कल्पना – 1 (भारत के जुपिटर तक पहुंचने की कहानी)

Posted by Happy Nagashetti
October 3, 2017

Self-Published

कमांडर गगन और कैप्टेन पियूष तैयार थे, पांच साल की लम्बी यात्रा के बाद वे आखिरकार अपनी मंज़िल पे पहुंच ही गए थे। अब बस लैंडिंग साइट पे पहुंचने की देरी थी।

2034 में मनुष्य ने पहली बार मंगल पे कदम रखा और पहली बेस की स्थापना की और उसके बाद सभी देशो के बीच में मंगल पे पहुंचने की होड़ लग गयी।

चीन जहां उल्कापिंडों को पकड़ कर उनमे से दुर्लभ तत्वों का खनन शुरू कर दिया था, वही अमरीका, फ्रांस और जापान ने मिल कर मंगल पे बेस बनाने की शुरुवात कर दी थी।  वहाँ पर अब 24,000 लोगो का एक शहर सा बन गया था।

भारत के विज्ञानिको ने मंगल के आगे की दुनिया को समझने का मन बनाया। काफी सोच विचार के बाद भृस्पति के चन्द्रमा, यूरोपा पे यान उतरने फैसला किया।  पृत्वी से यूरोपा की दूरी 62,83,00,000(62.83 करोड़) KM है जिसके कारण पृथ्वी से सन्देश भेजने मैं 50 मिनट तक का समय लगता है और दूसरी तरफ से सन्देश आने भी उतना ही वक्त लगता है।

यूरोपा पे जाने वाले पहले यान, कल्पना-1 में पांच भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने का निर्णय लिया गया। यह यात्री 5 साल की लम्बी यात्रा के दौरान यान में होने वाले किसी भी प्रकार के गड़बड़ी की मरम्मत करने में सक्षम थे।  साथ ही साथ सभी यात्री कुशल वैज्ञानिक थे जो की यूरोपा पे उतर कर शोद कर सकते थे। वर्ष 2054 में यात्रा की शुरुवात हुई और वर्ष 2059 में कल्पना-1 अपने मंज़िल पर पहुंच गया था।  

कमांडर गगन स्पेसशिप कल्पना-1 के चीफ ऑफिसर थे, मिशन की सफलता की जिम्मेदारी उनके हाथो में थी।  उनके साथ कप्तान पियूष Co-Pilot और चीफ़ इंजीनियर थे।  डॉ. अमीना मोहम्मद चीफ astrobiologist थी, उनका काम था यूरोपा पर जीवन की तलाश करना था।

डॉ. अन्वेषणा बैनर्जी  मेडिकल एक्सपर्ट और जियोलॉजिस्ट थी जिनका काम शिप के कर्मी दल के सेहत का ख़याल रखना था और यूरोपा के भूमि के इतिहास को समझना था।  कल्पना-1 के आखिरी अंतरिक्ष यात्री थे प्रोफेसर चिनवाय जो की astrophysicist थे जो की भृस्पति के गुरुत्वाकर्षण और रेडिएशन ( radiation) का अध्ययन कर भविष्य में यूरोपा में हिंदुस्तानी बेस की स्थापना करने की संभावना को समझने आये थे।

प्रोफेसर चिनवाय ने डॉ. अन्वेषणा बैनर्जी को यूरोपा के बारे में बताना शुरू किया। “यूरोपा हमारे चन्द्रमा से 314 KM छोटा है और इसकी खोज 8 January 1610 को  Galileo Galilei ने की थी।  ऊपर से यह एक बर्फ का घोला लगता है जिसमे तुम देख सकती हो की कई खिंचाव के निशान लाल लकीरों सा दिखाई देते है।  भृस्पति अपने विशाल गुरुत्वाकर्षण से अपने इस चाँद को खीचता और सिकुड़ता रहता है।  काफी सालो से अनुमान लगाया गया है की यूरोपा के बर्फ के सतह के नीचे विशाल समुन्दर है जहां अलौकिक जीवन(extraterrestrial life) हो सकता है।“

