीं कब नींद आई और सुबह फिर से 4-5 बजे पौ फटते ही उठ जाना।

सूरज की ड्यूटी भी सिर्फ 12 घण्टे की ही होती है लेकिन महिलाओं का दिन तो 14 से 16 घण्टे तक का हो जाता है। यानि सूरज से भी ज़्यादा सख्त डयूटी इस समाज में लड़कियों और महिलाओं की है।

शहर में भी जब कभी वॉलेंटियर्स के साथ जल्दी किसी दूसरे शहर गए तो उनके लेट आने का एक ही कारण होता है कि उठकर घर मे साफ सफाई और रोटी बनाकर आना होगा नहीं तो घर में मम्मी से डांट सुननी पड़ेगी और शायद अगली बार घर से आने ही न दिया जाए। शायद लड़कियां अपने घरों के पितृसत्तात्मक माहौल को देखते हुए ये सब जल्दी ही मजबूरी में सीख जाती है। अब लड़कियां और महिलाएं सुबह दिन निकलने से पहले से लेकर रात देर गए तक घर के इतने सारे काम करती हैं और बाहर खेत, दफ्तर या दुकान में भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। देखा जाए तो महिलाओं के जिम्मे पुरुषों से भी ज़्यादा काम और जिम्मेवारियों का बोझ है। कामकाज़ी महिलाएं तो दोहरे बोझ का शिकार हैं।

अगर महिलाओं के इन कामों की कीमत जोड़ी जाए या यही सब काम किसी वेतनभोगी से करवाए जाए अथवा हम पुरुषों को ये सब काम रोज़ाना करने पड़े तो हमें इन कामों की अहमियत का पता चलेगा। इन सब कामों के माध्यम से लड़कियां शादी की उम्र आते आते अपने घर मे काफी सम्पत्ति जोड़ती है जबकि ज़्यादातर लड़के इस दौरान घर की सम्पत्ति में कटौती ही करते हैं कुछ जोड़ते नहीं। हां मज़दूर वर्ग या छोटे व माध्यम किसानों और निम्न मध्यम वर्ग के घरों के लड़के ज़रूर अपने घर के छोटे-मोटे कामों में हाथ बंटाते हैं। लेकिन घर की सम्पत्ति में जितनी वृद्धि लड़कियां करती उसके बराबर लड़के नहीं कर पाते।

UN के एक सर्वे के अनुसार दुनिया के कुल काम का 2 तिहाई यानि 66 फीसदी काम महिलाएं करती हैं। लेकिन इस सब के बावजूद भी उन्हें पैतृक संपत्ति या अपने पति की सम्पत्ति का हिस्सेदार क्यों नहीं माना जाता है।

हमें समुदाय में महिलाओं के सम्पत्ति के अधिकार पर बात करते हुए अक्सर यह सुनने को मिलता है कि अगर उन्हें सम्पत्ति का अधिकार दे दिया गया तो लड़की का घर नहीं बस सकता क्योंकि उसके पास पैसा आ जायेगा और फिर वो अपने पति या सास ससुर की नहीं सुनेगी। हालांकि महिलाओं को कानूनन सम्पत्ति का अधिकार है और स्टाम्प ड्यूटी में कुछ कमी के चलते ज़मीन मकान उनके नाम भी करवाये जाते हैं लेकिन सामाजिक रूप से उनको कोई अधिकार नहीं है। अगर किसी महिला ने कानूनन अपने पिता की सम्पत्ति में हिस्सा ले लिया तो उससे सभी रिश्ते नाते खत्म मान लिए जाते हैं। वह समाज की तथाकथित नज़रों से गिर जाती है और कभी गाँव मे पैर नहीं रख सकती।

लेकिन जब वह अपने घर की सम्पत्ति में इतना महत्वपूर्ण योगदान करती है तो सम्पत्ति के अधिकार पर उसका कोई सामाजिक दावा क्यों मान्य नहीं है? अक्सर यह तर्क दे दिया जाता है कि उसकी शादी में दहेज के रूप में उसे उसका हिस्सा दे दिया गया है या कभी कभार रक्षा बंधन, तीज-त्यौहार, पीलिया, भात के समय उसे कुछ सौगात देकर निपटा दिया जाता है। लेकिन यह दहेज और ये सौगात ही उसकी हीनता का कारण भी बनती है और ज़्यादा दहेज की मांग के कारण लड़कियां प्रताड़ित होती हैं और कई सारी लड़कियां दहेज की बलि चढ़ मौत का शिकार हुई हैं।

क्या दहेज की बजाय लड़कियों को सम्पत्ति का अधिकार नहीं मिलना चाहिए क्योंकि अगर उनके पास चल अचल संपत्ति के रूप में कुछ रहेगा तो ससुराल वाले उसे तंग करते हुए सोचेंगे। वह अपने पैरों पर खड़ी हो अपना व अपने बच्चों का गुजर बसर कर सकती है। इसलिए हमें दहेज की जगह उसके सम्पत्ति के अधिकार पर ज़ोर देना होगा तभी सच्चे मायनों में समानता की बात की जा सकती है।

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