कालाधन का मैजिक

Posted by Ravindra Mina
October 4, 2017

Self-Published

काला धन वही हैं जो राज से छुपाकर कमाया या वर्द्धि हो ,बढ़ोतरी का तरीका कोई भी हो सकता है । जैसे जनता को लूट कर राजा खजाना बढ़ाता था केरल में स्तन टैक्स हो या राजपुताना के जमीदारो के अनेक रूपेण टैक्स पर तब वह सरकार थे तो यह शोषण भी कानून था भले मानवीय आधार पर वह तब भी और आज भी जायज नहीं है रिस्वतखोर तब भी थे जिन्हें उतकोचक कहते थे ।
मंदिरों को पुरातन काल में बैंक माना जाता था  जहाँ से पुजारी वर्ग इसका प्रयोग लोकहित से लेकर स्वहित में करता था जो आज भी जारी है ।बस अब बैंक रूप की राज वैधानिक मान्यता नहीं
वर्तमान में भी कालाधन के तरीके भी कुछ बदले है जैसे ड्रग्स माफिया , लैंड माफिया , दलाल माफिया  आदि  आदि नामकरण है।

द्विज वर्ग आज़ादी तक कालाधन का सरताज रहा है और आज़ादी के बाद आरक्षण नीति लागू होने से आरक्षित वर्ग का नोकरी पेशा वर्ग भी बाकि बाबुओं के साथ उत्कोच ( रिस्वत) से इस व्यवस्था में भागी बना पर वह आज भी नाममात्र का भागी  है । पर कालाधन का कुबेर प्राइवेट क्षेत्र में है और यही देश के कुबेर राज का खजाना है जहाँ होता है धन काला और यही से जाता है इंद्र लोक ( विदेश)

वर्तमान में कालाधन :-
आज़ादी के बाद भारत में कालाधन के आंकलन का मौका मिला जो आज भी जारी है और यह एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है । 2012 में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कालाधन पर सफ़ेद पत्र जारी किया के अनुसार 1986 में भारत में करीब 36000 करोड़ बताया गया जो GDP का 19% से 21% था ।बाकि मीडिया रिपॉर्ट से विदेश में अनुमानित 70 लाख करोड़ तक का डाटा यदा कदा आता रहता है । हाल ही में जारी GFI रिपॉर्ट 2015 से भारत से (2003-14 ) 10 साल में 510 अरब डॉलर ( करीब 34 लाख करोड़) काला धन देश से बहार गया है । जो 10 साल के रक्षा बजट के बराबर या 2 बार के देश के बजट के बराबर है । इस रिपोर्ट के अनुसार भारत काला धन बाहर भेजने में 4th पायदान पर है । पर 2015 में भारत सरकार ने इस रिपोर्ट के आंकलन को अति एवम गलत बताया है ।
काले धन पर SIT उच्चतम न्यायालय के निर्देशन में बनी हुई है । SC ने RBI को 500 करोड़ से ऊपर के लोन डिफाल्टर के नाम बताने की बात कही थी पर RBI ने नियम हवाला देकर मना कर दिया अगर बता देता तो कही माल्या भारत की जनता के सामने आ जाते । ओर इन्द्र लोक गये मालया 
निर्दोष हो जाते क्योकि जब दामन में बड़े दाग नज़र आते है तो छोटे दाग मासूम लगते है ।

हाल ही में मोदी जी ने 500 और 1000  की नोटबन्दी कर आमजन की नाना- नानी की घुलक छिनवा दी ओर नाना-नानी ब्लैक बाबा हो गए ।पर  कालाधन जो इन्वेस्ट हो चूका गोल्ड में ,प्रोपेर्टी में एवं देश के बाहर का वह मूल है भारत के धन के कालेपन का । जब सरकार आज तक वह विदेशी बैंक के काले लोगो के नाम छुपा रखे है । बरसो की गुप् चुप की गई सेविंग ,गांव का किसान जो जैसे -तैसे  सेविंग करता आया है ,  दिहाड़ी मजदूर बरसो से 500 का नोट अपने घर के खोपचे में दबाये बैठे थे आदि के सेविंग्स जो भारत की विधिक अकाउंट में दर्ज न होने से काला बना देना कहा तक जायज है ! पकड़ना है तो पहले वह उच्चतम न्यायालय में दिए नाम , बैंक डिफाल्टर आदि को तो पकड़ा जाये ।
क्या कांता भाई को  ब्लैक मनी के जुर्म में पकड़ जेल में डाल देना या परेशान करना ही काला को गोरा धन  बना देने के लिये प्रयाप्त है !
कालाधन रुके पर वह जो सही मायने में काला है और बाकि लोगो को इस 50 दिन में परेशानी का ध्यान में रखना भी जरुरी है । पर फिर भी रॉड is गॉड कहा जा सकता है पर मानवीय पक्ष को जिन्दा रखना भी लोककल्याणकारी राज्ये की जेमेदारी है कानून की नहीं ।

 2014 में लोकसभा चुनाव में खर्च 30 लाख करोड़ तक प्रयोग हुआ की बाते न्यूज़ में थी और ECI ने करीब नेशनल पार्टी के  खर्च ब्यूरो से 1400 करोड़ का खर्चे बताया । जो यह गैप है यह नेक्स्ट इलेक्शन  2019 में ख़त्म हो जायेगा इसी दुवा की जानी चाहिये ।  चुनाव आयोग शायद सही डेटा पता कर पाए और राजनीतिक नाम के नव करप्शन ब्लैक मैजिक को सही सही बता पाए जो आज सभी का मूल जड़ है ।

 

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