कल्पना -1 की पहली प्राथमिकता थी यूरोपा के इन समुंदरों को ढून्ढ कर उसमे में जीवन की तलाश करना।

कमांडर गगन सभी को लैंडिंग के लिए रेडी होने को कहा।  जहां दुनिया के बाकी देश अंदरूनी सौर मंडल में सिमटे हुए थे वही भारत अब एक नए क्षितिज को पार करने वाला था।

अमीना ने अपने खिड़की के बहार देखा और वो अपने पलके नहीं झपका पायी।  भृस्पति के विशालकाय आकार के आगे एक सफ़ेद गोला अब धीरे धीरे बड़ा होता नज़र आ रहा था।  पांच साल एक छोटे से यान में यात्रा करने के बाद अब सभी एक नए दुनिया में कदम रखने के लिए बेताब हो रहे थे, मंज़िल करीब थी और दिल की धड़कने तेज़।

धीरे धीरे सब कुछ साफ़ नज़र आने लगा।  दूर दूर तक सिर्फ बर्फ ही बर्फ और बीच में लाल लकीरे जिसे ब्रस्पति ने बनाया था।  गगन और पियूष ने बड़ी सावधानी के साथ कल्पना – 1 को एक खुले मैदान में उतरा जहां दोनों तरफ बर्फ के बड़े पहाड़ थे।

अमीना, अन्वेषण और प्रोफेसर चिनवाय ने बहार जाने का फैसला किया और अपने स्पससुईट पहनने लगे।  कमांडर गगन और पियूष यान को वापसी के लिए तैयार करने लगे।  5 साल की लम्बी यात्रा के बाद कल्पना-1 के पास यूरोपा पे सिर्फ एक हफ्ते बिताने का आदेश था। उन्हें वहां वैज्ञानिक उपकरणों को लगा के एक ग्राउंड स्टेशन की स्थापना कर के पृत्वी वापस आना था।

तीनो अंतरिक्ष यात्री कल्पना-1 से बहार निकाल के अपने आगे के दृश्य को कई देर कर बस देखते रह गए। यहां से  सूरज चाँद से भी कई छोटा दिखाई दे रह था और आसमान में भृस्पति हावी था।  उसकी सतह पे कई सौ साल से चल रहे विशालकाय बवंडर खूबसूरत च्क्रवूय की तरह दिख रहे थे। यह बवंडर इतने बड़े है की इनमे तीन पृत्वी समां जाए | जुपिटर के बाकी चन्द्रमा भी अस्मा को निहार रहे थे। 1610 में गैलिलियो(Galileo) ने पहली बार in चंद्रमाओ कि खोज की थी और हमारे अन्थरिक्ष यात्री पहले इंसान बन गए थे जिन्होने इन् चंद्रमाओ को पहली बार इतने करीब से देखा था |  पृथ्वी पे ऐसा अद्भुत दृश्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

अमीना ने अपने रिसर्च- किट से भारत के तिरंगे को बहार निकाला और यूरोपा के भूमि पर फेरा दिया। 3 अप्रैल 2054 को जुपिटर के चाँद पे भारत ने इंसानियत को एक नए मुकाम पे ला खड़ा कर दिया। प्रोफेसर चिनवाय ने इन सभी की वीडियो बना ली।  कर्मी दल रोज की घटना को धरती पे वापस भेजता है जिसे पुरे पृथ्वी पे और मंगल के कॉलोनी में देखा जाता है।  उस दिन सभी भारतीय गर्व से सर ऊँचा कर खड़े थे।

अमीना और चिनवाय ने अपने लैब तैयार कर लिए। अमीना ने ज़मीन में अपना ड्रिल दाल दिया जो की भूमिगत समुन्दर तक पहुंच कर पानी इकट्टा करेगा जिसमे अमीना जीवाणुओं की खोजने वाली थी ।

