आवाज..

Posted by Utkarsh Dwivedi
October 4, 2017

Self-Published

तोड़ दो साथी – पिंजड़ा तोड़ो
छोड़ दो साथी -पिंजड़ा छोड़ो..
ये न तो अंग्रेजों के जमाने के नारे हैं और न ही किसी प्रगतिशील संगठन के नेता की आवाज।ये गूंज है -सर्व विद्या की राजधानी कही जाने वाली काशी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राओं की ,जो प्रशासन द्वारा जबरन बंद कराये गए त्रिवेणी गर्ल्स हॉस्टल और महिला महाविद्यालय के मुख्य द्वार को खोलने और तोड़ने के लिए।अपनी सुरक्षा की मांग कर रही इन छात्राओं को देशव्यापी समर्थन के बावजूद कुछ चंद शरारती छात्रों और कुछ स्वनामधन्य दलाल छात्राओं(जिनको छात्र नेत्री कहलाने का शौक है)की वजह से आधी रात को लाठियां भी खानी पड़ीं।वैसे यह आंदोलन विश्वविद्यालय के १०० वर्ष के इतिहास में निश्चित तौर पर मील का पत्थर और ऐतहासिक परिवर्तन का वाहक बन गया है।कुलपति को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छुट्टी पर भेज दिया है,मुख्य सुरक्षाधिकारी ने इस्तीफा दे दिया है,स्थानीय एस डी एम् और थानाध्यक्ष का तबादला हो गया है,मुख्यमंत्री ने सारी जाँच स्वयं कमिश्नर को करने को बोला है,हाईकोर्ट के पूर्व जज द्वारा न्यायिक जाँच की जा रही है।मुख्य द्वार पर लगातार ४२ घंटे चले इस ऐतिहासिक धरना प्रदर्शन और आंदोलन को पूरी तरह आम छात्राओं द्वारा अपने वाजिब हक के लिए चलाया गया।बावजूद इसके कि वाराणसी में प्रदेश और देश के मुखिया दोनों लोग मौजूद थे और कार्यक्रमों की वजह से पूरा शहर छावनी में तब्दील था,पर लड़कियां न हटीं,न झुकीं ।                                                                                                                                                                             आरोप था कि परिसर स्थित संग्रहालय भारत कला भवन के सामने वाली सड़क पर शाम ७ बजे एक लड़की के कपडे में कुंठित मानसिकता के युवक ने हाथ डाल दिया और लड़की कुछ देर के लिए बेहोश हो गयी जबकि बगल में ही विश्वविद्यालय के प्रॉक्टोरियल बोर्ड के आधा दर्जन गार्ड बैठे हुए थे।गार्ड्स से मदद मांगने पर उन लोगों ने यह बोल कर साफ़ मना कर दिया कि इतनी रात को क्यों आती जाती हो,उसको पहचानती भी नहीं हो ..आदि आदि।कुछ अगल बगल के और साथियों की मदद से लड़की अपने हॉस्टल गयी और वहां से साथियों के साथ प्रॉक्टोरियल बोर्ड से एप्लीकेशन लिख कर मदद मांगी पर न ही एप्लीकेशन लिया गया और न कोई आश्वासन दिया गया।स्थानीय थाने में भी एफआईआर नहीं लिखी गयी।ये सारी कवायद रात भर चलती रही।विश्वविद्यालय के बाकी अधिकारियों ने इस खबर को रात में कुलपति तक नहीं जाने दिया।भरसक मनाने की कोशिशें जारी रहीं कभी वार्डन से तो कभी परिवार और करियर के माध्यम से।पर वाजिब कार्रवाई का भरोसा किसी ने नहीं दिया|

और फिर छात्राओं ने शुरू किया वो जिसके बारे कोई सोच भी नहीं सकता था या यूँ कहें हर कोई जिसका इन्तजार कर रहा था…जो पूरे उत्तर भारत में कहीं नहीं हुआ था..
इनकी आवाज में आवाज मिलाइये और कहिये कि तुम्हारी आवाज उस हर आवाज पर भरी पड़ेगी जो तुम्हारी आवाज को आवाज नहीं होने देना चाहते…

यहां की है यह पवित्र शिक्षा
कि सत्य पहले फिर आत्मरक्षा..
#शेष अगली कड़ी में-पूरा आंदोलन,आँखों देखी

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