एक फैसला ओर सही

Posted by Roki Kumar
October 28, 2017

Self-Published

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि 15 से 18 साल की नाबालिक पत्नी के साथ यौन सम्बंध बनाना कानून रूप से अपराध है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने रेप के मौजूदा कानून की खामियों को दूर करने का एक अनूठा प्रयास किया है। इस से पहले रेप के कानून (IPC 375) में ऐसा कोई प्रावधान नही था सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के अनुसार अगर नाबालिक पत्नी के साथ पति यौन सम्बंध बनाता है तो नाबालिक पत्नी एक साल के अंदर रिपोर्ट लिखवा सकती है। ।न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने अपने अलग, लेकिन एकमत से दिए गए फैसले में इस अपवाद के बारे में कहा, “दुष्कर्म कानून में अपवाद भेदभावपूर्ण, मनमाना और एकपक्षीय है। यह लड़की की शारीरिक पवित्रता का उल्लंघन करती है।” न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि इस अपवाद का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। धारा 375 जो दुष्कर्म को परिभाषित करती है इसके अपवाद 2 में कहा गया है, “पुरुष द्वारा उसकी पत्नी के साथ बनाए गए यौन संबंध अगर उसकी पत्नी 15 से कम उम्र की नहीं हो, तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। इस महत्वपूर्ण फैसले से हमारे देश मे हो रहे बाल विवाह की खराब हालात को सुधारने में कुछ मदद मिलने की आशा की जा रही हैं। सयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत बाल विवाह के मामले में दूसरे स्थान पर है। भारत मे ऐसे बहुत से राज्य है जहाँ पर आज भी बाल विवाह खुले तौर पर हो रहे है ।दुःख की बात तो ये है कि परम्परा के नाम पर आज भी लोग इस रूढ़िवादी सोच को ढ़ोह. रहे है ।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसल से हम ये अनुमान तो लगा रहे है कि बाल विवाह की भयानक स्तिथि में कुछ सुधार जरूर आएगा। लेकिन इस फैसले से जुड़े कूछ सवाल भी है जिन पर विचार किये बिना सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला सिर्फ कागजों तक ही सीमित हो जाएगा । देश के बाल विवाह निषेध अधिनियम अनुसार भारत में 18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 साल से कम उम्र के लड़के की शादी नहीं हो सकती है। अगर कोई ऐसा करता है तो सजा का प्रावधान है। लेकिन कानून बनने के इतने साल बाद भी बाल विवाह पर रोक लगाने में हम असक्षम है। सम्पूर्ण भारत मैं विश्व के 40% बालविवाह होते हैं और समूचे भारत में 49% लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले ही हो जाता हैं | सामाजिक ताने-बाने को बनाएं रखने के लिए आज भी समाज मे बहुत कम लोग है जो बाल विवाह जैसे अपराध को रोकने की कोशिश करते है । समाज मे बाल विवाह बहुत खुले तौर पर होते है जिनका विरोध नही कर पाते है, तो बन्द कमरे में नाबालिक विवाहित लड़की के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न को भला कैसे रोका जा सकता है।
दूसरा लैगिक भेदभाव के चलते लड़कियों के आगे बढ़ने के लिये कोई भी सामाजिक सहयोग नही है , जिसके चलते लड़कियां अपने अधिकारों से वंचित हो रही है । सामाजिक दबाव के कारण लड़कियों को अपने सपनों का गला घोंटना पड़ता है।ऐसे हालात में बिना किसी सामाजिक सहयोग के कोई नाबालिक पत्नी अपने साथ हो रहे यौनिक उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा पाएंगी? सर्वोच्च न्यायालय का फैसला महत्वपूर्ण तो जरूर है लेकिन आज भी जरूरी है कि हम बाल विवाह निषेध अधिनियम को ही सख्ती के साथ लागू करे। बिना सामाजिक जागरूकता के बहुत बड़े बदलाव की कल्पना भी कर पाना बहुत मुश्किल होगा। Pocsoएक्ट और बाल विवाह निषेध अधिनियम एक दूसरे से एक कड़ी के रूप में जुड़े हुए है और हमे इनको इसी रूप में।देखना चाहिए ना कि अगल-अलग
जहां एक तरफ हम ये बात कर रह है कि 18 साल से कम उम्र की लड़की अपने फ़ैसले लेने और सहमति देने में सक्षम नही है । उसके बाद ही कोई लड़की सहमति देने के लिए सक्षम मानी जाती है। फिर 18 साल से ज्यादा उम्र की पत्नी के साथ जब कोई पति जबरन यौन सम्बंध बनाता है तो उसको अपराध की श्रेणी में क्यों नही रखा जाता। ऐसे हालात में हमारे नियम क्यो बदल जाते है। आज भी ये माना जाता है कि अगर कोई पति अपनी पत्नी के साथ ज़बरन यौन सम्बंध बनाता है तो वो अपराध नही है । इसके पीछे ये तलील दी जाती है कि अगर इसे अपराध माना गया तो सामाजिक ताना बाना बिगड़ जाएगा । महिला अधिकारों को लेकर शुरू से कुछ महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए जाते रहे है और सर्वोच्च न्यायालय का ये फैसला भी उनमें से एक है । लेकिन इन अधिकारो को टुकड़ो में न देखते हुए सम्पूर्णता में देखने की जरूरत है । इसके साथ साथ सामाजिक चेतना को उजागर करना भी एक बहुत जरूरी पहलू है ,तभी हम एक समानता और न्यायपुर्ण समाज का गठन कर सकते हैं ।

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