इधर चिनवाय ने ग्राउंड स्टेशन को लगाने की सही जगह खीज ली थी और बॉक्स पे एक बटन दबाते ही एक बड़ा ग्राउंड स्टेशन तैयार हो गया। इस ग्राउंड स्टेशन के द्वारा यूरोपा के सतह पर मौजूद खनिज पदार्थ को समझा जायेगा।  इससे यह पता चलेगा की क्या भविष्य में यहां एक ईंधन स्टेशन की स्थापना की जा सकती है जिससे की Saturn, Uranus , Neptune जैसे दूर के ग्रहो पे जाने वाले राकेट यहां ईंधन भर सके।  साथ ही साथ यह ग्राउंड स्टेशन ये भी बताएगा की यूरोपा पर इंसान रह पायेंगे या भ्रस्पति अपने radiation से किसी को नहीं रहने देगा ।

सभी उपकरण लग जाने के बाद  एक जोर का भूकम आया जिससे पूरी सतह पर दरारें दिखने लगी।

कल्पना – 1 बाएं तरफ झुक गया। भव्य सा दिखने वाला जुपिटर एक बड़ा दानव है जो की अपने सभी चन्द्रमाओ को अपने जकड में रखता है जिसके कारण उसके सभी चन्द्रमाओ पे भूकंप आम बात है।

अन्वेषणा जिस जगह खड़ी थी उससे 10 कदम की दूरी पर अचानक एक बर्फीला ज्वालामुखी उभर पड़ा जिसके वजह से वो यान से दूर एक दरार में जा गिरी।

अगर वो बर्फ के ज्वालामुखी के थोड़े और पास होती तो शायद अब तक अंतरिक्ष मैं होती।

कमांडर गगन ने तुरंत सभी को यान में वापस आने का आर्डर दिया।  अमीना और चिनवाय ने अपने अपने उपकरणों का ज्याजा लिया और अन्वेषणा को लेने पहुंच गए।

“अन्वेषणा ” दोनों ने साथ मिल कर आवाज़ लगाई।  “देखो मुझे क्या मिला ” अन्वेषणा अपने फूले नहीं संभल पा रही थी।  दरारों के बीच में हरी और नीली लखीरे दूर दूर तक जा रही थी।

“यह कोई जीवाणु या कोई खनिज पदार्थ हो सकता है, जल्दी से मेरे सेंसर्स दो ” अन्वेषणा के कहना ही था की आमिना भाग के सेंसर और बाकी उपकरण लाने निकल पड़ी।  यूरोपा का गुरुत्वाकर्षण धरती की मुकाबले काफी कम है, इसलिए वो लम्बी-लम्बी चलांगे ले रही थी।

अब तक अन्वेषणा ने अपने पॉकेट में रखे छोटे कुर्फी से उस लखीर को खुरेदना शुरू किया।  एक द्रव्य(liquid) सा पदार्थ निकलना शुरू हुआ।  आमिना तब तक शोद का सामान ले के वापस आ गयी थी |

“असंभव ! ” अमीना  ने कहा. “यह जगह इतनी ठंडी है यहाँ द्रव्य का होना नामुमकिन है। में अपने ड्रिल को देखने जा रही हूँ, शायद उसे भी कुछ मिला हो। ”

अमीना अपने ड्रिल के और गयी और चिनवाय भी अन्वेषणा के साथ दरार में उतर आये। दोनों  ने मिल के द्रव्य को टेस्ट ट्यूब में भरना शुरू कर दिया।

 

इधर कल्पना-1 के अंदर कमांडर गगन और पियूष मिल के यान का निरिक्षण कर रहे थे। पियूष ने कहा “हम 80 डिग्री तक झुक गए है, 60 डिग्री से ज्यादा झुकाव हुआ तो हम टेक-ऑफ(Take Off ) नहीं कर पायेंगे ” ।

कमांडर गगन ने काफी सोचा फिर कहा “यहाँ पर हम अकेले है, हमे बचने के लिए कोई नहीं आने वाला, हम सभी के जीवन की जिम्मेदारी मेरे हाथो मे है। अगर तुम्हे लगता है की हमारे जीवन को खतरा हो सकता है तो मुझे तुरंत बताना और हम यहाँ से चल पड़ेंगे। ”

“पर सर हमारे रिसर्च का फिर क्या होगा ?” पियूष ने पूछा ।

कमांडर गगन ने उत्तर दिया “तुम्हे पता है की किसी रोबोट के बदले हमारी सरकार ने हमे क्यों यहाँ भेजा है ? हम इंसान किसी भी समस्या को ठीक कर सकते है जो एक रोबोट नहीं कर सकता । ऊपर से यहाँ से पृत्वी पे सन्देश भेज कर वहाँ से उत्तर पाने में 2 घंटे लग जायेंगे, इसलिए यहाँ एक इंसानी दिमाग की जरूरत थी । हमारा ग्राउंड स्टेशन तैयार है और हम वैसे भी इस पुरे हफ्ते यहाँ के पत्थर, बर्फ ही उठाने वाले थे। प्रोफेसर चिन्वय अपने गुरुत्वाकर्षण और रेडिएशन का रिसर्च यहाँ से निकलने के बाद भी कर सकते है। ग्राउंड स्टेशन को यान से ही मॉनिटर किया जा सकता है । ”

गगन ने इतना कहा ही था की एक और जोरदार भूकंप का झटका आया । कमांडर और पियूष दोनों यान के ज़मीन पर घिर पड़े। झटका रुकते ही पियूष ने खुद को संभाला और अपने मीटर पर देख के कहा “सर शिप 70 डिग्री तक झुक गया था ।”

कमांडर ने जोर से माइक्रोफोन पे चिलाया “तुम तीनो कहाँ हो, मैंने तुम लोगो को अंदर आने का आर्डर दिया था।”

आर्डर सुनते ही प्रोफेसर चिनवाय और अन्वेषणा ने अपने-अपने टेस्ट ट्यूब को पैक किया साथ में बर्फ की एक बड़ी सी सिली काट कर शिप के और चलने लगे ।

प्रोफेसर चिनवाय ने मुड के अमीना के ड्रिल के और देखा पर वहां अमीना नहीं दिखी । अमीना का ड्रिल भी एक तरफ झुका हुआ था ।

“तुम यह सामान ले कर यान पर जाओ, में अमीना को देख के आता हूँ  ” चिनवाय ने अन्वेशना से कहा ।

ड्रिल के पास पहुँच कर चिन्वाय ने देखा की ड्रिल के आगे एक बड़ी दरार पड़ गयी थी । नीचे देखते ही चिन्वाय के होश उड़ गए । आमिना एक ड्रिल के केबल के सहारे लटकी हुई थी और कुछ ही दूर्री पर एक गहरी सी खाई थी । अचानक से आये भूकंप के कारण वो नीचे घिर गयी थी और झटके के कारण बेहोश हो गयी थी ।

“अमीना, अमीना ! ” कह कर चिन्वय ने झोर से चिलाया ।

अमीना होश में आ गयी, उसे पता नहीं था की उससे थोड़े ही दुरी पर एक गहरी खाई थी । चिन्वाय ने उसे केबल के सहारे ऊपर उठाना शुरू किया, अमीना ने पीछे देखने की कोशिश की और उसके हाथ जम गए । नीचे ख़तम न होने वाली गहराही थी। उसने मुश्किल से होश संभाला और जोर से सांस लेते हुए ऊपर चिन्वय की ओर देखने लगी ।

चिन्वय ने पुरे दम के साथ में उसे ऊपर खीचना शुरू किया, पास आते ही अमीना को ऊपर खीच लिया । दोनों हाँफते हुए एक दुसरे को देखने लगे ।

“थैंक यू चिन्वाय, थैंक यू सो मच ” अमीना ने कहा और चिन्वय को गले लगा लिया “तुम ने मुझे पाताल से खीच निकला, थैंक यू । ”

दोनों ने एक बार फिर साथ में नीचे देखा और इस बार दोनों दंग रह गए । वो हरा नीला पदार्थ हर तरफ फैला हुआ था, जहां तक नज़ारे जाती वहां तक हरा नीला सा नज़ारा था।

“चिन्वाय, अमीना, कहाँ हो तुम दोनों ? ” रेडियो पर कमांडर गगन की आवाज झोरो से आई। “तुम लोग शिप पे आ रहे हो की में तुम दोनों को खीच के लाऊ ?”

“हम आ रहे है कमांडर, बस एक आखिरी काम कर के ।” चिन्वाय ने कहा और अपने कैमरे में पूरा नज़ारा कैद कर लिया ।

दोनों ने ड्रिल को सीधा किया और शिप के और चलने लगे ।

“अमीना तुम शिप में चलो में ग्राउंड स्टेशन को भूकंप से बचने के तैयार कर के आता हूँ ।”

अमीना कल्पना – 1 में प्रवेश कर राहत महसूस कर रही थी ।

कमांडर गगन ने अमीना को देखते ही चिलाया “तुम लोगो को एक बार में समझ नहीं आता क्या ? शिप 70 डिग्री झुक गया है, 10 डिग्री से ज्यादा झुका तो हम हमेशा के लिए यही रह जायेंगे । यह प्रोफेसर कहाँ है ?”

“प्रोफेसर बस ग्राउंड स्टेशन को भूकंप के लिए तैयार कर के आ रहे है ।” अमीना ने जवाब में कहा ।

“पियूष, तुम इंजन तैयार करो, में उसे खींच के लता हूँ । ” कहते ही कमांडर ने अपना स्पेस सूट पहना और चिन्वाय को लेने निकल पड़े ।

इधर चिन्वाय ने ग्राउंड स्टेशन को मजबूती से तैयार किया ही था की भूकंप के झटके फिर से महसूस होने लगे ।

चिन्वाय को अपने कंधे पर एक हाथ महसूस हुआ, कमांडर ने उसे पकड़ा और शिप के और खीच कर ले चले ।

इधर पीयूष ने इंजन तैयार कर लिया था , कमांडर और चिन्वाय के आते ही टेक ऑफ़ हो सकता था । मीटर पर रीडिंग दिखा रही थी की शिप 67 डिग्री पर था और धीरे धीरे नीचे की और जा रहा था ।

“कमांडर जल्दी कीजिये ” पीयूष ने रेडियो पे बोला !

मीटर अब 64 डिग्री बता रहा था, और तभी झटके जोर होने लगे , मीटर झट से 62 डिग्री पर पहुँच गया ।

“Come On कमांडर !” पीयूष के कहते ही कमांडर और पीयूष शिप में आ गए, और पीयूष ने टेक ऑफ का बटन दबा दिया ।

उन के पीछे यान का दरवाजा धीरे धीरे बंद हो रहा था और सब ने आखिरी बार यूरोपा को देखा !

शिप टेक ऑफ कर चूका था और उनके नीचे की ज़मीन पूरी तरह से सरक रही थी जैसे समुन्दर की लहरें हो। ड्रिलिंग मशीन और अमीना का कंप्यूटर दरार में समां गया। चिन्वय ने ग्राउंड स्टेशन को देखा, उसके आस पास की ज़मीन हिल रही थी स्टेशन अपनी जगह पे स्थिर था। जहाँ पे कल्पना – 1 खड़ा था वहाँ भी अब एक बड़ी दरार थी।

सभी ने एक दुसरे के तरफ देखा और तीनो विज्ञानिक अपने  रिसर्च में झूट गए। अन्वेषणा ने यूरोपा पे मिले सैंपल का रासायनिक विश्लेषण(Chemical Analysis) करना शुरू किया और अमीना ने अपने सेंसर में जैविक विश्लेषण(Biological analysis ) शुरू किया।  प्रोफेसर चिन्वाय ने ग्राउंड स्टेशन के साथ संपर्क बनाया और भूकंप का कारण जानने की कोशिश की ।

“क्या ?” अमीना और अन्वेशना ने एक दूसरे के तरफ चौक के देखा। ऐसा पदार्थ दोनों ने कभी नहीं देखा था।

माइक्रोस्कोप के अंदर वो रसायन देखने में ऐसा लग रहा था मानो हिल रहा हो, और एक साथ मिल के काम काम कर  रहा हो ।

जो बर्फ की सिली काट के यान के अंदर लाया गया था, उसे एक ग्लास के बक्से के अंदर रखा गया था, वो भी साथ में हिल रहा था ।

प्रोफेसर चिन्वय भी अपने कुर्सी से उठ के बोले “उन भूकंप का कारण जुपिटर  नहीं था । मेरे किसी भी कैलकुलेशन में जुपिटर का कोई हाथ नहीं दिख रहा, भूकंप की शुरुवात यूरोपा पर ही हुई थी । ”

सब के दिमाग में एक ही बात चल रही थी, क्या यह कोई जीव है, क्या हमने अपने सौर मंडल में पहली बार ऐलिएन से मुलाकात की है ?

अमीना ने बात शुरू की “शायद यह एक नया प्रकार का जीव है जो नेटवर्क बना के जिंदा रहता है और इसने पुरे यूरोपा की सतह पर कब्ज़ा कर लिया है। मेरे ड्रिल ने सिग्नल भेजना बंद कर दिया है वर्ना हम यह जान सकते थे की यह कितने अंदर तक फैला है । ”

प्रोफेसर चिन्वाय ने भी साथ दिया “मुझे लगता है, की जुपिटर का रेडिएशन किसी भी जीव को जिन्दा नहीं रहने देता होगा तो यह जीव साथ मिल के विकसित होने लगे और करोडो, अरबो सालो से अकेले रहने के कारण इस जीव ने पुरे यूरोपा पे अपना वर्चस्व बना लिया ।”

“इस जीव का रासायनिक तत्त्व धरती के किसी भी प्रजाति से बिलकुल अलग है, काश हम थोडा और समय बिता कर इस जीव के बारे में थोडा और जान पाते ।“अन्वेशना ने कहा |

“मुझे इस जीव के बारे में जानने से ज्यादा तुम लोगो की जान की फ़िक्र थी।” कमांडर गगन ने कहा “मुझे यकीन है की तुम्हारी खोज के कारण तुम्हे नोबेल प्राइज तो मिलेगा ही, साथ ही साथ यूरोप के तरफ सैकड़ो यान भेजे जायेंगे, आखिरखार तुम लोगो ने पृथ्वी के बहार हमारे पहले पड़ोसियों को खोज निकला है । वो अलग बात है की हमसे मिलते ही हमारे पड़ोसियों ने हमारी जान लेने की कोशिश की । “

कमांडर की बात सुन कर सभी मुस्कुराये और उनके साथ कल्पना-1 के खिड़की के बहार देखने लगे ।

सब ने एक साथ सूरज की और नज़र फिराया और ख़ुशी मनाई की सब जिंदा है और प्रण किया की वो फिर कभी मौका मिले तो इस तरफ ज़रूर आयेंगे। गैलिलियो ने जुपिटर के चार बड़े चन्द्रमा देखे थे, यूरोपा के वासियों ने उन्हें भगा दिया तो क्या हुआ, भ्रस्पति का सबसे बड़ा चन्द्रमा, ग्यान्मीड(Ganymede) और काल्लिस्तो (Callisto)अभी भी उनका इंतज़ार कर रहा है। इंसानियत का काम ही है अगले मंजिल के ओर बढना ।

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